भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३२१

निषादैर्लुणि्ठता तत्र गृहीतं सकलं वसु।<br>रथञ्चापि गृहीत्वा ते निर्गता दस्यवः शठाः॥ ४६<br><br>रुदती सुतमादाय चारुवस्त्रा मनोरमा।<br>निर्ययौ जाह्नवीतीरे सैरन्ध्रीकरलम्बिता॥ ४७<br><br>आरुह्य च भयाच्छीघ्रमुडुपं सा भयाकुला।<br>तीर्त्वा भागीरथीं पुण्यां ययौ त्रिकूटपर्वतम्॥ ४८वहाँके निषादोंने उसे लूट लिया तथा उसका सारा धन और रथ छीन लिया। सब कुछ लेकर वे धूर्त दस्यु चले गये। तब वह रोती हुई अपने पुत्रको लेकर सैरंध्रीके हाथका सहारा लेकर किसी प्रकार गंगाके तटपर गयी और एक छोटी-सी नौकापर डरती हुई बैठकर पवित्र गंगाको पार करके वह भयाक्रान्त मनोरमा त्रिकूटपर्वतपर पहुँच गयी॥ ४६—४८॥
भारद्वाजाश्रमं प्राप्ता त्वरया च भयाकुला।<br>संवीक्ष्य तापसांस्तत्र सञ्जाता निर्भया तदा॥ ४९<br><br>मुनिना सा ततः पृष्टा कासि कस्य परिग्रहः।<br>कष्टेनात्र कथं प्राप्ता सत्यं ब्रूहि शुचिस्मिते॥ ५०<br><br>देवी वा मानुषी वासि बालपुत्रा वने कथम्।<br>राज्यभ्रष्टेव वामोरु भासि त्वं कमलेक्षणे॥ ५१वह भयभीत मनोरमा भारद्वाजमुनिके आश्रममें शीघ्रतासे पहुँची। तब वहाँ तपस्वियोंको देखकर वह निर्भय हो गयी। तदनन्तर भारद्वाजमुनिने पूछा—हे शुचिस्मिते! तुम कौन हो, किसकी पत्नी हो? इतने कष्टसे तुम यहाँ कैसे आ गयी हो? मुझसे सत्य कहो। तुम कोई देवी हो अथवा मानवी हो। अपने इस बालक पुत्रके साथ वनमें क्यों विचरण कर रही हो? हे सुन्दरि! हे कमलनयने! तुम राज्यभ्रष्ट-जैसी प्रतीत हो रही हो॥ ४९—५१॥
एवं सा मुनिना पृष्टा नोवाच वरवर्णिनी।<br>रुदती दुःखसन्तप्ता विदल्लं च समादिशत्॥ ५२मुनिके पूछनेपर उस रूपवती रानीने कुछ भी उत्तर नहीं दिया और दुःखसे सन्तप्त होकर रोती हुई उसने अपने मन्त्री विदल्लको सारी बातें बतानेके लिये संकेत किया॥ ५२॥
विदल्लस्तमुवाचेदं ध्रुवसन्धिर्नृपोत्तमः।<br>तस्य भार्या धर्मपत्नी नाम्ना चेयं मनोरमा॥ ५३तब विदल्लने मुनिसे कहा—ध्रुवसन्धि एक श्रेष्ठ नरेश थे। ये उन्हींकी मनोरमा नामवाली धर्मपत्नी हैं॥ ५३॥
सिंहेन निहतो राजा सूर्यवंशी महाबलः।<br>पुत्रोऽयं नृपतेस्तस्य नाम्ना चैव सुदर्शनः॥ ५४सूर्यवंशमें उत्पन्न उन महाबली महाराजको सिंहने मार डाला। सुदर्शन नामका यह बालक उन्हीं राजाका पुत्र है॥ ५४॥
अस्याः पितातिधर्मात्मा दौहित्रार्थं मृतो रणे।<br>युधाजिद्द्रव्यसन्त्रस्ता सम्प्राप्ता विजने वने॥ ५५इनके अत्यन्त धर्मात्मा पिता अपने इसी दौहित्रके लिये संग्राममें मारे गये। अतएव युधाजित्के भयसे संत्रस्त होकर ये इस निर्जन वनमें आयी हुई हैं॥ ५५॥
त्वामेव शरणं प्राप्ता बालपुत्रा नृपात्मजा।<br>त्राता भव महाभाग त्वमस्या मुनिसत्तम॥ ५६हे महाभाग! हे मुनिश्रेष्ठ! अबोध पुत्रवाली ये राजपुत्री अब आपकी शरणमें आयी हैं। अतः आप इनकी रक्षा कीजिये॥ ५६॥
आर्तस्य रक्षणे पुण्यं यज्ञाधिकमुदाहृतम्।<br>भयत्रस्तस्य दीनस्य विशेषफलदं स्मृतम्॥ ५७किसी दुःखी प्राणीकी रक्षा करनेमें यज्ञ करनेसे भी अधिक पुण्य बताया गया है। भयभीत तथा दीनकी रक्षाको तो और भी अधिक फलदायक कहा गया है॥ ५७॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 11 A