भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 329

३२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मन्त्रिणस्त्ववशाः कामं ये मे पुत्रं सुदर्शनम्।<br>राजानं कर्तुकामा वै युधाजिद्वशगाश्च ते॥ ३३<br><br>न मे भ्राता तथा शूरो यो मां बन्धात्प्रमोचयेत्।<br>महत्कष्टं च सम्प्राप्तं मया वै दैवयोगतः॥ ३४<br><br>उद्यमः सर्वथा कार्यः सिद्धिर्दैवाद्धि जायते।<br>उपायं पुत्ररक्षार्थं करोम्यद्य त्वरान्विता॥ ३५जो मन्त्री मेरे पुत्र सुदर्शनको राजा बनाना चाहते थे, वे भी अब विवश होकर युधाजित्के अधीन हो गये हैं। मेरा भाई भी ऐसा योद्धा नहीं है, जो मुझे बन्धनसे छुड़ा सके। दैवयोगसे मैं महान् संकटमें पड़ गयी हूँ। फिर भी उद्योग तो सर्वथा करना ही चाहिये, सफलता तो दैवके आधीन है। अतः अब मैं अपने पुत्रकी रक्षाके लिये शीघ्र ही कोई उपाय करूँगी॥ ३३—३५॥
इति सञ्चिन्त्य सा बाला विदल्लं चातिमानिनम्।<br>निपुणं सर्वकार्येषु चिन्त्यं मन्त्रिवरोत्तमम्॥ ३६<br><br>समाहूय तमेकान्ते प्रोवाच बहुदुःखिता।<br>गृहीत्वा बालकं हस्ते रुदती दीनमानसा॥ ३७<br><br>पिता मे निहतः संख्ये पुत्रोऽयं बालकस्तथा।<br>युधाजिद् बलवान् राजा किं विधेयं वदस्व मे॥ ३८ऐसा सोचकर वह रानी अतिसम्मानित, सभी कार्योंमें दक्ष तथा विचार-कुशल श्रेष्ठ मन्त्रिप्रवर विदल्लको बुलवाकर उन्हें एकान्तमें ले गयी और बालकको हाथमें लेकर रोती हुई दीन मनवाली उस मनोरमाने अत्यन्त दुःखित होकर उनसे कहा—मेरे पिता युद्धमें मारे गये और मेरा यह पुत्र अभी अबोध बालक है। राजा युधाजित् बलवान् हैं। [ऐसी परिस्थितिमें] मुझे क्या करना चाहिये? मुझे बतायें॥ ३६—३८॥
तामुवाच विदल्लोऽसौ नात्र स्थातव्यमेव च।<br>गमिष्यामो वने कामं वाराणस्याः पुनः किल॥ ३९<br><br>तत्र मे मातुलः श्रीमान्वर्तते बलवत्तरः।<br>सुबाहुरिति विख्यातो रक्षिता स भविष्यति॥ ४०तब विदल्लने उससे कहा—अब यहाँ नहीं रहना चाहिये, हमलोग यहाँसे वाराणसीके वनमें चलेंगे। वहाँ सुबाहु नामसे विख्यात मेरे मामा रहते हैं। वे समृद्धिशाली तथा महाबलशाली हैं; वे ही हमारे रक्षक होंगे॥ ३९-४०॥
युधाजिद्दर्शनोत्कण्ठमनसा नगराद् बहिः।<br>निर्गत्य रथमारुह्य गन्तव्यं नात्र संशयः॥ ४१मनमें युधाजित्के दर्शनकी लालसासे नगरसे बाहर निकल चलना चाहिये और रथपर सवार हो प्रस्थान कर देना चाहिये; इसमें शंकाकी आवश्यकता नहीं है॥ ४१॥
इत्युक्ता तेन सा राज्ञी गत्वा लीलावतीं प्रति।<br>उवाच पितरं द्रष्टुं गच्छाम्यद्य सुलोचने॥ ४२विदल्लके ऐसा कहनेपर रानी मनोरमा लीलावतीके पास गयी और बोली—हे सुनयने! मैं [तुम्हारे] पिताजीका दर्शन करने जा रही हूँ॥ ४२॥
इत्युक्त्वा रथमारुह्य सैरन्ध्रीसंयुता तदा।<br>विदल्लेन च संयुक्ता निःसृता नगराद् बहिः॥ ४३<br><br>त्रस्ता ह्यार्तातिकृपणा पितुः शोकसमाकुला।<br>दृष्ट्वा युधाजितं भूपं पितरं गतजीवितम्॥ ४४<br><br>संस्कार्य च त्वरायुक्ता वेपमाना भयाकुला।<br>दिनद्वयेन सम्प्राप्ता राज्ञी भागीरथी तटम्॥ ४५ऐसा कहकर मनोरमा एक दासी और मन्त्री विदल्लको साथ लेकर रथपर सवार हो नगरसे बाहर निकल गयी। उस समय बहुत डरी हुई, दुःखित, अत्यन्त दीन तथा पिताके मृत्युजन्य शोकसे व्याकुल वह मनोरमा राजा युधाजित्से मिलकर तत्काल अपने मृत पिताका दाहसंस्कार कराकर भयसे व्याकुल हो काँपती हुई दो दिनोंमें गंगाजीके तटपर पहुँच गयी॥ ४३—४५॥