देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९
३४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इत्युक्त्वा तं तदा माता वेपमाना भयाकुला।<br>उवाचाहं त्वया सार्धमागमिष्यामि सर्वथा॥ ४०<br><br>निमिषार्धं विना त्वां वै नाहं स्थातुमिहोत्सहे।<br>सहैव नय मां वत्स यत्र ते गमने मतिः॥ ४१ | —ऐसा कहकर भयसे व्याकुल तथा काँपती हुई उसकी माता मनोरमाने उससे कहा—मैं भी तुम्हारे साथ अवश्य चलूँगी। हे पुत्र! मैं तुम्हारे बिना आधे क्षण भी यहाँ नहीं रह सकती, अतएव तुम्हारी जहाँ जानेकी इच्छा है, वहीं मुझे भी अपने साथ ले चलो॥ ४०-४१॥ |
| इत्युक्त्वा निःसृता माता धात्रेयीसंयुता तदा।<br>विप्रैर्दत्ताशिषः सर्वे निर्ययुर्हर्षसंयुताः॥ ४२ | तब ऐसा कहकर अपनी दासीको साथ लेकर माता मनोरमा चल पड़ीं। ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद प्राप्त करके वे सभी प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े॥ ४२॥ |
| वाराणस्यां ततः प्राप्तो रथेनैकेन राघवः।<br>ज्ञातः सुबाहुना तत्र पूजितश्चार्हणादिभिः॥ ४३<br><br>निवेशार्थं गृहं दत्तमन्नपानादिकं तथा।<br>सेवकं समनुज्ञाप्य परिचर्यार्थमेव च॥ ४४ | इसके बाद वह रघुवंशी सुदर्शन एक रथपर आरूढ़ होकर वाराणसी पहुँचा। राजा सुबाहुको उसके आनेकी जानकारी होनेपर उन्होंने आदर-सम्मान आदिके द्वारा उसका सत्कार किया। उन लोगोंके निवासके लिये भवन तथा अन्न-जल आदिकी व्यवस्था कर दी तथा उनकी सेवा-शुश्रूषाहेतु सेवकको भी नियुक्त कर दिया॥ ४३-४४॥ |
| मिलितास्त्वथ राजानो नानादेशाधिपाः किल।<br>युधाजिदपि सम्प्राप्तो दौहित्रेण समन्वितः॥ ४५ | इसके बाद वहाँ अनेक देशोंके राजा-महाराजा एकत्र हुए। वहाँ अपने नातीको साथ लेकर युधाजित् भी आया॥ ४५॥ |
| करूषाधिपतिश्चैव तथा मद्रेश्वरो नृपः।<br>सिन्धुराजस्तथा वीरो योद्धा माहिष्मतीपतिः॥ ४६<br><br>पाञ्चालः पर्वतीयश्च कामरूपोऽतिवीर्यवान्।<br>कार्णाटश्चोलदेशीयो वैदर्भश्च महाबलः॥ ४७ | करूषाधिपति, मद्रदेशके महाराज, वीर सिन्धुराज, युद्धकुशल माहिष्मतीनरेश, पांचालपति, पर्वतीय राजा, कामरूपदेशके अति पराक्रमी महाराज, कर्णाटकनरेश, चोलराज और महाबली विदर्भनरेश वहाँ आये थे॥ ४६-४७॥ |
| अक्षौहिणी त्रिषष्टिश्च मिलिता संख्यया तदा।<br>वेष्टिता नगरी सा तु सैन्यैः सर्वत्र संस्थितैः॥ ४८ | उन राजाओंकी कुल मिलाकर तिरसठ अक्षौहिणी सेना थी। वहाँ सर्वत्र स्थित उन सैनिकोंसे वह वाराणसी नगरी पूरी तरहसे घिर गयी॥ ४८॥ |
| एते चान्ये च बहवः स्वयंवरदिदृक्षया।<br>मिलितास्तत्र राजानो वरवारणसंयुताः॥ ४९ | इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से राजा भी स्वयंवर देखनेकी इच्छासे बड़े-बड़े हाथियोंपर आरूढ़ होकर उस स्वयंवरमें सम्मिलित हुए॥ ४९॥ |
| अन्योन्यं नृपपुत्रास्त इत्यूचुर्मिलितास्तदा।<br>सुदर्शनो नृपसुतो ह्यागतोऽस्ति निराकुलः॥ ५०<br><br>एकाकी रथमारुह्य मात्रा सह महामतिः।<br>विवाहार्थमिहायातः काकुत्स्थः किन्तु साम्प्रतम्॥ ५१<br><br>एतान् राजसुतांस्त्यक्त्वा ससैन्यान्सायुधानथ।<br>किमेनं राजपुत्री सा वरिष्यति महाभुजम्॥ ५२ | उस समय सभी राजकुमार आपसमें मिलकर कहने लगे कि राजकुमार सुदर्शन भी निश्चिन्त होकर यहाँ आया है। वह महाबुद्धिमान् सूर्यवंशी सुदर्शन अपनी माताके साथ इस समय अकेला ही रथपर चढ़कर विवाहके लिये यहाँ आ पहुँचा है। सैन्यशक्तिसे सम्पन्न तथा शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित इन राजकुमारोंको छोड़कर क्या वह राजकुमारी बड़ी भुजाओंवाले इस सुदर्शनका वरण करेगी?॥ ५०-५२॥ |
अ० १९] तृतीय स्कन्ध ३४३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| युधाजिदथ राजेशस्तानुवाच महीपतीन्।<br>अहमेनं हनिष्यामि कन्यार्थे नात्र संशयः॥ ५३ | इसके बाद राजा युधाजित्ने उन नरेशोंसे कहा—राजकुमारीको प्राप्त करनेके लिये मैं इसे मार डालूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है॥ ५३॥ |
| केरलाधिपतिः प्राह तं तदा नीतिसत्तमः।<br>नात्र युद्धं प्रकर्तव्यं राजन्निच्छास्वयंवरे॥ ५४<br><br>बलेन हरणं नास्ति नात्र शुल्कस्वयंवरः।<br>कन्येच्छयात्र वरणं विवादः कीदृशस्त्विह॥ ५५ | तब महान् नीतिज्ञ केरलनरेशने उस युधाजित्से कहा—हे राजन्! इच्छास्वयंवरमें युद्ध नहीं करना चाहिये। यह शुल्कस्वयंवर भी नहीं है, अतः कन्याका बलपूर्वक हरण भी नहीं किया जाना चाहिये। इसमें तो कन्याकी इच्छासे पति चुनना निर्धारित है; तो फिर इसमें विवाद कैसा?॥ ५४-५५॥ |
| अन्यायेन त्वया पूर्वमसौ राज्यात्प्रवासितः।<br>दौहित्रायार्पितं राज्यं बलवन्नृपसत्तम॥ ५६ | हे नृपश्रेष्ठ! आपने पहले तो इस सुदर्शनको अन्यायपूर्वक राज्यसे निकाल दिया और अपने दौहित्रको बलपूर्वक उस राज्यका स्वामी बना दिया॥ ५६॥ |
| काकुत्स्थोऽयं महाभाग कोसलाधिपतेः सुतः।<br>कथमेनं राजपुत्रं हनिष्यसि निरागसम्॥ ५७ | हे महाभाग! यह सूर्यवंशी राजकुमार कोसल-नरेशका सुपुत्र है। इस निरपराध राजकुमारका वध आप क्यों करेंगे?॥ ५७॥ |
| लप्स्यसे तत्फलं नूनमनयस्य नृपोत्तम।<br>शास्तास्ति कश्चिदायुष्मञ्जगतोऽस्य जगत्पतिः॥ ५८ | हे नृपोत्तम! आपको अन्यायका फल अवश्य ही मिलेगा। हे आयुष्मन्! इस संसारपर शासन करनेवाला कोई और ही जगत्पति परमेश्वर है॥ ५८॥ |
| धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम्।<br>मानयं कुरु राजेन्द्र त्यज पापमतिं किल॥ ५९ | धर्मकी जय होती है, अधर्मकी नहीं। सत्यकी जय होती है, असत्यकी नहीं। अतएव हे राजेन्द्र! आप अन्याय न कीजिये और इस प्रकारके पापमय विचारका सर्वथा परित्याग कर दीजिये॥ ५९॥ |
| दौहित्रस्तव सम्प्राप्तः सोऽपि रूपसमन्वितः।<br>राज्ययुक्तस्तथा श्रीमान् कथं तं न वरिष्यति॥ ६० | आपका दौहित्र यहाँ आया ही है। वह भी अत्यन्त रूपवान् और राज्य तथा लक्ष्मीसे सम्पन्न है; तब भला कन्या उसका वरण क्यों नहीं करेगी?॥ ६०॥ |
| अन्ये राजसुताः कामं वर्तन्ते बलवत्तराः।<br>कन्यास्वयंवरे कन्या स्वीकरिष्यति साम्प्रतम्॥ ६१ | अन्य एकसे बढ़कर एक बलवान् राजकुमार आये हैं। इस स्वयंवरमें कन्या शशिकला किसी भी राजकुमारको अपनी इच्छासे चुन लेगी॥ ६१॥ |
| वृते तथा विवादः कः प्रवदन्तु महीभुजः।<br>परस्परं विरोधोऽत्र न कर्तव्यो विजानता॥ ६२ | हे राजागण! अब आप ही लोग बतायें कि इस प्रकारके विवाहमें विवाद ही क्या? विवेकवान् पुरुषको इस विषयमें परस्पर विरोधभाव नहीं रखना चाहिये॥ ६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां तृतीयस्कन्धे राजसंवादवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
| ३४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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अथ विंशोऽध्यायः
राजाओंका सुदर्शनसे स्वयंवरमें आनेका कारण पूछना और सुदर्शनका उन्हें स्वप्नमें भगवतीद्वारा दिया गया आदेश बताना, राजा सुबाहुका शशिकलाको समझाना, परंतु उसका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इतिवादिनि भूपाले केरलाधिपतौ तदा।<br>प्रत्युवाच महाभाग युधाजिदपि पार्थिवः॥ १ | हे महाभाग! तब महाराज केरल-नरेशके ऐसा कहनेपर राजा युधाजित्ने कहा— ॥ १ ॥ |
| नीतिरेषा महीपाल यद् ब्रवीति भवानिह।<br>समाजे पार्थिवानां वै सत्यवाग्विजितेन्द्रियः॥ २ | हे पृथ्विपते! आपने अभी-अभी जो कहा है, क्या यही नीति है? राजाओंके समाजमें आप तो सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय माने जाते हैं॥ २॥ |
| योग्येषु वर्तमानेषु कन्यारत्नं कुलोद्वह।<br>अयोग्योऽर्हति भूपाल न्यायोऽयं तव रोचते॥ ३ | हे कुलोद्वह! हे राजन्! योग्य राजाओंके रहते हुए एक अयोग्य व्यक्ति कन्यारत्नको प्राप्त कर ले, क्या यही न्याय आपको अच्छा लगता है?॥ ३॥ |
| भागं सिंहस्य गोमायुर्भोंक्तुमर्हति वा कथम्।<br>तथा सुदर्शनोऽयं वै कन्यारत्नं किमर्हति॥ ४ | एक सियार सिंहके भागको खानेका अधिकारी कैसे हो सकता है? उसी प्रकार क्या यह सुदर्शन इस कन्यारत्नको पानेकी योग्यता रखता है?॥ ४॥ |
| बलं वेदो हि विप्राणां भूभुजां चापजं बलम्।<br>किमन्याय्यं महाराज ब्रवीम्यहमिहाधुना॥ ५ | ब्राह्मणोंका बल वेद है और राजाओंका बल धनुष। हे महाराज! क्या मैं इस समय अन्यायपूर्ण बात कह रहा हूँ?॥ ५॥ |
| बलं शुल्कं यथा राज्ञां विवाहे परिकीर्तितम्।<br>बलवानेव गृह्णातु नाबलस्तु कदाचन॥ ६ | राजाओंके विवाहमें बलको ही शुल्क कहा गया है। यहाँ जो भी बलशाली हो, वह कन्यारत्नको प्राप्त कर ले; बलहीन इसे कदापि नहीं पा सकता॥ ६॥ |
| तस्मात्कन्यापणं कृत्वा नीतिरत्र विधीयताम्।<br>अन्यथा कलहः कामं भविष्यति महीभुजाम्॥ ७ | अतएव कन्याके लिये कोई शर्त निर्धारित करके ही राजकुमारीका विवाह हो—यही नीति इस अवसरपर अपनायी जानी चाहिये; अन्यथा राजाओंमें परस्पर घोर कलहकी स्थिति उत्पन्न हो जायगी॥ ७॥ |
| एवं विवादे संवृत्ते राज्ञां तत्र परस्परम्।<br>आहूतस्तु सभामध्ये सुबाहुर्नृपसत्तमः॥ ८ | इस प्रकार वहाँ राजाओंमें परस्पर विवाद उत्पन्न हो जानेपर नृपश्रेष्ठ सुबाहु सभामें बुलाये गये॥ ८॥ |
| समाहूय नृपाः सर्वे तमूचुस्तत्त्वदर्शिनः।<br>राजनीतिस्त्वया कार्या विवाहेऽत्र समाहिता॥ ९<br><br>किं ते चिकीर्षितं राजंस्तद्बदस्व समाहितः।<br>पुत्र्याः प्रदानं कस्मै ते रोचते नृप चेतसि॥ १० | उन्हें बुलवाकर तत्त्वदर्शी राजाओंने उनसे कहा— हे राजन्! इस विवाहमें आप राजोचित नीतिका अनुसरण करें। हे राजन्! आप क्या करना चाहते हैं, उसे सावधान होकर बतायें। हे नृप! आप अपने मनसे इस कन्याको किसे प्रदान करना पसन्द करते हैं?॥ ९-१०॥ |
| सुबाहुरुवाच | सुबाहु बोले— |
| पुत्र्या मे मनसा कामं वृतः किल सुदर्शनः।<br>मया निवारितात्यर्थं न सा प्रत्येति मे वचः॥ ११<br><br>किं करोमि सुताया मे न वशे वर्तते मनः।<br>सुदर्शनस्त्वैकाकी सम्प्राप्तोऽस्ति निराकुलः॥ १२ | मेरी पुत्रीने मन-ही-मन सुदर्शनका वरण कर लिया है। इसके लिये मैंने उसे बहुत रोका, किंतु वह मेरी बात नहीं मानती। मैं क्या करूँ? मेरी पुत्रीका मन वशमें नहीं है और यह सुदर्शन भी निर्भीक होकर यहाँ अकेले आ गया है॥ ११-१२॥ |
| अ० २० ] | तृतीय स्कन्ध | ३४५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br><br>सम्पन्नभूभुजः सर्वे समाहूय सुदर्शनम्।<br>ऊचुः समागतं शान्तमेकाकिनमतन्द्रिताः॥ १३<br><br>राजपुत्र महाभाग केनाहूतोऽसि सुव्रत।<br>एकाकी यः समायातः समाजे भूभृतामिह॥ १४ | व्यासजी बोले—तत्पश्चात् सभी वैभवशाली राजाओंने सुदर्शनको बुलवाया। उस शान्तस्वभाव सुदर्शनसे राजाओंने सावधान होकर पूछा—हे राजपुत्र! हे महाभाग! हे सुव्रत! तुम्हें यहाँ किसने बुलाया है, जो तुम इस राजसमाजमें अकेले ही चले आये हो? ॥ १३-१४॥ |
| न वै सैन्यं न सचिवा न कोशो न बृहद्बलम्।<br>किमर्थञ्च समायातस्तत्त्वं ब्रूहि महामते॥ १५ | तुम्हारे पास न सेना है, न मन्त्री हैं, न कोश है और न अधिक बल ही है। हे महामते! तुम यहाँ किसलिये आये हो? उसे बताओ॥ १५॥ |
| युद्धकामा नृपतयो वर्तन्तेऽत्र समागमे।<br>कन्यार्थं सैन्यसम्पन्नाः किं त्वं कर्तुमिहेच्छसि॥ १६ | युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले बहुत-से राजागण इस कन्याको प्राप्त करनेकी इच्छासे अपनी-अपनी सेनासहित इस समाजमें विद्यमान हैं। यहाँ तुम क्या करना चाहते हो? ॥ १६॥ |
| भ्राता ते सुबलः शूरः सम्प्राप्तोऽस्ति जिघृक्षया।<br>युधाजिच्च महाबाहुः साहाय्यं कर्तुमागतः॥ १७ | तुम्हारा शूरवीर भाई शत्रुजित् भी एक महान् सेनाके साथ राजकुमारीको प्राप्त करनेकी इच्छासे यहाँ आया हुआ है और उसकी सहायता करनेके लिये महाबाहु युधाजित् भी आये हैं॥ १७॥ |
| गच्छ वा तिष्ठ राजेन्द्र याथातथ्यमुदाहृतम्।<br>त्वयि सैन्यविहीने च यथेष्टं कुरु सुव्रत॥ १८ | हे राजेन्द्र! तुम जाओ अथवा रहो। हमने तो सारी वास्तविकता तुम्हें बतला दी; क्योंकि तुम सेना-विहीन हो। हे सुव्रत! अब तुम्हारी जो इच्छा हो, वह करो॥ १८॥ |
| सुदर्शन उवाच<br><br>न बलं न सहायो मे न कोशो दुर्गसंश्रयः।<br>न मित्राणि न सौहार्दी न नृपा रक्षका मम॥ १९ | सुदर्शन बोला—मेरे पास न सेना है, न कोई सहायक है, न खजाना है, न सुरक्षित किला है, न मित्र हैं, न सुहृद् हैं तथा न तो मेरी रक्षा करनेवाले कोई राजा ही हैं॥ १९॥ |
| अत्र स्वयंवरं श्रुत्वा द्रष्टुकाम इहागतः।<br>स्वप्ने देव्या प्रेरितोऽस्मि भगवत्या न संशयः॥ २० | यहाँपर स्वयंवर होनेका समाचार सुनकर उसे देखनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। देवी भगवतीने स्वप्नमें मुझे यहाँ आनेकी प्रेरणा दी है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०॥ |
| नान्यच्चिकीर्षितं मेऽद्य मामाह जगदीश्वरी।<br>तया यद्विहितं तच्च भविताद्य न संशयः॥ २१ | मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है। मुझे यहाँ आनेके लिये जगज्जननी भगवतीने आदेश दिया है। उन्होंने जो विधान रच दिया होगा, वह होकर ही रहेगा; इसमें कोई संशय नहीं है॥ २१॥ |
| न शत्रुरस्ति संसारे कोऽप्यत्र जगतीश्वराः।<br>सर्वत्र पश्यतो मेऽद्य भवानीं जगदम्बिकाम्॥ २२ | हे राजागण! इस संसारमें मेरा कोई शत्रु नहीं है। मैं सर्वत्र भवानी जगदम्बाको विराजमान देख रहा हूँ॥ २२॥ |
| ३४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| यः करिष्यति शत्रुत्वं मया सह नृपात्मजाः।<br>शास्ता तस्य महाविद्या नाहं जानामि शत्रुताम्॥ २३ | हे राजकुमारो! जो कोई भी प्राणी मुझसे शत्रुता करेगा, उसे महाविद्या जगदम्बा दण्डित करेंगी; मैं तो वैर-भाव जानता ही नहीं॥ २३॥ | | यद्भावि तद्वै भविता नान्यथा नृपसत्तमाः।<br>का चिन्ता ह्यत्र कर्तव्या दैवाधीनोऽस्मि सर्वदा॥ २४ | हे श्रेष्ठ राजाओ! जो होना है, वह अवश्य ही होगा; उसके विपरीत कुछ भी नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें क्या चिन्ता की जाय? मैं तो सदा प्रारब्धपर भरोसा करता हूँ?॥ २४॥ | | देवभूतमनुष्येषु सर्वभूतेषु सर्वदा।<br>सर्वेषां तत्कृता शक्तिर्नान्यथा नृपसत्तमाः॥ २५ | हे श्रेष्ठ राजाओ! देवताओं, दानवों, मनुष्यों तथा सभी प्राणियोंमें एकमात्र जगदम्बाकी शक्ति ही विद्यमान है। उनके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है॥ २५॥ | | सा यं चिकीर्षते भूपं तं करोति नृपाधिपाः।<br>निर्धनं वा नरं कामं का चिन्ता वै तदा मम॥ २६ | हे महाराजाओ! वे जिस मनुष्यको राजा बनाना चाहती हैं, उसे राजा बना देती हैं और जिसे निर्धन बनाना चाहती हैं, उसे निर्धन बना देती हैं; तब मुझे किस बातकी चिन्ता?॥ २६॥ | | तामृते परमां शक्तिं ब्रह्मविष्णुहरादयः।<br>न शक्ताः स्पन्दितुं देवाः का चिन्ता मे तदा नृपाः॥ २७ | हे राजाओ! ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता भी उन महाशक्तिके बिना हिलने-डुलनेमें भी समर्थ नहीं हैं, तब मुझे क्या चिन्ता?॥ २७॥ | | अशक्तो वा सशक्तो वा यादृशस्तादृशस्त्वहम्।<br>तदाज्ञया नृपाद्यैव सम्प्राप्तोऽस्मि स्वयंवरे॥ २८ | मैं शक्तिसम्पन्न हूँ या शक्तिहीन, जैसा भी हूँ वैसा आपके समक्ष हूँ। हे राजाओ! मैं उन्हीं भगवतीकी आज्ञासे ही इस स्वयंवरमें आया हुआ हूँ॥ २८॥ | | सा यदिच्छति तत्कुर्यान्मम किं चिन्तनेन वै।<br>नात्र शङ्का प्रकर्तव्या सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ २९ | वे भगवती जो चाहेंगीं, सो करेंगीं। मेरे सोचनेसे क्या होगा? मैं यह सत्य कह रहा हूँ, इस विषयमें शंका नहीं करनी चाहिये॥ २९॥ | | जये पराजये लज्जा न मेऽत्राण्वपि पार्थिवाः।<br>भगवत्यास्तु लज्जास्ति तदधीनोऽस्मि सर्वथा॥ ३० | हे राजाओ! जय अथवा पराजयमें मुझे अणुमात्र भी लज्जा नहीं है। लज्जा तो उन भगवतीको होगी; क्योंकि मैं तो सर्वथा उन्हींके अधीन हूँ॥ ३०॥ | | व्यास उवाच<br>इति तस्य तदाकर्ण्य वचनं राजसत्तमाः।<br>ऊचुः परस्परं प्रेक्ष्य निश्चयज्ञा नराधिपाः॥ ३१<br><br>सत्यमुक्तं त्वया साधो न मिथ्या कर्हिचिद्भवेत्।<br>तथाप्युज्जयनीनाथस्त्वां हन्तुं परिकाङ्क्षति॥ ३२<br><br>त्वत्कृतेन दयादिष्टा त्वां ब्रवीमो महामते।<br>यदुक्तं तत्त्वया कार्यं विचार्य मनसानघ॥ ३३ | व्यासजी बोले— [हे राजन्!] उस सुदर्शनकी यह बात सुनकर सभी श्रेष्ठ राजागण उसके निश्चयको जान गये और एक-दूसरेको देखकर उन राजाओंने सुदर्शनसे कहा—हे साधो! आपने सत्य कहा है, आपका कथन कभी मिथ्या नहीं हो सकता। तथापि उज्जयिनीपति महाराज युधाजित् आपको मार डालना चाहते हैं। हे महामते! हमें आपके ऊपर दया आ रही है, इसीलिये हमने आपको यह सब बता दिया। हे अनघ! अब आपको जो उचित जान पड़े, वैसा मनसे खूब सोच-समझकर कीजिये॥ ३१—३३॥ |
| अ० २० ] | तृतीय स्कन्ध | ३४७ |
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| सुदर्शन उवाच | |
|---|---|
| सत्यमुक्तं भवद्भिश्च कृपावद्भिः सुहृज्जनैः ।<br>किं ब्रवीमि पुनर्वाक्यमुक्तवा नृपतिसत्तमाः ॥ ३४ | सुदर्शन बोला— आप सब बड़े कृपालु एवं सहृदय-जनोंने सत्य ही कहा है, किंतु हे श्रेष्ठ राजागण ! अब मैं अपनी पूर्वकथित बात फिरसे क्या दोहराऊँ ! ॥ ३४ ॥ |
| न मृत्युः केनचिद्भाव्यः कस्यचिद्वा कदाचन ।<br>दैवाधीनमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ ३५ | किसीकी भी मृत्यु किसीसे भी कभी भी नहीं हो सकती; क्योंकि यह सम्पूर्ण चराचर जगत् तो दैवके अधीन है ॥ ३५ ॥ |
| स्ववशोऽयं न जीवोऽस्ति स्वकर्मवशगः सदा ।<br>तत्कर्म त्रिविधं प्रोक्तं विद्वद्भिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ३६<br><br>सञ्चितं वर्तमानञ्च प्रारब्धञ्च तृतीयकम् ।<br>कालकर्मस्वभावैश्च ततं सर्वमिदं जगत् ॥ ३७ | यह जीव भी स्वयं अपने वशमें नहीं है; यह सदा अपने कर्मके अधीन रहता है। तत्त्वदर्शी विद्वानोंने उस कर्मके तीन प्रकार बतलाये हैं— संचित, वर्तमान तथा प्रारब्ध। यह सम्पूर्ण जगत् काल, कर्म तथा स्वभावसे व्याप्त है ॥ ३६-३७ ॥ |
| न देवो मानुषं हन्तुं शक्तः कालागमं विना ।<br>हतं निमित्तमात्रेण हन्ति कालः सनातनः ॥ ३८ | बिना कालके आये देवता भी किसी मनुष्यको मारनेमें समर्थ नहीं हो सकते। किसीको भी मारनेवाला तो निमित्तमात्र होता है; वास्तविकता यह है कि सभीको अविनाशी काल ही मारता है ॥ ३८ ॥ |
| यथा पिता मे निहतः सिंहेनामित्रकर्षणः ।<br>तथा मातामहोऽप्येवं युद्धे युधाजिता हतः ॥ ३९ | जैसे शत्रुओंका शमन करनेवाले मेरे पिताको सिंहने मार डाला। वैसे ही मेरे नानाको भी युद्धमें युधाजित्ने मार डाला ॥ ३९ ॥ |
| यत्नकोटिं प्रकुर्वाणो हन्यते दैवयोगतः ।<br>जीवेद्वर्षसहस्त्राणि रक्षणेन विना नरः ॥ ४० | प्रारब्ध पूरा हो जानेपर करोड़ों प्रयत्न करनेपर भी अन्ततः मनुष्य मर ही जाता है और दैवके अनुकूल रहनेपर बिना किसी रक्षाके ही वह हजारों वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ ४० ॥ |
| नाहं बिभेमि धर्मिष्ठाः कदाचिच्च युधाजितः ।<br>दैवमेव परं मत्वा सुस्थितोऽस्मि सदा नृपाः ॥ ४१ | हे धर्मनिष्ठ राजाओ ! मैं युधाजित्से कभी नहीं डरता। मैं दैवको ही सर्वोपरि मानकर पूर्णरूपसे निश्चिन्त रहता हूँ ॥ ४१ ॥ |
| स्मरणं सततं नित्यं भगवत्याः करोम्यहम् ।<br>विश्वस्य जननी देवी कल्याणं सा करिष्यति ॥ ४२ | मैं नित्य-निरन्तर भगवतीका स्मरण करता रहता हूँ। विश्वकी जननी वे भगवती ही कल्याण करेंगी ॥ ४२ ॥ |
| पूर्वार्जितं हि भोक्तव्यं शुभं वाप्यशुभं तथा ।<br>स्वकृतस्य च भोगेन कीदृक्शोको विजानताम् ॥ ४३ | पूर्वजन्ममें किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्मोंका फल प्राणीको भोगना ही पड़ता है; तो फिर अपने द्वारा किये गये कर्मका फल भोगनेमें विवेकी पुरुषोंको शोक कैसा ? ॥ ४३ ॥ |
| स्वकर्मफलयोगेन प्राप्य दुःखमचेतनः ।<br>निमित्तकारणे वैरं करोत्यल्पमतिः किल ॥ ४४ | अपने द्वारा उपार्जित कर्मफल भोगनेमें दुःख प्राप्त होनेके कारण अज्ञानी तथा अल्पबुद्धिवाला प्राणी निमित्त कारणके प्रति शत्रुता करने लगता है ॥ ४४ ॥ |
| ३४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न तथाहं विजानामि वैरं शोकं भयं तथा।<br>निःशङ्कमिह सम्प्राप्तः समाजे भूभृतामिह॥ ४५ | उनकी भाँति मैं वैर, शोक तथा भयको नहीं जानता। अतः मैं राजाओंके इस समाजमें भयरहित होकर आया हुआ हूँ॥ ४५॥ |
| एकाकी द्रष्टुकामोऽहं स्वयंवरमनुत्तमम्।<br>भविष्यति च यद्भाव्यं प्राप्तोऽस्मि चण्डिकाज्ञया॥ ४६ | जो होना है, वह तो होकर ही रहेगा। मैं तो भगवतीके आदेशसे इस उत्कृष्ट स्वयंवरको देखनेकी अभिलाषासे यहाँ अकेला ही आया हूँ॥ ४६॥ |
| भगवत्याः प्रमाणं मे नान्यं जानामि संयतः।<br>तत्कृतं च सुखं दुःखं भविष्यति च नान्यथा॥ ४७ | मैं भगवतीके वचनको ही प्रमाण मानता हूँ और उनकी आज्ञाके अधीन रहता हुआ मैं अन्य किसीको नहीं जानता। उन्होंने सुख-दुःखका जो विधान कर दिया है, वही प्राप्त होगा, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं॥ ४७॥ |
| युधाजित्सुखमाप्नोतु न मे वैरं नृपोत्तमाः।<br>यः करिष्यति मे वैरं स प्राप्स्यति फलं तथा॥ ४८ | हे श्रेष्ठ राजाओ! युधाजित् सुखी रहें। मेरे मनमें उनके प्रति वैरभाव नहीं है। जो मुझसे शत्रुता करेगा, वह उसका फल पायेगा॥ ४८॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| इत्युक्तास्ते तथा तेन सन्तुष्टा भूभुजः स्थिताः।<br>सोऽपि स्वमाश्रमं प्राप्य सुस्थितः सम्बभूव ह॥ ४९ | उस सुदर्शनके इस प्रकार कहनेपर वहाँ उपस्थित सभी राजा अत्यन्त प्रसन्न हो गये। वह भी अपने निवासमें आकर शान्तभावसे बैठ गया॥ ४९॥ |
| अपरेऽह्नि शुभे काले नृपाः सम्मन्त्रिताः किल।<br>सुबाहुना नृपेणाथ रुचिरे वै स्वमण्डपे॥ ५० | तदनन्तर दूसरे दिन शुभ मुहूर्तमें राजा सुबाहुने अपने भव्य मण्डपमें सभी राजाओंको बुलाया॥ ५०॥ |
| दिव्यास्तरणयुक्तेषु मञ्चेषु रचितेषु च।<br>उपविष्टाश्च राजानः शुभालङ्करणैर्युताः॥ ५१ | उस मण्डपमें दिव्य आसनोंसे सुशोभित पूर्णरूपसे सजाये गये मंचोंपर मनोहारी आभूषणोंसे अलंकृत राजागण विराजमान हुए॥ ५१॥ |
| दिव्यवेषधराः कामं विमानेष्वमरा इव।<br>दीप्यमानाः स्थितास्तत्र स्वयंवरदिदृक्षया॥ ५२ | स्वयंवर देखनेकी इच्छासे वहाँ मंचोंपर विराजमान वे दिव्य वेषधारी देदीप्यमान राजागण विमानपर बैठे हुए देवताओंकी भाँति प्रतीत हो रहे थे॥ ५२॥ |
| इति चिन्तापराः सर्वे कदा साप्योगमिष्यति।<br>भाग्यवन्तं नृपश्रेष्ठं श्रुतपुण्यं वरिष्यति॥ ५३ | सभी राजा इस बातके लिये बहुत चिन्तित थे कि वह राजकुमारी कब आयेगी और किस पुण्यवान् तथा भाग्यशाली श्रेष्ठ नरेशका वरण करेगी?॥ ५३॥ |
| यदा सुदर्शनं दैवात्स्रजा सम्भूषयेदिह।<br>विवादो वै नृपाणां च भविता नात्र संशयः॥ ५४ | संयोगवश यदि राजकुमारीने सुदर्शनके गलेमें माला डाल दी तो राजाओंमें परस्पर कलह होने लगेगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५४॥ |
| इत्येवं चिन्त्यमानास्ते भूपा मञ्चेषु संस्थिताः।<br>वादित्रघोषः सुमहानुत्थितो नृपमण्डपे॥ ५५ | मंचोंपर विराजमान राजालोग ऐसा सोच ही रहे थे तभी राजा सुबाहुके भवनमें वाद्योंकी ध्वनि होने लगी॥ ५५॥ |
| अ० २० ] | तृतीय स्कन्ध | ३४९ | | :--- | :--- |
| श्लोक (संस्कृत) | अर्थ (हिन्दी) |
|---|---|
| अथ काशीपतिः प्राह सुतां स्नातां स्वलंकृताम्।<br>मधूकमालासंयुक्तां क्षौमवासोविभूषिताम्॥ ५६<br>विवाहोपस्करैर्युक्तां दिव्यां सिन्धुसुतोपमाम्।<br>चिन्तापरां सुवसनां स्मितपूर्वमिदं वचः॥ ५७ | तत्पश्चात् स्नान करके भलीभाँति अलंकृत, मधूक पुष्पकी माला धारण किये, रेशमी वस्त्रसे सुशोभित, विवाहके अवसरपर धारणीय सभी पदार्थोंसे युक्त, लक्ष्मीके सदृश दिव्य स्वरूपवाली, चिन्तामग्न तथा सुन्दर वस्त्रोंवाली शशिकलासे मुसकराकर महाराज सुबाहुने यह वचन कहा— ॥ ५६-५७॥ |
| उत्तिष्ठ पुत्रि सुनसे करे धृत्वा शुभां स्रजम्।<br>व्रज मण्डपमध्येऽद्य समाजं पश्य भूभुजाम्॥ ५८ | हे सुन्दर नासिकावाली पुत्रि ! उठो और हाथमें यह सुन्दर माला लेकर मण्डपमें चलो और वहाँपर विराजमान राजाओंके समुदायको देखो ॥ ५८ ॥ |
| गुणवान् रूपसम्पन्नः कुलीनश्च नृपोत्तमः।<br>तव चित्ते वसेद्यस्तु तं वृणुष्व सुमध्यमे॥ ५९ | हे सुमध्यमे ! उन राजाओंमें जो गुणसम्पन्न, रूपवान् और उत्तम कुलमें उत्पन्न श्रेष्ठ राजा तुम्हारे मनमें बस जाय, उसका वरण कर लो ॥ ५९ ॥ |
| देशदेशाधिपाः सर्वे मञ्चेषु रचितेषु च।<br>संविष्टाः पश्य तन्वङ्गि वरयस्व यथारुचि॥ ६० | देश-देशान्तरके सभी राजागण सम्यक् रूपसे सजाये गये मंचोंपर विराजमान हैं। हे तन्वंगि ! इन्हें देखो और अपनी इच्छाके अनुसार वरण कर लो ॥ ६०॥ |
| व्यास उवाच<br>तं तथा भाषमाणं वै पितरं मितभाषिणी।<br>उवाच वचनं बाला ललितं धर्मसंयुक्तम्॥ ६१ | **व्यासजी बोले—**तब ऐसा कहते हुए अपने पितासे मितभाषिणी उस कन्या शशिकलाने लालित्यपूर्ण एवं धर्मसंगत बात कही ॥ ६१॥ |
| शशिकलोवाच<br>नाहं दृष्टिपथे राज्ञां गमिष्यामि पितः किल।<br>कामुकानां नरेशानां गच्छन्त्यन्याश्च योषितः॥ ६२ | **शशिकला बोली—**हे पिताजी! मैं इन राजाओंके सम्मुख बिलकुल नहीं जाऊँगी। ऐसे कामासक्त राजाओंके सामने अन्य प्रकारकी स्त्रियाँ ही जाती हैं ॥ ६२ ॥ |
| धर्मशास्त्रे श्रुतं तात मयेदं वचनं किल।<br>एक एव वरो नार्या निरीक्ष्यः स्यान्न चापरः॥ ६३ | हे तात ! मैंने धर्मशास्त्रोंमें यह वचन सुना है कि नारीको एक ही वरपर दृष्टि डालनी चाहिये, किसी दूसरेपर नहीं ॥ ६३ ॥ |
| सतीत्वं निर्गतं तस्या या प्रयाति बहून्नथ।<br>संकल्पयन्ति ते सर्वे दृष्ट्वा मे भवतात्त्विति॥ ६४ | जो स्त्री अनेक पुरुषोंके समक्ष उपस्थित होती है, उसका सतीत्व विनष्ट हो जाता है; क्योंकि उसे देखकर वे सभी अपने मनमें यही संकल्प कर लेते हैं कि यह स्त्री किसी तरहसे मेरी हो जाय ॥ ६४॥ |
| स्वयंवरे स्रजं धृत्वा यदागच्छति मण्डपे।<br>सामान्या सा तदा जाता कुलटेवापरा वधूः॥ ६५ | कोई स्त्री अपने हाथमें जयमाल लेकर जब स्वयंवरमण्डपमें आती है तो वह एक साधारण स्त्री हो जाती है और उस समय वह एक व्यभिचारिणी स्त्रीकी भाँति प्रतीत होती है ॥ ६५॥ |
| वारस्त्री विपणे गत्वा यथा वीक्ष्य नरान्स्थितान्।<br>गुणागुणपरिज्ञानं करोति निजमानसे॥ ६६ | जिस प्रकार एक वारांगना बाजारमें जाकर वहाँ स्थित पुरुषोंको देखकर अपने मनमें उनके गुण-दोषोंका आकलन करती है और जैसे अनेक प्रकारके चंचल भावोंसे युक्त वह वेश्या किसी कामी पुरुषको |
| ३५० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ | | :--- | :--- |
| नैकभावा यथा वेश्या वृथा पश्यति कामुकम्।<br>तथाहं मण्डपे गत्वा कुर्वे वारस्त्रिया कृतम्॥ ६७ | बिना किसी प्रयोजनके व्यर्थ ही देखती रहती है, उसी प्रकार स्वयंवर-मण्डपमें जाकर मुझे भी उसीके सदृश व्यवहार करना पड़ेगा॥ ६६-६७॥ |
| वृद्धैरैतैः कृतं धर्मं न करिष्यामि साम्प्रतम्।<br>पत्नीव्रतं तथा कामं करिष्येऽहं धृतव्रता॥ ६८ | इस समय मैं अपने कुलके वृद्धजनोंद्वारा स्थापित किये गये इस स्वयंवरनियमका पालन नहीं करूँगी। मैं अपने संकल्पपर अटल रहती हुई पत्नीव्रत-धर्मका पूर्णरूपसे आचरण करूँगी॥ ६८॥ |
| सामान्या प्रथमं गत्वा कृत्वा संकल्पितं बहु।<br>वृणोति चैकं तद्वद्वै वृणोमि कथमद्य वै॥ ६९ | सामान्य कन्या स्वयंवर-मण्डपमें पहुँचकर पहले अनेक संकल्प-विकल्प करनेके पश्चात् अन्ततः किसी एकका वरण कर लेती है; उसके समान मैं भी पतिका वरण क्यों करूँ?॥ ६९॥ |
| सुदर्शनो मया पूर्वं वृतः सर्वात्मना पितः।<br>तमृते नान्यथा कर्तुमिच्छामि नृपसत्तम॥ ७० | हे पिताजी! मैंने पूरे मनसे सुदर्शनका पहले ही वरण कर लिया है। हे महाराज! उस सुदर्शनके अतिरिक्त मैं किसी अन्यको पतिके रूपमें स्वीकार नहीं कर सकती॥ ७०॥ |
| विवाहविधिना देहि कन्यादानं शुभे दिने।<br>सुदर्शनाय नृपते यदीच्छसि शुभं मम॥ ७१ | हे राजन्! यदि आप मेरा हित चाहते हैं तो किसी शुभ दिनमें वैवाहिक विधि-विधानसे कन्यादान करके मुझे सुदर्शनको सौंप दीजिये॥ ७१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे स्वपितरं प्रति शशिकालावाक्यं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥
अथैकविंशोऽध्यायः
राजा सुबाहुका राजाओंसे अपनी कन्याकी इच्छा बताना, युधाजित्का क्रोधित होकर सुबाहुको फटकारना तथा अपने दौहित्रसे शशिकालाका विवाह करनेको कहना, माताद्वारा शशिकालाको पुनः समझाना, किंतु शशिकालाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| सुबाहुरपि तच्छ्रुत्वा युक्तमुक्तं तया तदा।<br>चिन्ताविष्टो बभूवाशु किं कर्तव्यमितः परम्॥ १ | [हे राजन्!] महाराज सुबाहु पुत्रीके द्वारा कही गयी युक्तिसंगत बातें सुनकर इस चिन्तामें पड़ गये कि अब आगे क्या किया जाय? |
| सङ्गताः पृथिवीपालाः ससैन्याः सपरिग्रहाः।<br>उपविष्टाश्च मञ्चेषु योद्धुकामा महाबलाः॥ २ | अपने-अपने सैनिकों तथा सेवकोंके साथ यहाँ आये हुए और युद्धकी इच्छावाले अनेक महाबली नरेश मंचोंपर बैठे हुए हैं॥ १-२॥ |
| यदि ब्रवीमि तान्सर्वान्सुता नायाति साम्प्रतम्।<br>तथापि कोपसंयुक्ता हन्युर्मां दुष्टबुद्धयः॥ ३ | इस समय यदि मैं उन सभीसे यह कहूँ कि कन्या नहीं आ रही है, तो दुष्ट बुद्धिवाले वे राजा क्रोधित होकर मुझे मार ही डालेंगे॥ ३॥ |
अ० २१] तृतीय स्कन्ध ३५१
अ० २१] तृतीय स्कन्ध ३५१
| न मे सैन्यबलं तादृङ्न दुर्गबलमद्भुतम्।<br>येनाहं नृपतीन्सर्वान् प्रत्यादेष्टुमिहोत्सहे॥ ४ | मेरे पास न तो वैसा सैन्यबल है और न तो सुरक्षार्थ अद्भुत किला ही है, जिससे मैं इस समय उन सभीको पराजित कर सकूँ॥ ४॥ |
| सुदर्शनस्तथैकाकी ह्यसहायोऽधनः शिशुः।<br>किं कर्तव्यं निमग्नोऽहं सर्वथा दुःखसागरे॥ ५ | यह बालक सुदर्शन भी निस्सहाय, निर्धन तथा अकेला है। मैं तो हर तरहसे दुःखसागरमें डूब चुका हूँ। अब मुझे इस समय क्या करना चाहिये?॥ ५॥ |
| इति चिन्तापरो राजा जगाम नृपसन्निधौ।<br>प्रणम्य तानुवाचाथ प्रश्रयावनतो नृपः॥ ६ | इस प्रकार चिन्ताकुल राजा सुबाहु राजाओंके पास गये और उन सबको प्रणाम करके अत्यन्त विनीतभावसे उन्होंने कहा—हे महाराजाओ! अब मैं क्या करूँ? मेरे तथा अपनी माताके द्वारा बहुत प्रेरित किये जानेपर भी मेरी पुत्री मण्डपमें नहीं आ रही है॥ ६-७॥ |
| किं कर्तव्यं नृपाः कामं नैति मे मण्डपे सुता।<br>बहुशः प्रेर्यमाणापि सा मात्रापि मयापि च॥ ७ | |
| मूर्ध्ना पतामि पादेषु राज्ञां दासोऽस्मि साम्प्रतम्।<br>पूजादिकं गृहीत्वाद्य व्रजन्तु सदनानि वः॥ ८ | मैं आपलोगोंका दास हूँ और सभी राजाओंके चरणोंपर अपना सिर रखकर निवेदन करता हूँ कि आपलोग पूजा-सत्कार ग्रहण करके इस समय अपने-अपने घर लौट जायें॥ ८॥ |
| ददामि बहुरत्नानि वस्त्राणि च गजान् रथान्।<br>गृहीत्वाद्य कृपां कृत्वा व्रजन्तु भवनान्युत॥ ९ | मैं आपलोगोंको बहुत-से रत्न, वस्त्र, हाथी तथा रथ देता हूँ। इन्हें स्वीकारकर कृपा करके आपलोग अपने-अपने भवन चले जायें॥ ९॥ |
| न वशे मे सुता बाला यदि म्रियेत खेदिता।<br>तदा मे स्यान्महद्दुःखं तेन चिन्तातुरोऽस्म्यहम्॥ १० | मेरी पुत्री मेरे वशमें नहीं है। यदि वह बेचारी खिन्न होकर मर गयी तो मुझे महान् दुःख होगा। इसीसे मैं अत्यन्त चिन्तित हूँ॥ १०॥ |
| भवन्तः करुणावन्तो महाभाग्या महौजसः।<br>किमेतया दुहित्रा मे मन्दया दुर्विनीतया॥ ११ | आपलोग बड़े दयालु, भाग्यवान् तथा महान् तेजस्वी हैं तो फिर मेरी इस मन्द बुद्धिवाली अविनीत कन्यासे आपलोगोंको क्या लाभ होगा?॥ ११॥ |
| अनुग्राह्योऽस्मि वः कामं दासोऽहमिति सर्वथा।<br>सुता सुतेव मन्तव्या भवद्भिः सर्वथा मम॥ १२ | मैं आपलोगोंका हर तरहसे सेवक हूँ, अतएव आपलोग मुझपर कृपा करें। आप सभी लोग मेरी इस पुत्रीको अपनी ही पुत्री समझें॥ १२॥ |
| व्यास उवाच<br>श्रुत्वा सुबाहुवचनं नोचुः केचन भूमिपाः।<br>युधाजित्क्रोधताम्राक्षस्तमुवाच रुषान्वितः॥ १३ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] सुबाहुका वचन सुनकर अन्य राजागण तो नहीं बोले, किंतु क्रोधसे आँखें लाल करके युधाजित्ने उनसे रोषपूर्वक कहा— |
| राजन् मूर्खोऽसि किं ब्रूषे कृत्वा कार्यं सुनिन्दितम्।<br>स्वयंवरः कथं मोहाद्रचितः संशये सति॥ १४ | हे राजन्! आप तो बड़े मूर्ख हैं। ऐसा निन्दनीय कृत्य करनेके बाद भी आप कैसे इस प्रकारकी बात बोल रहे हैं? यदि संशयकी स्थिति थी तो आपने अज्ञानतावश स्वयंवरका आयोजन ही क्यों किया?॥ १३-१४॥ |
| ३५२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मिलिता भूभुजः सर्वे त्वयाहूताः स्वयंवरे।<br>कथमद्य नृपा गन्तुं योग्यास्ते स्वगृहान्प्रति ॥ १५ | आपके बुलानेपर ही सभी राजा स्वयंवरमें पधारे हुए हैं तो फिर वे सुयोग्य राजागण यों ही अपने-अपने घर कैसे चले जायँ ? ॥ १५ ॥ |
| अवमान्य नृपान्सर्वांस्त्वं किं सुदर्शनाय वै।<br>दातुमिच्छसि पुत्रीञ्च किमनार्यमतः परम् ॥ १६ | क्या आप सभी राजाओंका अपमान करके सुदर्शनको अपनी कन्या देना चाहते हैं ? इससे बढ़कर नीचताकी और क्या बात होगी ? ॥ १६ ॥ |
| विचार्य पुरुषेणादौ कार्यं वै शुभमिच्छता।<br>आरब्धव्यं त्वया तत्तु कृतं राजन्नजानता ॥ १७ | अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको पहले ही सोच-समझकर कोई कार्य प्रारम्भ करना चाहिये। किंतु हे राजन् ! आपने तो बिना सोचे-समझे ही यह आयोजन कर डाला ॥ १७ ॥ |
| एतान्विहाय नृपतीन्बलवाहनसंयुतान्।<br>वरं सुदर्शनं कर्तुं कथमिच्छसि साम्प्रतम् ॥ १८ | सेना तथा वाहनोंसे सम्पन्न इन राजाओंको छोड़कर इस समय आप सुदर्शनको अपना जामाता क्यों बनाना चाहते हैं ? ॥ १८ ॥ |
| अहं त्वां हन्मि पापिष्ठं तथा पश्चात्सुदर्शनम्।<br>दौहित्रायाद्य ते कन्यां दास्यामीति विनिश्चयः ॥ १९ | [उसने क्रोधपूर्वक आगे कहा— ] मैं तुझ पापीको अभी मार डालूँगा और बादमें सुदर्शनका भी वध कर दूँगा। तत्पश्चात् तुम्हारी कन्याका विवाह अपने नाती शत्रुजित्से कर दूँगा; इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ १९ ॥ |
| मयि तिष्ठति कोन्योऽस्ति यः कन्यां हर्तुमिच्छति।<br>सुदर्शनः कियानद्य निर्धनो निर्बलः शिशुः ॥ २० | ऐसा दूसरा कौन व्यक्ति है जो मेरे रहते कन्याके हरणकी इच्छा तक कर ले और सुदर्शन तो अत्यन्त निर्धन, बलहीन तथा बच्चा है ॥ २० ॥ |
| भारद्वाजाश्रमे पूर्वं मुक्तो मुनिकृते मया।<br>नाद्याहं मोचयिष्यामि सर्वथा जीवितं शिशोः ॥ २१ | यह सुदर्शन पूर्वमें जब भारद्वाजमुनिके आश्रममें था तभी मैं उसे मार डालता, किंतु मुनिके कहनेसे मैंने उसे छोड़ दिया था। किंतु आज किसी भी तरह इस बालकके प्राण नहीं छोड़ूँगा ॥ २१ ॥ |
| तस्माद्विचार्य सम्यक्त्वं पुत्र्या च भार्यया सह।<br>दौहित्राय प्रियां कन्यां देहि मे सुभ्रुवं किल ॥ २२<br><br>सम्बन्धी भव दत्त्वा त्वं पुत्रीमेतां मनोरमाम्।<br>उच्चाश्रयः प्रकर्तव्यः सर्वदा शुभमिच्छता ॥ २३ | अब तुम अपनी स्त्री और पुत्रीके साथ भलीभाँति विचार-विमर्श करके सुन्दर भौंहोंवाली अपनी कन्या मेरे दौहित्र शत्रुजित्को प्रदान कर दो। इस प्रकार अपनी इस सुन्दर पुत्रीको देकर तुम मेरे सम्बन्धी हो जाओ; क्योंकि अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको सर्वदा बड़ोंसे ही सम्बन्ध स्थापित करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥ |
| सुदर्शनाय दत्त्वा त्वं पुत्रीं प्राणप्रियां शुभाम्।<br>एकाकिनेऽप्यराज्याय किं सुखं प्राप्तुमिच्छसि ॥ २४ | तुम अकेले और राज्यहीन सुदर्शनको अपनी प्राणप्रिय, सुन्दर कन्या देकर क्या सुख चाहते हो ? |
| ( कुलं वित्तं बलं रूपं राज्यं दुर्गं सुहृज्जनम्।<br>दृष्ट्वा कन्या प्रदातव्या नान्यथा सुखमृच्छति ॥ ) | (वरके कुल, धन, बल, रूप, राज्य, दुर्ग और सगे-सम्बन्धियोंको देखनेके बाद ही उसे अपनी कन्या देनी चाहिये, अन्यथा सुख नहीं मिलता है) |
अ० २१ ] तृतीय स्कन्ध ३५३
अ० २१ ] तृतीय स्कन्ध ३५३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| परिचिन्त्य धर्मं त्वं राजनीतिञ्च शाश्वतीम्।<br>कुरु कार्यं यथायोग्यं मा कृथा मतिमन्यथा॥ २५ | तुम धर्म तथा शाश्वत राजनीतिपर सम्यक् विचार कर लो, तत्पश्चात् यथोचित कार्य करो; इसके विपरीत कोई दूसरा विचार मत करो॥ २४-२५॥ |
| सुहृदसि ममात्यर्थं हितं ते प्रब्रवीम्यहम्।<br>समानय सुतां राजन् मण्डपे तां सखीवृताम्॥ २६ | तुम मेरे परम मित्र हो, इसलिये तुम्हारे हितकी बात बता देता हूँ। अब तुम अपनी कन्याको उसकी सखियोंसहित स्वयंवर-मण्डपमें ले आओ॥ २६॥ |
| सुदर्शनमृते चेयं वरिष्यति यदाप्यसौ।<br>विग्रहो मे तदा न स्याद्विवाहोऽस्तु तवेप्सितः॥ २७<br><br>अन्ये नृपतयः सर्वे कुलीनाः सबलाः समाः।<br>विरोधः कीदृशस्तेवं वृणोद्यदि नृपोत्तम॥ २८<br><br>अन्यथाहं हरिष्येऽद्य बलात्कन्यामिमां शुभाम्।<br>मा विरोधं सुदुःसाध्यं गच्छ पार्थिवसत्तम॥ २९ | यदि वह सुदर्शनको छोड़कर किसी दूसरेका वरण कर लेगी तो इसमें मुझे विरोध नहीं होगा। आप अपने इच्छानुसार उसके साथ विवाह कर दीजियेगा। हे राजेन्द्र! अन्य सभी नरेश कुलीन, शक्तिशाली एवं हर तरहसे समान हैं। अतः यदि इनमेंसे किसीको भी वह कन्या चुन लेती है तो विरोध ही क्या है? अन्यथा मैं बलपूर्वक आज ही इस सुन्दर कन्याका हरण कर लूँगा। हे नृपश्रेष्ठ! जाओ, इस कार्यको सुसम्पन्न करो और इस असाध्य कलहमें मत पड़ो॥ २७-२९॥ |
| व्यास उवाच<br>युधाजिता समादिष्टः सुबाहुः शोकसंयुतः।<br>निःश्वसन्भवनं गत्वा भार्यां प्राह शुचावृतः॥ ३०<br><br>पुत्रीं ब्रूहि सुधर्मज्ञे कलहे समुपस्थिते।<br>किं कर्तव्यं मया शक्यं त्वद्वशोऽस्मि सुलोचने॥ ३१ | व्यासजी बोले— उस समय युधाजित्का यह आदेश पाकर सुबाहु शोकाकुल हो उठे और दीर्घ श्वास लेते हुए महलमें जाकर दुःखित हो अपनी पत्नीसे कहने लगे—हे सुधर्मज्ञे! हे सुनयने! अब पुत्रीसे कहो—‘स्वयंवर-सभामें इस समय घोर कलह उपस्थित हो जानेपर मुझे क्या करना चाहिये? मैं स्वयं कुछ नहीं कर सकता; क्योंकि मैं तो तुम्हारे वशमें हूँ’॥ ३०-३१॥ |
| व्यास उवाच<br>सा श्रुत्वा पतिवाक्यं तु गत्वा प्राह सुतान्तिकम्।<br>वत्से राजातिदुःखार्तः पिता तेऽद्यापि वर्तते॥ ३२<br><br>त्वदर्थे विग्रहः कामं समुत्पन्नोऽद्य भूभृताम्।<br>अन्यं वरय सुश्रोणि सुदर्शनमृते नृपम्॥ ३३ | व्यासजी बोले— पतिकी यह बात सुनकर रानी अपनी पुत्रीके पास जाकर बोली—पुत्रि! तुम्हारे पिता राजा सुबाहु इस समय अत्यन्त दुःखी हैं। तुम्हारे लिये आये हुए नरेशोंमें भयंकर कलह उत्पन्न हो गया है, इसलिये हे सुश्रोणि! तुम सुदर्शनको छोड़कर अन्य किसी राजकुमारका वरण कर लो॥ ३२-३३॥ |
| यदि सुदर्शनं वत्से हठात्त्वं वै वरिष्यसि।<br>युधाजित्त्वां च मां चैव हनिष्यति बलान्वितः॥ ३४<br><br>सुदर्शनं च राजासौ बलमत्तः प्रतापवान्।<br>द्वितीयस्ते पतिः पश्चाद्भविता कलहे सति॥ ३५<br>तस्मात्सुदर्शनं त्यक्त्वा वरयान्यं नृपोत्तमम्। | हे वत्से! यदि तुम हठ करके सुदर्शनका ही वरण करोगी तो सैन्यबलयुक्त, प्रतापी तथा बलशाली वह युधाजित् तुमको, सुदर्शनको और हमलोगोंको मार डालेगा। तत्पश्चात् कलह हो जानेपर कोई दूसरा ही तुम्हारा पति होगा। अतः हे मृगलोचने! यदि तुम मेरा और अपना हित चाहती हो तो सुदर्शनको छोड़कर किसी अन्य श्रेष्ठ राजाका वरण कर लो॥ ३४-३५ ½॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 A
| ३५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ |
|---|
| सुखमिच्छसि चेन्मह्यं तुभ्यं वा मृगलोचने।<br>इति मात्रा बोधितां तां पश्चाद्राजाप्यबोधयत्॥ ३६<br>उभयोर्वचनं श्रुत्वा निर्भयोवाच कन्यका। | इस प्रकार माताके समझानेके बाद पिताने भी उसे समझाया। उन दोनोंकी बातें सुनकर कन्या शशिकला निर्भय होकर कहने लगी॥ ३६ १/२॥ | | कन्योवाच<br>सत्यमुक्तं नृपश्रेष्ठ जानासि च व्रतं मम॥ ३७<br>नान्यं वृणोमि भूपाल सुदर्शनमृते क्वचित्।<br>विभेषि यदि राजेन्द्र नृपेभ्यः किल कातरः॥ ३८<br>सुदर्शनाय दत्त्वा मां विसर्जय पुराद्वहिः।<br>स मां रथे समारोप्य निर्गमिष्यति ते पुरात्॥ ३९<br>भवितव्यं तु पश्चाद्वै भविष्यति न चान्यथा।<br>नात्र चिन्ता त्वया कार्या भवितव्ये नृपोत्तम॥ ४०<br>यद्भावि तद्भवत्येव सर्वथात्र न संशयः। | कन्या बोली—हे नृपश्रेष्ठ! आप ठीक कह रहे हैं किंतु आप मेरे प्रणको तो जानते ही हैं। हे राजन्! मैं सुदर्शनको छोड़कर और किसीका भी वरण नहीं कर सकती। हे राजेन्द्र! यदि आप राजाओंसे डरते हैं और बहुत घबड़ाये हुए हैं तो मुझे सुदर्शनको सौंपकर नगरसे बाहर कर दीजिये। वे मुझे रथपर बैठाकर आपके नगरसे बाहर निकल जायँगे। हे नृपश्रेष्ठ! जो होना है वह तो बादमें अवश्य होगा; इसके विपरीत नहीं होगा। अब आप होनीके विषयमें चिन्ता न करें; क्योंकि जो होना है वह तो निश्चितरूपसे होता ही है; इसमें संशय नहीं है॥ ३७—४० १/२॥ | | राजोवाच<br>न पुत्रि साहसं कार्यं मतिमद्भिः कदाचन॥ ४१<br>बहुभिर्न विरोद्धव्यमिति वेदविदो विदुः।<br>विस्रक्ष्यामि कथं कन्यां दत्त्वा राजसुताय च॥ ४२<br>राजानो वैरसंयुक्ताः किन्नु कुर्युःसाम्प्रतम्।<br>यदि ते रोचते वत्से पणं संविदधाम्यहम्॥ ४३<br>जनकेन यथा पूर्वं कृतः सीतास्वयंवरे।<br>शैव धनुर्यथा तेन धृतं कृत्वा पणं तथा॥ ४४<br>तथाहमपि तन्वङ्गि करोम्यद्य दुरासदम्।<br>विवादो येन राज्ञां वै कृते सति शमं व्रजेत्॥ ४५<br>पालयिष्यति यः कामं स ते भर्ता भविष्यति।<br>सुदर्शनस्तथान्य वा यः कश्चिद् बलवत्तरः॥ ४६<br>पालयित्वा पणं त्वां वै वरयिष्यति सर्वथा।<br>एवं कृते नृपाणां तु विवादः शमितो भवेत्॥ ४७<br>सुखेनाहं विवाहं ते करिष्यामि ततः परम्। | राजा बोले—हे पुत्रि! बुद्धिमानोंको कभी ऐसा साहस नहीं करना चाहिये। वेदज्ञोंने कहा है कि बहुतोंसे विरोध नहीं करना चाहिये। पुत्रीको उस राजकुमारको सौंपकर कैसे विदा कर दूँ? मुझसे वैर साधे हुए ये राजागण न जाने कौन-सा अनिष्ट कर डालेंगे। इसलिये हे पुत्रि! यदि तुम पसन्द करो तो मैं कोई शर्त रख दूँ, जैसा कि पूर्वकालमें राजा जनकने सीतास्वयंवरमें किया था। हे तन्वंगि! जैसे उन्होंने शिव-धनुष तोड़नेकी शर्त रख दी थी, वैसे ही मैं भी कोई ऐसी कठोर शर्त रख दूँ जिससे ऐसा कर देनेपर राजाओंका विवाद ही समाप्त हो जाय। जो उस प्रतिज्ञाको पूरा करेगा, वही तुम्हारा पति होगा। सुदर्शन हो अथवा कोई दूसरा—जो भी अधिक बलशाली होगा, वह मेरी प्रतिज्ञा पूरी करके तुम्हारा वरण कर लेगा। ऐसा करनेसे राजाओंमें उत्पन्न कलह निश्चितरूपसे शान्त हो जायगा और उसके बाद मैं आनन्दपूर्वक तुम्हारा विवाह कर दूँगा॥ ४१—४७ १/२॥ | | कन्योवाच<br>सन्देहे नैव मज्जामि मूर्खकृत्यमिदं यतः॥ ४८<br>मया सुदर्शनः पूर्वं धृतश्चेतसि नान्यथा।<br>कारणं पुण्यपापानां मन एव महीपते॥ ४९ | कन्या बोली—मैं इस सन्दिग्ध कार्यमें नहीं पहूँगी; क्योंकि यह मूर्खोंका काम है। मैंने अपने मनमें सुदर्शनका पहलेसे ही वरण कर लिया है, अब दूसरेको स्वीकार नहीं कर सकती। हे महाराज! पुण्य तथा पापका कारण तो मन ही है। इसलिये हे |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 B
अ० २१ ] तृतीय स्कन्ध ३५५
अ० २१ ] तृतीय स्कन्ध ३५५
| मनसा विधृतं त्यक्त्वा कथमन्यं वृणे पितः।<br>कृते पणे महाराज सर्वेषां वशगा ह्यहम्॥ ५०<br><br>एकः पालयिता द्वौ वा बहवो वा भवन्ति चेत्।<br>किं कर्तव्यं तदा तात विवादे समुपस्थिते॥ ५१<br><br>संशयाधिष्ठिते कार्ये मतिं नाहं करोम्यतः।<br>मा चिन्तां कुरु राजेन्द्र देहि सुदर्शनाय माम्॥ ५२<br><br>विवाहं विधिना कृत्वा शं विधास्यति चण्डिका।<br>यन्नामकीर्तनादेव दुःखौघो विलयं व्रजेत्॥ ५३<br><br>तां स्मृत्वा परमां शक्तिं कुरु कार्यमतन्द्रितः। | पिताजी! मनसे वरण किये गये सुदर्शनको छोड़कर मैं दूसरेका वरण कैसे करूँ? हे महाराज! दूसरी बात यह भी है कि पणस्वयंवर करनेमें मुझे सबके अधीन रहना पड़ेगा। हे तात! यदि इनमेंसे एक, दो या अनेकने आपका प्रण पूरा कर दिया तब उस समय विवादकी स्थिति उत्पन्न हो जानेपर आप क्या करेंगे? अतः मैं किसी संशयात्मक कार्यमें पड़ना नहीं चाहती। हे राजेन्द्र! आप चिन्ता न करें और विधिपूर्वक मेरा विवाह करके मुझे सुदर्शनको सौंप दीजिये। जिनके नामका संकीर्तन करनेसे समस्त दुःखराशि विलीन हो जाती है, वे भगवती चण्डिका अवश्य कल्याण करेंगी। अब आप उन्हीं महाशक्तिका स्मरण करके पूरी तत्परताके साथ यह कार्य कीजिये॥ ४८—५३ १/२॥ |
| गत्वा वद नृपेभ्यस्त्वं कृताञ्जलिपुटोऽद्य वै॥ ५४<br><br>आगन्तव्यञ्च श्वः सर्वैरिह भूपैः स्वयंवरे।<br>इत्युक्त्वा त्वं विसृज्याशु सर्वं नृपतिमण्डलम्॥ ५५<br><br>विवाहं कुरु रात्रौ मे वेदोक्तविधिना नृप।<br>पारिबर्हं यथायोग्यं दत्त्वा तस्मै विसर्जया॥ ५६ | अभी जा करके दोनों हाथ जोड़कर आप उन राजाओंसे कहिये कि आप सभी राजागण इस स्वयंवरमें कल पधारें। ऐसा कहकर सम्पूर्ण राजसमुदायको शीघ्र ही विसर्जित करके वैदिक रीतिसे सुदर्शनके साथ रातमें मेरा विवाह कर दीजिये। हे राजन्! तत्पश्चात् उन्हें यथोचित उपहार देकर विदा कर दीजिये॥ ५४—५६॥ |
| गमिष्यति गृहीत्वा मां ध्रुवसन्धिंसुतः किल।<br>कदाचित्ते नृपाः क्रुद्धाः संग्रामं कर्तुमुद्यताः॥ ५७<br><br>भविष्यन्ति तदा देवी साहाय्यं नः करिष्यति।<br>सोऽपि राजसुतस्तैस्तु संग्रामं संविधास्यति॥ ५८<br><br>दैवान्मृधे मृते तस्मिन्मरिष्याम्यहमप्युत।<br>स्वस्ति तेऽस्तु गृहे तिष्ठ दत्त्वा मां सहसैन्यकः॥ ५९<br><br>एकैवाहं गमिष्यामि तेन सार्धं रिरंसया। | तदनन्तर महाराज ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शन मुझे साथ लेकर चले जायेंगे। इससे कुपित हुए राजा यदि युद्ध करनेको उद्यत होंगे तो उस समय भगवती हमारी सहायता करेंगी, जिससे वे राजकुमार सुदर्शन भी उन लोगोंके साथ संग्राम करनेमें अवश्य समर्थ होंगे। दैवयोगसे यदि वे युद्धमें मारे गये तो मैं प्राण त्याग दूँगी। आपका कल्याण हो। आप मुझे सुदर्शनको सौंपकर अपनी सेनाके साथ महलमें सुखपूर्वक रहें। मैं भी विहार करनेकी कामनासे उनके साथ अकेली ही चली जाऊँगी॥ ५७—५९ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्या वचः श्रुत्वा राजासौ कृतनिश्चयः।<br>मतिं चक्रे तथाकर्तुं विश्वासं प्रतिपद्य च॥ ६० | व्यासजी बोले— [हे राजन्!] उस शशिकलाका वचन सुनकर दृढ़प्रतिज्ञ राजा सुबाहुने उसे पूर्णरूपसे विश्वस्त करके ठीक वैसा ही करनेका निश्चय कर लिया॥ ६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कन्यया स्वपितरं प्रति सुदर्शनेन सह विवाहार्थकथनं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
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1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 C
| ३५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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अथ द्वाविंशोऽध्यायः
शशिकलाका गुप्त स्थानमें सुदर्शनके साथ विवाह, विवाहकी बात जानकर राजाओंका सुबाहुके प्रति क्रोध प्रकट करना तथा सुदर्शनका मार्ग रोकनेका निश्चय करना
| व्यास उवाच | |
|---|---|
| श्रुत्वा सुतावाक्यमनिन्दितात्मा<br>नृपांश्च गत्वा नृपतिर्जगाद।<br>व्रजन्तु कामं शिविराणि भूपाः<br>श्वो वा विवाहं किल संविधास्ये॥ १ ॥ | **व्यासजी बोले—**पवित्र अन्तःकरणवाले राजा सुबाहु कन्याकी बात सुनकर राजाओंके पास जाकर बोले—हे महाराजाओ! आपलोग इस समय अपने-अपने शिविरमें जायें, मैं कन्याका विवाह कल करूँगा॥ १ ॥ |
| भक्ष्याणि पेयानि मयार्पितानि<br>गृह्णन्तु सर्वे मयि सुप्रसन्नाः।<br>श्वो भावि कार्यं किल मण्डपेऽत्र<br>समेत्य सर्वैरिह संविधेयम्॥ २ ॥ | आपलोग मुझपर कृपा करके मेरे द्वारा अर्पित की गयी भोज्य वस्तुएँ स्वीकार करें। अब यह विवाहकार्य कल पुनः इसी स्वयंवर-मण्डपमें होगा। हम सब मिलकर उसे सम्पन्न करेंगे॥ २ ॥ |
| नायाति पुत्री किल मण्डपेऽद्य<br>करोमि किं भूपतयोऽत्र कामम्।<br>प्रातः समाश्वास्य सुतां नयिष्ये<br>गच्छन्तु तस्माच्छिविराणि भूपाः॥ ३ ॥ | हे नृपतिगण! आज मेरी पुत्री मण्डपमें नहीं आ रही है। मैं क्या करूँ? कल प्रातः पुत्रीको समझा-बुझाकर अवश्य लाऊँगा। अब सभी राजागण अपने-अपने शिविरमें चलें। बुद्धिमानोंको अपने आश्रितजनोंके प्रति विरोधभाव नहीं रखना चाहिये और अपनी सन्तानपर तो निरन्तर विशेष कृपा करनी चाहिये। हे नृपगण! प्रातःकाल समझा-बुझाकर मैं अपनी पुत्रीको यहाँ ले आऊँगा; इस समय आपलोग जायें॥ ३-४॥ |
| न विग्रहो बुद्धिमतां निजाश्रिते<br>कृपा विधेया सततं ह्यपत्ये।<br>विधाय तां प्रातरिहानयिष्ये<br>सुतां तु गच्छन्तु नृपा यथेष्टम्॥ ४ ॥ | |
| इच्छापणं वा परिचिन्त्य चित्ते<br>प्रातः करिष्याम्यथ संविवाहम्।<br>सर्वैः समेत्यात्र नृपैः समेतैः<br>स्वयंवरः सर्वमतेन कार्यः॥ ५ ॥ | मैं इच्छास्वयंवरकी बातको भलीभाँति सोचकर प्रातः कन्याका विवाह कर दूँगा। एक साथ सभी राजाओंके उपस्थित हो जानेपर सबकी सम्मतिसे स्वयंवरका कार्य सम्पन्न होगा॥ ५॥ |
| श्रुत्वा नृपास्तेऽवितथं विदित्वा<br>वचो ययुः स्वानि निकेतनानि।<br>विधाय पार्श्वे नगरस्य रक्षां<br>चक्रुः क्रिया मध्यदिनोदिताश्च॥ ६ ॥ | सुबाहुकी वाणी सुनकर सभी राजागण उसे सच मानकर अपने-अपने शिविरमें चले गये और नगरके आस-पास रक्षाका सम्यक् प्रबन्ध करके वे मध्याह्नकालकी क्रियाओंमें संलग्न हो गये॥ ६॥ |
| सुबाहुरप्यार्यजनैः समेत-<br>श्चकार कार्याणि विवाहकाले।<br>पुत्रीं समाहूय गृहे सुगुप्ते<br>पुरोहितैर्वेदविदां वरिष्ठैः॥ ७ ॥ | उधर राजा सुबाहु भी श्रेष्ठजनोंके साथ अपने अन्तःपुरके एक गुप्त स्थानमें अपनी पुत्रीको बुलाकर वरिष्ठ वैदिक पुरोहितोंद्वारा विवाह-कृत्य सम्पन्न करनेका प्रयत्न करने लगे॥ ७॥ |
| स्नानादिकं कर्म वरस्य कृत्वा<br>विवाहभूषाकरणं तथैव।<br>आनाय्य वेदीरचिते गृहे वै<br>तस्यार्हणां भूमिपतिश्चकार॥ ८ ॥ | वरको स्नानादि कर्म कराकर उसे विवाहके योग्य वस्त्राभूषण पहनाकर और उसे वेदीरचित गृहमें ले आकर राजा सुबाहुने उसका पूजन किया॥ ८॥ |
1897 श्रीमद्देवी...महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 D
| अ० २२ ] | तृतीय स्कन्ध | ३५७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सविष्टरं चाचमनीयमर्घ्यं<br>वस्त्रद्वयं गामथ कुण्डले द्वे।<br>समर्प्य तस्मै विधिवन्नरेन्द्र<br>ऐच्छत्सुतादानमहीनमत्त्वः ॥ ९ | वरको विष्टर, आचमन, अर्घ्य, दो वस्त्र, गौ और दो कुण्डल विधिवत् प्रदान करके महामनस्वी राजा सुबाहुने कन्यादान कर दिया ॥ ९ ॥ |
| सोऽप्यग्रहीत्सर्वमदीनचेताः<br>शशाम चिन्ताथ मनोरमायाः।<br>कन्यां सुकेशीं निधिकन्यकासमां<br>मेने तदात्मानमनुत्तमञ्च ॥ १० | उदार हृदयवाले सुदर्शनने भी सभी वस्तुएँ स्वीकार कर लीं। अब मनोरमाकी चिन्ता दूर हो गयी। उस समय कुबेरपुत्रीके समान उस सुन्दर केशोंवाली शशिकलाको पाकर सुदर्शनने अपने आपको परम धन्य समझा॥ १०॥ |
| सुपूजितं भूषणवस्त्रदानै-<br>र्वरोत्तमं तं सचिवास्तदानीम्।<br>निन्युश्च ते कौतुकमण्डपान्त-<br>र्मुदान्विता वीतभयाश्च सर्वे॥ ११ | उस समय आनन्दित एवं निर्भीक सभी मन्त्री राजाद्वारा आभूषण तथा वस्त्र देकर सम्यक् रूपसे पूजित श्रेष्ठ वर सुदर्शनको कौतुकमण्डपमें ले गये ॥ ११ ॥ |
| समाप्तभूषां विधिवद्विधिज्ञाः<br>स्त्रियश्च तां राजसुतां सुयाने।<br>आरोप्य निन्युर्वरसन्निधानं<br>चतुष्कयुक्ते किल मण्डपे वै॥ १२ | तदनन्तर विधिकी जानकार स्त्रियाँ राजकुमारीको वस्त्राभूषणोंसे विधिवत् सुसज्जित करके उसे सुन्दर पालकीमें बिठाकर चौकोर वेदीसे युक्त मण्डपमें वरके पास ले गयीं ॥ १२ ॥ |
| अग्निं समाधाय पुरोहितः स<br>हुत्वा यथावच्च तदन्तराले।<br>आह्वयायत्तौ कृतकौतुकौ तु<br>वधूवरौ प्रेमयुतौ निकामम्॥ १३<br>लाजाविसर्गं विधिवद्विधाय<br>कृत्वा हुताशस्य प्रदक्षिणाञ्च।<br>तौ चक्रतुस्तत्र यथोचितं तत्<br>सर्वं विधानं कुलगोत्रजातम्॥ १४ | उस वेदीपर पुरोहितने अग्नि-स्थापन करके और विधिवत् घृताहुति देकर कौतुकागारमें कौतुक किये हुए प्रेमरससे अत्यन्त सिक्त वर-वधूको बुलाया। उन दोनोंने विधिवत् लाजाहोम करनेके बाद अग्निकी प्रदक्षिणा करके अपने-अपने कुल तथा गोत्रकी समस्त रीतियाँ सम्पन्न कीं ॥ १३-१४॥ |
| शतद्वयं चाश्वयुजां रथानां<br>सुभूषितं चापि शरौघसंयुक्तम्।<br>ददौ नृपेन्द्रस्तु सुदर्शनाय<br>सुपूजितं पारिबर्हं विवाहे ॥ १५<br>मदोत्कटान्हेमविभूषितांश्च<br>गजानगेः शृङ्गसमानदेहान्।<br>शतं सपादं नृपसूनवेऽसौ<br>ददावथ प्रेमयुतो नृपेन्द्रः॥ १६ | महाराज सुबाहुने घोड़ोंसे जुते तथा अत्यधिक बाणोंसे लदे हुए दो सौ सुसज्जित रथ सुदर्शनको विवाहमें उपहारस्वरूप दिये। उन्होंने मदमत्त, सुवर्णके भूषणोंसे विभूषित तथा पर्वतके शिखरके समान शरीरवाले सवा सौ हाथी राजकुमार सुदर्शनको प्रेमपूर्वक प्रदान किये ॥ १५-१६ ॥ |
| ३५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ | | :--- | :--- |
| दासीशतं काञ्चनभूषितं च<br>करेणुकानां च शतं सुचारु।<br>समर्पयामास वराय राजा<br>विवाहकाले मुदितोऽनुवेलम् ॥ १७<br>अदात्पुनर्दाससहस्रमेकं<br>सर्वायुधैः सम्भृतभूषितञ्च।<br>रत्नानि वासांसि यथोचितानि<br>दिव्यानि चित्राणि तथाविकानि ॥ १८ | विवाहके समय राजाने स्वर्णभूषणोंसे अलंकृत सौ दासियाँ और सुन्दर-सुन्दर सौ हथिनियाँ प्रसन्नतापूर्वक बार-बार वरको समर्पित कीं। उन्होंने सब प्रकारके आयुधों और आभूषणोंसे सुसज्जित एक हजार सेवक, बहुत-से रत्न, रंग-बिरंगे दिव्य सूती तथा ऊनी वस्त्र यथोचित रूपसे दिये ॥ १७-१८ ॥ | | ददौ पुनर्वासगृहाणि तस्मै<br>रम्याणि दीर्घाणि विचित्रितानि।<br>सिन्धूद्भवानां तुरगोत्तमाना-<br>मदात्सहस्रद्वितयं सुरम्यम् ॥ १९<br>क्रमेलकानां च शतत्रयं वै<br>प्रत्यादिशद्भारभृतां सुचारु।<br>शतद्वयं वै शकटोत्तमानां<br>तस्मै ददौ धान्यरसैः प्रपूरितम् ॥ २० | निवासके लिये रंग-बिरंगे, सुन्दर और विशाल भवन, सिन्धुदेशके उत्तम दो हजार घोड़े, भार ढोनेमें कुशल सुन्दर तीन सौ ऊँट, अन्न एवं रससे परिपूर्ण दो सौ उत्तम बैलगाड़ियाँ भी प्रदान कीं ॥ १९-२० ॥ | | मनोरमां राजसुतां प्रणम्य<br>जगाद वाक्यं विहिताञ्जलिः पुरः।<br>दासोऽस्मि ते राजसुते वरिष्ठे<br>तद् ब्रूहि यत्स्यात्तु मनोगतं ते ॥ २१ | पश्चात् राजा सुबाहुने हाथ जोड़कर राजमाता मनोरमाको प्रणाम करके कहा—हे राजकुमारी! मैं आपका सेवक हूँ, अतः आपका जो मनोवांछित हो उसे कहिये ॥ २१ ॥ | | तं चारुवाक्यं निजगाद सापि<br>स्वस्त्यस्तु ते भूप कुलस्य वृद्धिः।<br>सम्मानिताहं मम सूनवे त्वया<br>दत्ता यतो रत्नवरा स्वकन्या ॥ २२ | तब उस मनोरमाने भी सुबाहुसे मधुर वाणीमें कहा—हे राजन्! आपका कल्याण हो, आपके वंशकी वृद्धि हो। आपने मेरा बहुत सम्मान किया; क्योंकि आपने अपनी रत्नमयी कन्या मेरे पुत्रको प्रदान की है ॥ २२ ॥ | | न बन्दिपुत्री नृप मागधी वा<br>स्तौमीह किं त्वां स्वजनं महत्तरम्।<br>सुमेरुतुल्यस्तु कृतः सुतोऽद्य मे<br>सम्बन्धिना भूपतिनोत्तमेन ॥ २३<br>अहोऽतिचित्रं नृपतेश्चरित्रं<br>परं पवित्रं तव किं वदामि।<br>यद् भ्रष्टराज्याय सुताय मेऽद्य<br>दत्ता त्वया पूज्यसुता वरिष्ठा ॥ २४<br>वनाधिवासाय किलाधनाय<br>पित्रा विहीनाय विसैन्यकाय।<br>सर्वानिमान्भूमिपतीन्विहाय<br>फलाशनायार्थविवर्जिताय ॥ २५ | हे राजन्! मैं [यश गानेमें कुशल] बन्दीजन और मागधोंकी पुत्री नहीं हूँ, [जो भलीभाँति आपकी प्रशंसा कर सकूँ।] आप तो अपने ही हैं, अतः आप श्रेष्ठ स्वजनकी मैं क्या स्तुति करूँ ? आप एक उत्तम नरेश हैं और मेरे सम्बन्धी हो गये हैं; आपने मेरे पुत्रको सुमेरुके समान बना दिया है। अहो! महान् आश्चर्य है! आप-जैसे राजाके पवित्र चरित्रका वर्णन कहाँतक करूँ, जो कि आपने इन सभी राजाओंको छोड़कर राज्यसे च्युत, वनमें निवास करनेवाले, धनहीन, पिताविहीन, सेनारहित, फलके आहारपर ही रहनेवाले तथा सम्पत्तिहीन मेरे पुत्रको अपनी प्रिय तथा कुलीन कन्या प्रदान कर दी ॥ २३–२५ ॥ |
| अ० २२ ] | तृतीय स्कन्ध | ३५९ | | :--- | :--- | | समानवित्तेऽथ कुले बले च<br>ददाति पुत्रीं नृपतिश्च भूयः।<br>न कोऽपि मे भूप सुतेऽर्थहीने<br>गुणान्वितां रूपवतीञ्च दद्यात्॥ २६ | अपने समान धन, कुल और बलवालेको ही कोई अपनी पुत्री प्रदान करता है। हे राजन्! आपको छोड़कर कोई भी राजा मेरे धनहीन पुत्रको अपनी रूपगुणसम्पन्ना पुत्री नहीं दे सकता॥ २६॥ | | वैरं तु सर्वैः सह संविधाय<br>नृपैर्वरिष्ठैर्बलसंयुतैश्च।<br>सुदर्शनायाथ सुतार्पिता मे<br>किं वर्णये धैर्यमिदं त्वदीयम्॥ २७ | सभी महान् तथा बलशाली राजाओंसे शत्रुता लेकर आपने मेरे सुदर्शनको अपनी कन्या अर्पित की है—हे राजन्! मैं आपके इस धैर्यका वर्णन क्या करूँ?॥ २७॥ | | निशम्य वाक्यानि नृपः प्रहृष्टः<br>कृताञ्जलिर्वाक्यमुवाच भूयः।<br>गृहाण राज्यं मम सुप्रसिद्धं<br>भवामि सेनापतिरद्य चाहम्॥ २८<br>नोचेत्तदर्धं प्रतिगृह्य चात्र<br>सुतान्वितो राज्यफलानि भुङ्क्ष्व।<br>विहाय वाराणसिकानिवासं<br>वने पुरे वा स मतो न मेऽस्ति॥ २९ | इस प्रकार मनोरमाके [कृतज्ञतापूर्ण] वचन सुनकर महाराज सुबाहुने प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर पुनः यह वचन कहा—मेरा यह अति प्रसिद्ध राज्य आप ले लीजिये और आजसे मैं आपका सेनापति हो जा रहा हूँ; नहीं तो आप आधा राज्य ही ले लें और अपने पुत्रके साथ यहीं रहकर राजसी भोग भोगें; क्योंकि अब काशीमें निवास छोड़कर किसी वन या ग्राममें आपलोग रहें—ऐसा मेरा विचार नहीं है॥ २८-२९॥ | | नृपास्तु सन्त्येव रुषान्विता वै<br>गत्वा करिष्ये प्रथमं तु सान्त्वनम्।<br>ततः परं द्वावपरावुपायौ<br>नोचेत्ततो युद्धमहं करिष्ये॥ ३० | सभी उपस्थित भूपगण मुझपर अत्यन्त रुष्ट हैं। मैं जाकर पहले उन्हें शान्त करूँगा। इसके बाद दान एवं भेदनीतिका विधान करूँगा। यदि इसपर भी वे अनुकूल न होंगे तो उनसे युद्ध करूँगा॥ ३०॥ | | जयाजयौ दैववशौ तथापि<br>धर्मे जयो नैव कृतेऽप्यधर्मे।<br>तेषां किलाधर्मवतां नृपाणां<br>कथं भविष्यत्यनुचिन्तितं वै॥ ३१ | यद्यपि हार और जीत तो दैवाधीन हैं तथापि जिस पक्षमें धर्म रहता है, उसकी विजय होती है; अधर्मके पक्षवालेकी कभी नहीं। अतः अधर्मसे युक्त उन राजाओंका अपना सोचा हुआ कैसे हो सकता है?॥ ३१॥ | | आकर्ण्य तद्भाषितमर्थवच्च<br>जगाद वाक्यं हितकारकं तम्।<br>मनोरमा मानमवाप्य तस्मात्<br>सर्वात्मना मोदयुता प्रसन्ना॥ ३२<br>राजञ्छिवं तेऽस्तु कुरुष्व राज्यं<br>त्यक्त्वा भयं त्वं स्वसुतैः समेतः।<br>सुतोऽपि मे नूनमवाप्य राज्यं<br>साकेतपुर्यां प्रचरिष्यतीह॥ ३३ | उन सुबाहुसे सम्मान पाकर पूर्णरूपसे आनन्दमग्न मनोरमा उनकी सारगर्भित वाणी सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे हितकर वचन कहने लगी—हे राजन्! आपका कल्याण हो। आप निर्भय होकर अपने पुत्रोंके साथ राज्य कीजिये। मेरा पुत्र भी निश्चय ही अपना राज्य पाकर साकेतपुरी अयोध्यामें शासन करेगा॥ ३२-३३॥ |
| ३६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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| विसर्जयास्मान्निजसद्म गन्तुं<br>शिवं भवानी तव संविधास्यति।<br>न कापि चिन्ता मम भूप वर्तते<br>सञ्चिन्तयन्त्याः परमाम्बिकां वै॥ ३४ | हे राजन्! अब आप हमलोगोंको अपने घर जानेके लिये आज्ञा दीजिये। भगवती दुर्गा आपका कल्याण करेंगी। हे राजन्! मुझे अब कोई चिन्ता नहीं है; क्योंकि मैं पराम्बा भगवतीका भलीभाँति चिन्तन करती रहती हूँ॥ ३४॥ | | दोषा गता विविधवाक्यपदै रसालै-<br>रन्योन्यभाषणपदैरमृतोपमैश्च ।<br>प्रातर्नृपाः समधिगम्य कृतं विवाहं<br>रोषान्विता नगरबाह्यगतास्तथोचुः॥ ३५ | इस प्रकार उन दोनोंमें विविध वाक्योंद्वारा अमृतके समान मधुर वार्तालापमें रात बीत गयी। प्रातःकाल होनेपर सभी राजा विवाह हो जानेकी बात जानकर कुपित हो उठे और नगरके बाहर निकलकर आपसमें कहने लगे- ॥ ३५॥ | | अद्यैव तं नृपकलङ्कधरञ्च हत्वा<br>बालं तथैव किल तं न विवाहयोग्यम्।<br>गृह्णीम तां शशिकलां नृपतेश्च लक्ष्मीं<br>लज्जामवाप्य निजसद्म कथं व्रजेम॥ ३६ | हम आज ही उस कलंकी राजा सुबाहु तथा विवाहकी योग्यता न रखनेवाले उस कुमार सुदर्शनको मारकर राज्यलक्ष्मीसहित उस शशिकलाको छीन लेंगे, अन्यथा लज्जित होकर हमलोग कैसे अपने घर जायँगे?॥ ३६॥ | | शृण्वन्तु तूर्यनिनदान्किल वाद्यमाना-<br>ञ्छङ्खस्वनानभिभवन्ति मृदङ्गशब्दाः।<br>गीतध्वनिं च विविधं निगमस्वनञ्च<br>मन्यामहे नृपतिनात्र कृतो विवाहः॥ ३७ | आप सब लोग बजायी जा रही तुरहियों तथा शंखोंके निनाद, गीतध्वनि तथा अनेक प्रकारकी वेद-ध्वनि सुन लें। मृदंगोंके भी शब्द हो रहे हैं। हमलोग तो ऐसा मानते हैं कि राजा सुबाहुने विवाह सम्पन्न कर दिया॥ ३७॥ | | अस्मान्प्रतार्य वचनैर्विधिवच्चकार<br>वैवाहिकेन विधिना करपीडनं वै।<br>कर्तव्यमद्य किमहो प्रविचिन्तयन्तु<br>भूपाः परस्परमतिं च समर्थयन्तु॥ ३८ | राजाने हमें बातोंसे ठगकर वैवाहिक विधिसे पाणिग्रहण-संस्कार अवश्य कर दिया। हे राजाओ! अब हमलोगोंको क्या करना चाहिये, इस विषयमें आपलोग सोचें और आपसमें विचार करके एक निर्णय लें॥ ३८॥ | | एवं वदत्सु नृपतिष्वथ कन्यकायाः<br>कृत्वा विवाहविधिमप्रतिमप्रभावः।<br>भूपान्निमन्त्रयितुमाशु जगाम राजा<br>काशीपतिः स्वसुहृदैः प्रथितप्रभावैः॥ ३९ | इस प्रकार राजाओंमें परस्पर बातचीत हो ही रही थी कि इतनेमें अप्रतिम प्रभाववाले काशीपति महाराज सुबाहु कन्याका पाणिग्रहण-संस्कार सम्पन्न करके प्रसिद्ध तेजवाले अपने मित्रोंको साथ लेकर उन राजाओंको निमन्त्रित करनेके लिये शीघ्र उनके पास गये॥ ३९॥ | | आगच्छन्तं च तं दृष्ट्वा नृपाः काशीपतिं तदा।<br>नोचुः किञ्चिदपि क्रोधान्मौनमाधाय संस्थिताः॥ ४० | काशीराज सुबाहुको आते देखकर उपस्थित नरेशोंने क्रोधके कारण कुछ नहीं कहा। वे मौन साधकर बैठे रहे॥ ४०॥ | | स गत्वा प्रणिपत्याह कृताञ्जलिरभाषत।<br>आगन्तव्यं नृपैः सर्वैर्भोजनार्थं गृहे मम॥ ४१ | राजा सुबाहु उनके पास जाकर हाथ जोड़कर प्रणाम करके कहने लगे कि सभी राजागण भोजन करनेके |
| अ० २३ ] | तृतीय स्कन्ध | ३६१ |
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| कन्ययासौ वृतो भूपः किं करोमि हिताहितम्।<br>भवद्भिरस्तु शमः कार्यो महान्तो हि दयालवः॥ ४२ | लिये मेरे घर आयें। कन्याने तो उस राजकुमार सुदर्शनका पतिरूपमें वरण कर लिया है। मैं इस विषयमें अच्छा-बुरा क्या कर सकता हूँ? अब आपलोग शान्त हो जायें; क्योंकि महान् लोग दयालु होते हैं॥ ४१-४२॥ |
| तन्निशम्य वचस्तस्य नृपाः क्रोधपरप्लुताः।<br>प्रत्यूचुर्भुक्तमस्माभिः स्वगृहं नृपते व्रज॥ ४३ | राजा सुबाहुकी बात सुनकर सभी राजा क्रोधसे तमतमा उठे। उन्होंने कहा—राजन्! हमलोग भोजन कर चुके, अब आप अपने घर जाइये। आपको जो अच्छा लगा, उसे आपने कर लिया। जो कार्य शेष हों उन सबको भी जाकर कर लीजिये। अब सभी राजागण अपने-अपने घर चले जायेंगे॥ ४३-४४॥ |
| कुरु कार्याण्यशेषाणि यथेष्टं सुकृतं कृतम्।<br>नृपाः सर्वे प्रयान्त्वद्य स्वानि स्वानि गृहाणि वै॥ ४४ | |
| सुबाहुरपि तच्छ्रुत्वा जगाम शङ्कितो गृहम्।<br>किं करिष्यन्ति संविग्नाः क्रोधयुक्ता नृपोत्तमाः॥ ४५ | सुबाहु भी यह सुनकर घर चले गये और शंका करने लगे कि ये क्षुब्ध तथा कुपित राजागण अब न जाने क्या कर डालेंगे॥ ४५॥ |
| गते तस्मिन्महीपालाश्चक्रुश्च समयं पुनः।<br>रुद्ध्वा मार्गं ग्रहीष्यामः कन्यां हत्वा सुदर्शनम्॥ ४६ | राजा सुबाहुके चले जानेपर उन नरेशोंने यह निश्चय किया कि अब हमलोग मार्ग रोककर सुदर्शनको मारकर कन्याको छीन लेंगे॥ ४६॥ |
| केचनोचुः किमस्माकं हन्त तेन नृपेण वै।<br>दृष्ट्वा तु कौतुकं सर्वं गमिष्यामो यथागतम्॥ ४७ | उनमेंसे कुछ राजाओंने कहा—अरे! उस राजकुमार सुदर्शनसे हमारा क्या वैर? हमने यहाँका सब कौतुक देख लिया। अब हम जैसे आये थे, वैसे ही घर लौट चलें॥ ४७॥ |
| इत्युक्त्वा ते नृपाः सर्वे मार्गमाक्रम्य संस्थिताः।<br>चकारोत्तरकार्याणि सुबाहुः स्वगृहं गतः॥ ४८ | ऐसा कहकर वे सब [विरोधी] राजागण मार्ग रोककर खड़े हो गये और राजा सुबाहु अपने भवन पहुँचकर आगेके कृत्य सम्पादित करने लगे॥ ४८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
सुदर्शनशशिकलयोर्विवाहवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
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अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
सुदर्शनका शशिकलाके साथ भारद्वाज-आश्रमके लिये प्रस्थान, युधाजित् तथा अन्य राजाओंसे सुदर्शनका घोर संग्राम, भगवती सिंहवाहिनी दुर्गाका प्राकट्य, भगवतीद्वारा युधाजित् और शत्रुजित्का वध, सुबाहुद्वारा भगवतीकी स्तुति
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| तस्मै गौरवभोज्यानि विधाय विधिवत्तदा।<br>वासराणि च षड्राजा भोजयामास भक्तितः॥ १ | [हे राजन्!] उस समय राजा सुबाहुने छः दिनोंतक विविध प्रकारके भोजन बनवाकर सुदर्शनको प्रेमपूर्वक खिलाया॥ १॥ |
| एवं विवाहकार्याणि कृत्वा सर्वाणि पार्थिवः।<br>पारिबर्हं प्रदत्त्वाथ मन्त्रयन्सचिवैः सह॥ २<br>दूतैस्तु कथितं श्रुत्वा मार्गसंरोधनं कृतम्।<br>बभूव विमना राजा सुबाहुरमितद्युतिः॥ ३ | इस प्रकार विवाहके सभी कृत्य करके राजा सुबाहु सुदर्शनको उपहार प्रदान करके सचिवोंके साथ मन्त्रणा कर रहे थे, उसी समय अपने दूतोंका यह कथन सुनकर कि विरोधी राजाओंने मार्ग रोक रखा है, वे अमित तेजवाले राजा सुबाहु खिन्नमनस्क हो गये॥ २-३॥ |