भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 346

| अ० १८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३३७ | | :--- | :--- |

| परमात्मस्वरूपं को वेत्तुमर्हति तां विना।<br>या सृष्टिं त्रिविधां कृत्वा दर्शयत्यखिलात्मने ॥ ३७<br><br>सुदर्शनस्तु तां देवीं मनसा परिचिन्तयन्।<br>राज्यलाभात्परं प्राप्य सुखं वै कानने स्थितः ॥ ३८ | उन भगवतीके बिना परमात्माका स्वरूप जाननेमें कौन समर्थ है? जो तीन प्रकारकी सृष्टि करके सर्वात्मा भगवान्‌को दिखलाती हैं, उन्हीं भगवतीका मनसे सम्यक् चिन्तन करता हुआ राजकुमार सुदर्शन राज्य-प्राप्तिसे भी अधिक सुखका अनुभव करके वनमें रहता था ॥ ३७-३८ ॥ | | सापि चन्द्रकलात्यर्थं कामबाणप्रपीडिता।<br>नानोपचारैरनिशं दधार दुःखितं वपुः ॥ ३९ | उधर, वह शशिकला भी कामसे निरन्तर अत्यधिक पीड़ित रहती हुई नानाविध उपचारोंसे किसी प्रकार अपना दुःखित शरीर धारण किये हुए थी ॥ ३९ ॥ | | तावत्तस्याः पिता ज्ञात्वा कन्यां पुत्रवरार्थिनीम्।<br>सुबाहुः कारयामास स्वयंवरमतन्द्रितः ॥ ४० | इसी बीच उसके पिता सुबाहुने कन्या शशिकलाको वरकी अभिलाषिणी जानकर बड़ी सावधानीके साथ स्वयंवर आयोजित कराया ॥ ४० ॥ | | स्वयंवरस्तु त्रिविधो विद्वद्भिः परिकीर्तितः।<br>राज्ञां विवाहयोग्यो वै नान्येषां कथितः किल ॥ ४१<br><br>इच्छास्वयंवरश्चैको द्वितीयश्च पणाभिधः।<br>यथा रामेण भग्नं वै त्र्यम्बकस्य शरासनम् ॥ ४२<br><br>तृतीयः शौर्यशुल्कश्च शूराणां परिकीर्तितः।<br>इच्छास्वयंवरं तत्र चकार नृपसत्तमः ॥ ४३ | विद्वानोंने स्वयंवरके तीन प्रकार बताये हैं। वह क्षत्रिय राजाओंके विवाहहेतु उचित कहा गया है, अन्यके लिये नहीं। उनमें प्रथम इच्छास्वयंवर है, जिसमें कन्या अपने इच्छानुसार पति स्वीकार करती है। दूसरा पणस्वयंवर है, जिसमें किसी प्रकारका पण (शर्त) रखा जाता है। जैसे भगवान् श्रीरामने [जानकीके स्वयंवरमें] शिवधनुष तोड़ा था। तीसरा स्वयंवर शौर्यशुल्क है, जो शूरवीरोंके लिये कहा गया है। नृपश्रेष्ठ सुबाहुने उनमें इच्छास्वयंवरका आयोजन किया ॥ ४१—४३ ॥ | | शिल्पिभिः कारिता मञ्चाः शुभैरास्तरणैर्युताः।<br>ततश्च विविधाकाराः सुक्लृप्ताः सभ्यमण्डपाः ॥ ४४ | शिल्पियोंद्वारा बहुत-से मंच बनवाये गये और उनपर सुन्दर आसन बिछाये गये। तत्पश्चात् राजाओंके बैठनेयोग्य विविध आकार-प्रकारके सभामण्डप बनवाये गये ॥ ४४ ॥ | | एवं कृतेऽतिसम्भा‌रे विवाहार्थं सुविस्तरे।<br>सखीं शशिकला प्राह दुःखिता चारुलोचना ॥ ४५<br><br>इदं मे मातरं ब्रूहि त्वमेकान्ते वचो मम।<br>मया वृतः पतिश्चित्ते ध्रुवसंधिसुतः शुभः ॥ ४६<br><br>नान्यं वरं वरिष्यामि तमृते वै सुदर्शनम्।<br>स मे भर्ता नृपसुतो भगवत्या प्रतिष्ठितः ॥ ४७ | इस प्रकार विवाहके लिये सम्पूर्ण सामग्री जुट जानेपर सुन्दर नेत्रोंवाली शशिकलाने दुःखित होकर अपनी सखीसे कहा—एकान्तमें जाकर तुम मेरी मातासे मेरा यह वचन कह दो कि मैंने अपने मनमें ध्रुवसन्धिके सुन्दर पुत्रका पतिरूपमें वरण कर लिया है। उन सुदर्शनके अतिरिक्त मैं किसी दूसरेको पति नहीं बनाऊँगी; क्योंकि स्वयं भगवतीने राजकुमार सुदर्शनको मेरा पति निश्चित कर दिया है ॥ ४५—४७ ॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा सखी गत्वा मातरं प्राह सत्वरा।<br>वैदर्भी विजने वाक्यं मधुरं मञ्जुभाषिणी ॥ ४८ | व्यासजी बोले—उसके ऐसा कहनेपर उस मृदुभाषिणी सखीने शशिकलाकी माता विदर्भसुताके पास शीघ्र जाकर एकान्तमें उनसे मधुर वाणीमें कहा— |