देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 350, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 350
| अ० १९ ] | तृतीय स्कन्ध | ३४१ | | :--- | :--- |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| गमनायोद्यतं पुत्रं तमुवाच मनोरमा ॥ २६<br>वेपमानातिदुःखातार् जातत्रासाश्रुलोचना ।<br>कुत्र गच्छसि पुत्राद्य समाजे भूभृतां किल ॥ २७<br>एकाकी कृतवैरश्च किं विचिन्त्य स्वयंवरे ।<br>युधाजिद्धन्तुकामस्त्वां समेष्यति महीपतिः ॥ २८<br>न तेऽन्योऽस्ति सहायश्च तस्मान्मा व्रज पुत्रक ।<br>एकपुत्रातिदीनास्मि तवाधारा निराश्रया ॥ २९<br>नार्हसि त्वं महाभाग निराशां कर्तुमद्य माम् ।<br>पिता मे निहतो येन सोऽपि तत्रागतो नृपः ॥ ३०<br>एकाकिनं गतं तत्र युधाजित्त्वां हनिष्यति । | तब अत्यधिक दुःखसे व्याकुल, काँपती हुई तथा भयभीत मनोरमा गमनके लिये तत्पर अपने पुत्र सुदर्शनसे आँखोंमें आँसू भरकर बोली—पुत्र ! तुम इस समय राजाओंके उस समाजमें कहाँ जा रहे हो ? तुम अकेले हो और तुमसे शत्रुता रखनेवाला राजा युधाजित् तुम्हें मारनेकी इच्छासे उस स्वयंवरमें अवश्य आयेगा, फिर तुम क्या सोचकर वहाँ जा रहे हो ? तुम्हारा कोई सहायक भी नहीं है। इसलिये हे पुत्र ! वहाँ मत जाओ। तुम ही मेरे एकमात्र पुत्र हो और मैं अति दीन हूँ तथा मुझ आश्रयहीनके लिये तुम्हीं एकमात्र आधार हो। हे महाभाग ! इस समय तुम मुझे निराश मत करो। जिसने मेरे पिताका वध कर दिया है, वह राजा युधाजित् भी वहाँ आयेगा और वहाँ तुझ अकेले गये हुएको मार डालेगा॥ २६–३० १/२ ॥ |
| सुदर्शन उवाच | सुदर्शन बोला— |
| भवितव्यं भवत्येव नात्र कार्या विचारणा ॥ ३१<br>आदेशाच्च जगन्मातुर्गच्छाम्यद्य स्वयंवरे ।<br>मा शोकं कुरु कल्याणि क्षत्रियासि वरानने ॥ ३२<br>न बिभेमि प्रसादेन भगवत्या निरन्तरम् । | होनी तो होकर रहती है, इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये। हे कल्याणि ! जगज्जननीके आदेशसे मैं आज स्वयंवरमें जा रहा हूँ। हे वरानने ! तुम क्षत्राणी हो, अतः इस विषयमें चिन्ता मत करो। भगवतीकी सदा अपने ऊपर कृपा रहनेके कारण मैं किसीसे भी भयभीत नहीं होता॥ ३१–३२ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| इत्युक्त्वा रथमारुह्य गन्तुकामं सुदर्शनम् ॥ ३३<br>दृष्ट्वा मनोरमा पुत्रमाशीर्भिdocश्चान्वमोदयत् ।<br>अग्रतस्तेऽम्बिका पातु पार्वती पातु पृष्ठतः ॥ ३४<br>( पार्वती पार्श्वयोः पातु शिवा सर्वत्र साम्प्रतम् । )<br>वाराही विषमे मार्गे दुर्गा दुर्गेषु कर्हिचित् ।<br>कालिका कलहे घोरे पातु त्वां परमेश्वरी ॥ ३५<br>मण्डपे तत्र मातङ्गी तथा सौम्या स्वयंवरे ।<br>भवानी भूपमध्ये तु पातु वां भवमोचनी ॥ ३६<br>गिरिजा गिरिदुर्गेषु चामुण्डा चत्वरेषु च ।<br>कामगा काननेष्वेवं रक्षतु त्वां सनातनी ॥ ३७<br>विवादे वैष्णवी शक्तिरक्षतात्त्वां रघूद्वह ।<br>भैरवी च रणे सौम्य शत्रूणां वै समागमे ॥ ३८<br>सर्वदा सर्वदेशेषु पातु त्वां भुवनेश्वरी ।<br>महामाया जगद्धात्री सच्चिदानन्दरूपिणी ॥ ३९ | ऐसा कहकर रथपर आरूढ़ होकर स्वयंवरमें जानेके लिये उद्यत पुत्र सुदर्शनको देखकर मनोरमाने इन आशीर्वादोंसे उसका अनुमोदन किया—भगवती अम्बिका आगेसे, पार्वती पीछेसे, (पार्वती दोनों पार्श्वभागमें तथा शिवा सर्वत्र तुम्हारी रक्षा करें।) विषम मार्गमें वाराही, किसी भी प्रकारके दुर्गम स्थानोंमें दुर्गा और भयानक संग्राममें परमेश्वरी कालिका तुम्हारी रक्षा करें। उस मण्डपमें देवी मातंगी, स्वयंवरमें भगवती सौम्या तथा भव-बन्धनसे मुक्त करनेवाली भवानी राजाओंके बीचमें तुम्हारी रक्षा करें। इसी प्रकार पर्वतीय दुर्गम स्थानोंमें गिरिजा, चौराहोंपर देवी चामुण्डा तथा वनोंमें सनातनी कामगादेवी तुम्हारी रक्षा करें। हे रघूद्वह ! विवादमें भगवती वैष्णवी तुम्हारी रक्षा करें। हे सौम्य ! शत्रुओंके साथ युद्धमें भैरवी तुम्हारी रक्षा करें। जगत्को धारण करनेवाली सच्चिदानन्दस्वरूपिणी महामाया भुवनेश्वरी सभी स्थानोंपर सर्वदा तुम्हारी रक्षा करें॥ ३३—३९॥ |