देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 348, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 348
अ० १९] तृतीय स्कन्ध ३३९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सुदर्शनोऽतिदुर्भाग्यो राज्यभ्रष्टो निराश्रयः।<br>बलकोषविहीनश्च परित्यक्तस्तु बान्धवैः॥ ३<br><br>मात्रा सह वनं प्राप्तः फलमूलाशनः कृशः।<br>न ते योग्यो वरोऽयं वै वनवासी च दुर्भगः॥ ४ | वह सुदर्शन बड़ा ही अभागा, राज्यच्युत, आश्रयहीन और सेना तथा कोशसे विहीन है; बन्धु-बान्धवोंने उसका परित्याग कर दिया है। वह अपनी माताके साथ वनमें रहकर फल-मूल खाता है और अत्यन्त दुर्बल है। इसलिये वह मन्दभाग्य एवं वनवासी बालक सर्वथा तुम्हारे योग्य वर नहीं है॥ ३-४॥ |
| राजपुत्राः कृतप्रज्ञा रूपवन्तः सुसम्मताः।<br>त्वदर्हाः पुत्रि सन्त्यन्ये राजचिह्नैरलङ्कृताः॥ ५<br><br>भ्रातास्य वर्तते कान्तः स राज्यं कोसलेषु वै।<br>करोति रूपसम्पन्नः सर्वलक्षणसंयुतः॥ ६ | हे पुत्रि! तुम्हारे योग्य अनेक राजकुमार यहाँ उपस्थित हैं; जो बुद्धिमान्, रूपवान्, सम्माननीय और राजचिह्नोंसे अलंकृत हैं। इसी सुदर्शनका एक कान्तिमान्, रूपसम्पन्न तथा सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त भाई भी है, जो इस समय कोसलदेशमें राज्य करता है॥ ५-६॥ |
| अन्यच्च कारणं सुभ्रु शृणु यच्च मया श्रुतम्।<br>युधाजित्सततं तस्य वधकामोऽस्ति भूमिपः॥ ७ | हे सुभ्रु! इसके अतिरिक्त मैंने एक और जो बात सुनी है, तुम उसे सुनो—राजा युधाजित् उस सुदर्शनका वध करनेके लिये सतत प्रयत्नशील रहता है॥ ७॥ |
| दौहित्रः स्थापितस्तेन राज्ये कृत्वातिसङ्गरम्।<br>वीरसेनं नृपं हत्वा सम्मन्त्र्य सचिवैः सह॥ ८<br><br>भारद्वाजाश्रमं प्राप्तं हन्तुकामः सुदर्शनम्।<br>मुनिना वारितः पश्चाज्जगाम निजमन्दिरम्॥ ९ | उसने घोर संग्राम करके [इसके नाना] राजा वीरसेनको मारकर पुनः मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा करके अपने दौहित्र शत्रुजित्को राज्यपर अभिषिक्त कर दिया है। इसके बाद भारद्वाजमुनिके आश्रममें शरणलिये उस सुदर्शनको मारनेकी इच्छासे वह वहाँ भी पहुँचा, किंतु मुनिके मना करनेपर अपने घर लौट गया॥ ८-९॥ |
| शशिकलोवाच<br>मातर्ममेप्सितः कामं वनस्थोऽपि नृपात्मजः।<br>शर्यातिवचनेनैव सुकन्या च पतिव्रता॥ १०<br><br>च्यवनञ्च यथा प्राप्य पतिशुश्रूषणे रता।<br>पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां स्वर्गदं मोक्षदं तथा॥ ११<br><br>अकैतवकृतं नूनं सुखदं भवति स्त्रियाः। | शशिकला बोली— हे माता! मुझे तो वह वनवासी राजकुमार ही अत्यन्त अभीष्ट है। [पूर्वकालमें] शर्यातिकी आज्ञासे ही उनकी पतिव्रता पुत्री सुकन्या च्यवनमुनिके पास जाकर उनकी सेवामें तत्पर हो गयी थी। उसी प्रकार मैं पतिसेवा करूँगी; पतिकी सेवा-शुश्रूषा स्त्रियोंके लिये स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली होती है। अपने पतिके लिये कपटरहित व्यवहार स्त्रियोंके लिये निश्चित रूपसे सुखदायक होता है॥ १०-११ १/२॥ |
| भगवत्या समादिष्टं स्वप्ने वरमनुत्तमम्॥ १२<br><br>तमृतेऽहं कथं चान्यं संश्रयामि नृपात्मजम्।<br>मच्चित्तभित्तौ लिखितो भगवत्या सुदर्शनः॥ १३<br><br>तं विहाय प्रियं कान्तं करिष्येऽहं न चापरम्। | स्वयं भगवती उस सर्वश्रेष्ठ वरका वरण करनेके लिये मुझे स्वप्नमें आज्ञा दे चुकी हैं। अतः उनको छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारका वरण कैसे करूँ? स्वयं भगवतीने मेरे चित्तकी भित्तिपर सुदर्शनको ही अंकित कर दिया है। अतः उस प्रिय सुदर्शनको छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारको पति नहीं बनाऊँगी॥ १२-१३ १/२॥ |