भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 349
३४०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९

| व्यास उवाच<br>प्रत्यादिष्टाथ वैदर्भी तया बहुनिदर्शनैः ॥ १४<br><br>भर्तारं सर्वमाचष्ट पुत्र्योक्तं वचनं भृशम् ।<br>विवाहस्य दिनादर्वागाप्तं श्रुतसमन्वितम् ॥ १५<br><br>द्विजं शशिकला तत्र प्रेषयामास सत्वरम् ।<br>यथा न वेद मे तातस्तथा गच्छ सुदर्शनम् ॥ १६ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उस समय उस शशिकलाने अनेक प्रमाणोंके द्वारा विदर्भराजकुमारी अपनी माताको समझा दिया। तत्पश्चात् पुत्रीके द्वारा कही गयी सभी बातोंको महारानीने अपने पतिसे बताया॥ १४ १/२॥<br>उधर शशिकलाने विवाहके कुछ दिनों पूर्व ही एक विश्वस्त तथा वेदनिष्ठ ब्राह्मणको शीघ्र ही वहाँ भेज दिया। [जाते समय उसने ब्राह्मणसे कहा कि] आप सुदर्शनके पास इस प्रकार जायें, जिसे मेरे पिता न जान पायें॥ १५-१६॥ | | भारद्वाजाश्रमे ब्रूहि मद्वाक्यात्त्वरसा विभो ।<br>पित्रा मे सम्भृतः कामं मदर्थेन स्वयंवरः ॥ १७<br><br>आगमिष्यन्ति राजानो बलयुक्ता ह्यनेकंशः ।<br>मया त्वं वै वृतश्चित्ते सर्वथा प्रीतिपूर्वकम् ॥ १८<br><br>भगवत्या समादिष्टः स्वप्ने मम सुरोपम ।<br>विषमद्य हुताशे वा प्रपतामि प्रदीपिते ॥ १९<br><br>वरये त्वदृते नान्यं पितृभ्यां प्रेरितापि वा ।<br>मनसा कर्मणा वाचा संवृतस्त्वं मया वरः ॥ २०<br><br>भगवत्याः प्रसादेन शर्मावाभ्यां भविष्यति ।<br>आगन्तव्यं त्वयात्रैव दैवं कृत्वा परं बलम् ॥ २१<br><br>यदधीनं जगत्सर्वं वर्तते सचराचरम् ।<br>भगवत्या यदादिष्टं न तन्मिथ्या भविष्यति ॥ २२<br><br>यद्वशे देवताः सर्वा वर्तन्ते शङ्करादयः ।<br>वक्तव्योऽसौ त्वया ब्रह्मन्नेकान्ते वै नृपात्मजः ॥ २३ | हे विभो! आप बहुत शीघ्र ही भारद्वाजके आश्रम पहुँचकर सुदर्शनको मेरी ओरसे कहिये कि मेरे पिताने मेरे विवाहार्थ एक स्वयंवर आयोजित किया है; उसमें अनेक बलवान् राजा आयेंगे, किंतु मैं तो मनसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक हर तरहसे आपका वरण कर चुकी हूँ। हे देवोपम राजकुमार! मुझे भगवतीने स्वप्नमें आपको वरण करनेका आदेश दिया है। मैं विष खा लूँगी अथवा जलती हुई अग्निमें कूद पडूँगी, किंतु माता-पिताके द्वारा बहुत प्रेरित किये जानेपर भी मैं आपके अतिरिक्त किसी अन्यका वरण नहीं करूँगी; क्योंकि मैं मन, वचन तथा कर्मसे आपको अपना पति मान चुकी हूँ। भगवतीकी कृपासे हम दोनोंका कल्याण होगा। प्रारब्धको प्रबल मानकर आप इस स्वयंवरमें अवश्य आयें। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् जिनके अधीन है तथा शंकर आदि सभी देवगण जिनके वशमें रहते हैं, उन भगवतीने जो आदेश दिया है, वह कभी भी असत्य नहीं होगा। हे ब्रह्मन्! आप उस राजकुमारसे यह सब एकान्तमें बताइयेगा। हे निष्पाप! आप वही कीजियेगा, जिससे मेरा काम बन जाय॥ १७—२३ १/२॥ | | यथा भवति मे कार्यं तत्कर्तव्यं त्वयानघ ।<br>इत्युक्त्वा दक्षिणां दत्त्वा मुनिर्व्यापारितस्तया ॥ २४<br><br>गत्वा सर्वं निवेद्याशु तत्र प्रत्यागतो द्विजः ।<br>सुदर्शनस्तु तज्ज्ञात्वा निश्चयं गमने तदा ॥ २५<br><br>चकार मुनिना तेन प्रेरितः परमादरात् । | ऐसा कहकर और दक्षिणा देकर शशिकलाने उस ब्राह्मणको भेज दिया। वह ब्राह्मण सुदर्शनसे सारी बातें कहकर शीघ्र ही वापस आ गया। उन बातोंको जानकर राजकुमार सुदर्शनने स्वयंवरमें जानेका निश्चय कर लिया; उन भारद्वाजमुनिने भी उसे आदरपूर्वक भेज दिया॥ २४-२५ १/२॥ |