भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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३४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इत्युक्त्वा तं तदा माता वेपमाना भयाकुला।<br>उवाचाहं त्वया सार्धमागमिष्यामि सर्वथा॥ ४०<br><br>निमिषार्धं विना त्वां वै नाहं स्थातुमिहोत्सहे।<br>सहैव नय मां वत्स यत्र ते गमने मतिः॥ ४१—ऐसा कहकर भयसे व्याकुल तथा काँपती हुई उसकी माता मनोरमाने उससे कहा—मैं भी तुम्हारे साथ अवश्य चलूँगी। हे पुत्र! मैं तुम्हारे बिना आधे क्षण भी यहाँ नहीं रह सकती, अतएव तुम्हारी जहाँ जानेकी इच्छा है, वहीं मुझे भी अपने साथ ले चलो॥ ४०-४१॥
इत्युक्त्वा निःसृता माता धात्रेयीसंयुता तदा।<br>विप्रैर्दत्ताशिषः सर्वे निर्ययुर्हर्षसंयुताः॥ ४२तब ऐसा कहकर अपनी दासीको साथ लेकर माता मनोरमा चल पड़ीं। ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद प्राप्त करके वे सभी प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े॥ ४२॥
वाराणस्यां ततः प्राप्तो रथेनैकेन राघवः।<br>ज्ञातः सुबाहुना तत्र पूजितश्चार्हणादिभिः॥ ४३<br><br>निवेशार्थं गृहं दत्तमन्नपानादिकं तथा।<br>सेवकं समनुज्ञाप्य परिचर्यार्थमेव च॥ ४४इसके बाद वह रघुवंशी सुदर्शन एक रथपर आरूढ़ होकर वाराणसी पहुँचा। राजा सुबाहुको उसके आनेकी जानकारी होनेपर उन्होंने आदर-सम्मान आदिके द्वारा उसका सत्कार किया। उन लोगोंके निवासके लिये भवन तथा अन्न-जल आदिकी व्यवस्था कर दी तथा उनकी सेवा-शुश्रूषाहेतु सेवकको भी नियुक्त कर दिया॥ ४३-४४॥
मिलितास्त्वथ राजानो नानादेशाधिपाः किल।<br>युधाजिदपि सम्प्राप्तो दौहित्रेण समन्वितः॥ ४५इसके बाद वहाँ अनेक देशोंके राजा-महाराजा एकत्र हुए। वहाँ अपने नातीको साथ लेकर युधाजित् भी आया॥ ४५॥
करूषाधिपतिश्चैव तथा मद्रेश्वरो नृपः।<br>सिन्धुराजस्तथा वीरो योद्धा माहिष्मतीपतिः॥ ४६<br><br>पाञ्चालः पर्वतीयश्च कामरूपोऽतिवीर्यवान्।<br>कार्णाटश्चोलदेशीयो वैदर्भश्च महाबलः॥ ४७करूषाधिपति, मद्रदेशके महाराज, वीर सिन्धुराज, युद्धकुशल माहिष्मतीनरेश, पांचालपति, पर्वतीय राजा, कामरूपदेशके अति पराक्रमी महाराज, कर्णाटकनरेश, चोलराज और महाबली विदर्भनरेश वहाँ आये थे॥ ४६-४७॥
अक्षौहिणी त्रिषष्टिश्च मिलिता संख्यया तदा।<br>वेष्टिता नगरी सा तु सैन्यैः सर्वत्र संस्थितैः॥ ४८उन राजाओंकी कुल मिलाकर तिरसठ अक्षौहिणी सेना थी। वहाँ सर्वत्र स्थित उन सैनिकोंसे वह वाराणसी नगरी पूरी तरहसे घिर गयी॥ ४८॥
एते चान्ये च बहवः स्वयंवरदिदृक्षया।<br>मिलितास्तत्र राजानो वरवारणसंयुताः॥ ४९इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से राजा भी स्वयंवर देखनेकी इच्छासे बड़े-बड़े हाथियोंपर आरूढ़ होकर उस स्वयंवरमें सम्मिलित हुए॥ ४९॥
अन्योन्यं नृपपुत्रास्त इत्यूचुर्मिलितास्तदा।<br>सुदर्शनो नृपसुतो ह्यागतोऽस्ति निराकुलः॥ ५०<br><br>एकाकी रथमारुह्य मात्रा सह महामतिः।<br>विवाहार्थमिहायातः काकुत्स्थः किन्तु साम्प्रतम्॥ ५१<br><br>एतान् राजसुतांस्त्यक्त्वा ससैन्यान्सायुधानथ।<br>किमेनं राजपुत्री सा वरिष्यति महाभुजम्॥ ५२उस समय सभी राजकुमार आपसमें मिलकर कहने लगे कि राजकुमार सुदर्शन भी निश्चिन्त होकर यहाँ आया है। वह महाबुद्धिमान् सूर्यवंशी सुदर्शन अपनी माताके साथ इस समय अकेला ही रथपर चढ़कर विवाहके लिये यहाँ आ पहुँचा है। सैन्यशक्तिसे सम्पन्न तथा शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित इन राजकुमारोंको छोड़कर क्या वह राजकुमारी बड़ी भुजाओंवाले इस सुदर्शनका वरण करेगी?॥ ५०-५२॥