देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 347, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ ] |
|---|
| पुत्री ते दुःखिता प्राह साध्वि त्वां मन्मुखेन यत्।<br>शृणु त्वं कुरु कल्याणि तद्धितं त्वरिताधुना॥ ४९<br><br>भारद्वाजाश्रमे पुण्ये ध्रुवसन्धिंसुतोऽस्ति यः।<br>स मे भर्त्ता वृतश्चित्ते नान्यं भूपं वृणोम्यहम्॥ ५० | ‘हे साध्वि! आपकी पुत्रीने अत्यन्त दुःखित होकर मेरे मुखसे आपको जो कहलाया है, उसे आप सुन लें और हे कल्याणि! इस समय शीघ्र ही उसका हित-साधन करें’। [उसका कथन है कि] भारद्वाजमुनिके आश्रममें जो ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शन रहते हैं, उनका मैं अपने मनमें पतिरूपमें वरण कर चुकी हूँ। अतः मैं किसी दूसरे राजाका वरण नहीं करूँगी॥ ४८-५०॥ | | व्यास उवाच<br>राज्ञी तद्वचनं श्रुत्वा स्वपतौ गृहमागते।<br>निवेदयामास तदा पुत्रीवाक्यं यथातथम्॥ ५१ | व्यासजी बोले—वह वचन सुनकर रानीने राजाके आनेपर पुत्रीकी सारी बातें ज्यों-की-त्यों उनको बतायीं॥ ५१॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं राजा विस्मितः प्रहसन्मुहुः।<br>भार्यामुवाच वैदर्भीं सुबाहुस्तु ऋतं वचः॥ ५२ | उसे सुनकर राजा सुबाहु आश्चर्यमें पड़ गये और बार-बार मुसकराते हुए वे अपनी भार्या विदर्भराजकुमारीसे यथार्थ बात कहने लगे—॥ ५२॥ | | सुभ्रु जानासि बालोऽसौ राज्यान्निष्कासितो वने।<br>एकाकी सह मात्रा वै वसते निर्जने वने॥ ५३ | हे सुभ्रु! तुम तो यह जानती ही हो कि वह बालक राज्यसे निकाल दिया गया है और निर्जन वनमें अकेले ही अपनी माताके साथ रहता है। उसीके लिये राजा वीरसेन युधाजित्के द्वारा मार डाले गये। | | तत्कृते निहतो राजा वीरसेनो युधाजिता।<br>स कथं निर्धनो भर्त्ता योग्यः स्याच्चारुलोचने॥ ५४ | हे सुनयने! वह निर्धन योग्य पति कैसे हो सकता है?॥ ५३-५४॥ | | ब्रूहि पुत्रीं ततो वाक्यं कदाचिदपि विप्रियम्।<br>आगमिष्यन्ति राजानः स्थितिमन्तः स्वयंवरे॥ ५५ | तुम यह बात पुत्री शशिकलासे कह दो कि बड़े-से-बड़े प्रतिष्ठित राजा इस स्वयंवरमें आनेवाले हैं। अतः उनके प्रति ऐसी अप्रिय बात वह कभी भी न बोले॥ ५५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे शशिकलया मातरं प्रति संदेशप्रेषणं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
### अथैकोनविंशोऽध्यायः
#### माताका शशिकलाको समझाना, शशिकलाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना, सुदर्शन तथा अन्य राजाओंका स्वयंवरमें आगमन, युधाजित्द्वारा सुदर्शनको मार डालनेकी बात कहनेपर केरलनरेशका उन्हें समझाना
| व्यास उवाच<br>भर्त्रा साभिहिता बालां पुत्रीं कृत्वाङ्कसंस्थिताम्।<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णं समाश्वास्य शुचिस्मिताम्॥ १<br><br>किं वृथा सुदति त्वं हि विप्रियं मम भाषसे।<br>पिता ते दुःखमाप्नोति वाक्येनानेन सुव्रते॥ २ | व्यासजी बोले—पतिके ऐसा कहनेपर रानीने सुन्दर मुसकानवाली उस कन्याको अपनी गोदमें बैठाकर उसे आश्वासन दे करके यह मधुर वचन कहा—हे सुदति! तुम मुझसे ऐसी अप्रिय एवं निष्प्रयोजन बात क्यों कह रही हो? हे सुव्रते! इस कथनसे तुम्हारे पिता बहुत दुःखित हो रहे हैं॥ १-२॥ |