देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मन्त्रिणस्त्ववशाः कामं ये मे पुत्रं सुदर्शनम्।<br>राजानं कर्तुकामा वै युधाजिद्वशगाश्च ते॥ ३३<br><br>न मे भ्राता तथा शूरो यो मां बन्धात्प्रमोचयेत्।<br>महत्कष्टं च सम्प्राप्तं मया वै दैवयोगतः॥ ३४<br><br>उद्यमः सर्वथा कार्यः सिद्धिर्दैवाद्धि जायते।<br>उपायं पुत्ररक्षार्थं करोम्यद्य त्वरान्विता॥ ३५ | जो मन्त्री मेरे पुत्र सुदर्शनको राजा बनाना चाहते थे, वे भी अब विवश होकर युधाजित्के अधीन हो गये हैं। मेरा भाई भी ऐसा योद्धा नहीं है, जो मुझे बन्धनसे छुड़ा सके। दैवयोगसे मैं महान् संकटमें पड़ गयी हूँ। फिर भी उद्योग तो सर्वथा करना ही चाहिये, सफलता तो दैवके आधीन है। अतः अब मैं अपने पुत्रकी रक्षाके लिये शीघ्र ही कोई उपाय करूँगी॥ ३३—३५॥ |
| इति सञ्चिन्त्य सा बाला विदल्लं चातिमानिनम्।<br>निपुणं सर्वकार्येषु चिन्त्यं मन्त्रिवरोत्तमम्॥ ३६<br><br>समाहूय तमेकान्ते प्रोवाच बहुदुःखिता।<br>गृहीत्वा बालकं हस्ते रुदती दीनमानसा॥ ३७<br><br>पिता मे निहतः संख्ये पुत्रोऽयं बालकस्तथा।<br>युधाजिद् बलवान् राजा किं विधेयं वदस्व मे॥ ३८ | ऐसा सोचकर वह रानी अतिसम्मानित, सभी कार्योंमें दक्ष तथा विचार-कुशल श्रेष्ठ मन्त्रिप्रवर विदल्लको बुलवाकर उन्हें एकान्तमें ले गयी और बालकको हाथमें लेकर रोती हुई दीन मनवाली उस मनोरमाने अत्यन्त दुःखित होकर उनसे कहा—मेरे पिता युद्धमें मारे गये और मेरा यह पुत्र अभी अबोध बालक है। राजा युधाजित् बलवान् हैं। [ऐसी परिस्थितिमें] मुझे क्या करना चाहिये? मुझे बतायें॥ ३६—३८॥ |
| तामुवाच विदल्लोऽसौ नात्र स्थातव्यमेव च।<br>गमिष्यामो वने कामं वाराणस्याः पुनः किल॥ ३९<br><br>तत्र मे मातुलः श्रीमान्वर्तते बलवत्तरः।<br>सुबाहुरिति विख्यातो रक्षिता स भविष्यति॥ ४० | तब विदल्लने उससे कहा—अब यहाँ नहीं रहना चाहिये, हमलोग यहाँसे वाराणसीके वनमें चलेंगे। वहाँ सुबाहु नामसे विख्यात मेरे मामा रहते हैं। वे समृद्धिशाली तथा महाबलशाली हैं; वे ही हमारे रक्षक होंगे॥ ३९-४०॥ |
| युधाजिद्दर्शनोत्कण्ठमनसा नगराद् बहिः।<br>निर्गत्य रथमारुह्य गन्तव्यं नात्र संशयः॥ ४१ | मनमें युधाजित्के दर्शनकी लालसासे नगरसे बाहर निकल चलना चाहिये और रथपर सवार हो प्रस्थान कर देना चाहिये; इसमें शंकाकी आवश्यकता नहीं है॥ ४१॥ |
| इत्युक्ता तेन सा राज्ञी गत्वा लीलावतीं प्रति।<br>उवाच पितरं द्रष्टुं गच्छाम्यद्य सुलोचने॥ ४२ | विदल्लके ऐसा कहनेपर रानी मनोरमा लीलावतीके पास गयी और बोली—हे सुनयने! मैं [तुम्हारे] पिताजीका दर्शन करने जा रही हूँ॥ ४२॥ |
| इत्युक्त्वा रथमारुह्य सैरन्ध्रीसंयुता तदा।<br>विदल्लेन च संयुक्ता निःसृता नगराद् बहिः॥ ४३<br><br>त्रस्ता ह्यार्तातिकृपणा पितुः शोकसमाकुला।<br>दृष्ट्वा युधाजितं भूपं पितरं गतजीवितम्॥ ४४<br><br>संस्कार्य च त्वरायुक्ता वेपमाना भयाकुला।<br>दिनद्वयेन सम्प्राप्ता राज्ञी भागीरथी तटम्॥ ४५ | ऐसा कहकर मनोरमा एक दासी और मन्त्री विदल्लको साथ लेकर रथपर सवार हो नगरसे बाहर निकल गयी। उस समय बहुत डरी हुई, दुःखित, अत्यन्त दीन तथा पिताके मृत्युजन्य शोकसे व्याकुल वह मनोरमा राजा युधाजित्से मिलकर तत्काल अपने मृत पिताका दाहसंस्कार कराकर भयसे व्याकुल हो काँपती हुई दो दिनोंमें गंगाजीके तटपर पहुँच गयी॥ ४३—४५॥ |
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३२१
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३२१
| निषादैर्लुणि्ठता तत्र गृहीतं सकलं वसु।<br>रथञ्चापि गृहीत्वा ते निर्गता दस्यवः शठाः॥ ४६<br><br>रुदती सुतमादाय चारुवस्त्रा मनोरमा।<br>निर्ययौ जाह्नवीतीरे सैरन्ध्रीकरलम्बिता॥ ४७<br><br>आरुह्य च भयाच्छीघ्रमुडुपं सा भयाकुला।<br>तीर्त्वा भागीरथीं पुण्यां ययौ त्रिकूटपर्वतम्॥ ४८ | वहाँके निषादोंने उसे लूट लिया तथा उसका सारा धन और रथ छीन लिया। सब कुछ लेकर वे धूर्त दस्यु चले गये। तब वह रोती हुई अपने पुत्रको लेकर सैरंध्रीके हाथका सहारा लेकर किसी प्रकार गंगाके तटपर गयी और एक छोटी-सी नौकापर डरती हुई बैठकर पवित्र गंगाको पार करके वह भयाक्रान्त मनोरमा त्रिकूटपर्वतपर पहुँच गयी॥ ४६—४८॥ |
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| भारद्वाजाश्रमं प्राप्ता त्वरया च भयाकुला।<br>संवीक्ष्य तापसांस्तत्र सञ्जाता निर्भया तदा॥ ४९<br><br>मुनिना सा ततः पृष्टा कासि कस्य परिग्रहः।<br>कष्टेनात्र कथं प्राप्ता सत्यं ब्रूहि शुचिस्मिते॥ ५०<br><br>देवी वा मानुषी वासि बालपुत्रा वने कथम्।<br>राज्यभ्रष्टेव वामोरु भासि त्वं कमलेक्षणे॥ ५१ | वह भयभीत मनोरमा भारद्वाजमुनिके आश्रममें शीघ्रतासे पहुँची। तब वहाँ तपस्वियोंको देखकर वह निर्भय हो गयी। तदनन्तर भारद्वाजमुनिने पूछा—हे शुचिस्मिते! तुम कौन हो, किसकी पत्नी हो? इतने कष्टसे तुम यहाँ कैसे आ गयी हो? मुझसे सत्य कहो। तुम कोई देवी हो अथवा मानवी हो। अपने इस बालक पुत्रके साथ वनमें क्यों विचरण कर रही हो? हे सुन्दरि! हे कमलनयने! तुम राज्यभ्रष्ट-जैसी प्रतीत हो रही हो॥ ४९—५१॥ |
| एवं सा मुनिना पृष्टा नोवाच वरवर्णिनी।<br>रुदती दुःखसन्तप्ता विदल्लं च समादिशत्॥ ५२ | मुनिके पूछनेपर उस रूपवती रानीने कुछ भी उत्तर नहीं दिया और दुःखसे सन्तप्त होकर रोती हुई उसने अपने मन्त्री विदल्लको सारी बातें बतानेके लिये संकेत किया॥ ५२॥ |
| विदल्लस्तमुवाचेदं ध्रुवसन्धिर्नृपोत्तमः।<br>तस्य भार्या धर्मपत्नी नाम्ना चेयं मनोरमा॥ ५३ | तब विदल्लने मुनिसे कहा—ध्रुवसन्धि एक श्रेष्ठ नरेश थे। ये उन्हींकी मनोरमा नामवाली धर्मपत्नी हैं॥ ५३॥ |
| सिंहेन निहतो राजा सूर्यवंशी महाबलः।<br>पुत्रोऽयं नृपतेस्तस्य नाम्ना चैव सुदर्शनः॥ ५४ | सूर्यवंशमें उत्पन्न उन महाबली महाराजको सिंहने मार डाला। सुदर्शन नामका यह बालक उन्हीं राजाका पुत्र है॥ ५४॥ |
| अस्याः पितातिधर्मात्मा दौहित्रार्थं मृतो रणे।<br>युधाजिद्द्रव्यसन्त्रस्ता सम्प्राप्ता विजने वने॥ ५५ | इनके अत्यन्त धर्मात्मा पिता अपने इसी दौहित्रके लिये संग्राममें मारे गये। अतएव युधाजित्के भयसे संत्रस्त होकर ये इस निर्जन वनमें आयी हुई हैं॥ ५५॥ |
| त्वामेव शरणं प्राप्ता बालपुत्रा नृपात्मजा।<br>त्राता भव महाभाग त्वमस्या मुनिसत्तम॥ ५६ | हे महाभाग! हे मुनिश्रेष्ठ! अबोध पुत्रवाली ये राजपुत्री अब आपकी शरणमें आयी हैं। अतः आप इनकी रक्षा कीजिये॥ ५६॥ |
| आर्तस्य रक्षणे पुण्यं यज्ञाधिकमुदाहृतम्।<br>भयत्रस्तस्य दीनस्य विशेषफलदं स्मृतम्॥ ५७ | किसी दुःखी प्राणीकी रक्षा करनेमें यज्ञ करनेसे भी अधिक पुण्य बताया गया है। भयभीत तथा दीनकी रक्षाको तो और भी अधिक फलदायक कहा गया है॥ ५७॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 11 A
| ३२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
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| ऋषिरुवाच | **ऋषि बोले—**हे कल्याणि! तुम यहाँ भयरहित होकर निवास करो; हे सुव्रते! अपने पुत्रका पालन-पोषण करो। हे विशालनयने! यहाँ तुम्हें शत्रुओंसे उत्पन्न होनेवाला किसी प्रकारका भी भय नहीं करना चाहिये। तुम अपने इस कान्तिमान् पुत्रका पालन करो, तुम्हारा यह पुत्र आगे चलकर राजा होगा। यहाँ तुम लोगोंको कभी भी कोई दुःख तथा शोक नहीं होगा॥ ५८-५९॥ | | निर्भया वस कल्याणि पुत्रं पालय सुव्रते।<br>न ते भयं विशालाक्षि कर्तव्यं शत्रुसम्भवम्॥ ५८<br><br>पालयस्व सुतं कान्तं राजा तेऽयं भविष्यति।<br>नात्र दुःखं तथा शोकः कदाचित्सम्भविष्यति॥ ५९ | | | व्यास उवाच | **व्यासजी बोले—**मुनिके इस प्रकार कहनेपर महारानी मनोरमा निश्चिन्त हो गयीं और मुनिके द्वारा प्रदान की गयी एक कुटियामें वे शोकरहित होकर निवास करने लगीं॥ ६०॥ | | इत्युक्ता मुनिना राज्ञी स्वस्था सा सम्बभूव ह।<br>उटजे मुनिना दत्ते वीतशोका तदावसत्॥ ६० | | | सैरन्ध्रीसहिता तत्र विदल्लेन च संयुता।<br>सुदर्शनं पालयाना न्यवसत्सा मनोरमा॥ ६१ | इस प्रकार सुदर्शनका पालन-पोषण करती हुई वे मनोरमा अपनी दासी तथा मन्त्री विदल्लके साथ वहाँ रहने लगीं॥ ६१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे मनोरमया भारद्वाजाश्रमं प्रति गमनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
अथ षोडशोऽध्यायः
युधाजित्का भारद्वाजमुनिके आश्रमपर आना और उनसे मनोरमाको भेजनेका आग्रह करना, प्रत्युत्तरमें मुनिका 'शक्ति हो तो ले जाओ'—ऐसा कहना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] तदनन्तर महाबली युधाजित्ने रणभूमिसे अयोध्या पहुँचकर सुदर्शनको भी मार डालनेकी इच्छासे मनोरमाके विषयमें लोगोंसे पूछा॥ १॥ | | युधाजित्त्वथ संग्रामाद् गत्वायोध्यां महाबलः।<br>मनोरमां च पप्रच्छ सुदर्शनजिघांसया॥ १ | | | सेवकान् प्रेषयामास क्व गतेति मुहुर्वदन्।<br>शुभे दिनेऽथ दौहित्रं स्थापयामास चासने॥ २ | 'मनोरमा कहाँ चली गयी' ऐसा बार-बार कहते हुए उसने सेवकोंको इधर-उधर भेज दिया। तत्पश्चात् किसी शुभ दिनमें अपने दौहित्रको राजसिंहासनपर बैठा दिया॥ २॥ | | मन्त्रिभिश्च वसिष्ठेन मन्त्रैराथर्वणैः शुभैः।<br>अभिषिक्तश्च सम्पूर्णैः कलशैर्जलपूरितैः॥ ३ | समस्त मन्त्रियोंके साथ गुरु वसिष्ठने अथर्ववेदके कल्याणकारी मन्त्रोंका उच्चारण करके जलपूरित समस्त कलशोंसे राजकुमार शत्रुजित्का अभिषेक किया॥ ३॥ | | भेरीशङ्खनिनादैश्च तूर्याणां चाथ निःस्वनैः।<br>उत्सवस्तु नगर्यां वै सम्बभूव कुरुद्वह॥ ४ | हे कुरुनन्दन! उस समय शंख, भेरीके निनादों तथा तुरहियोंकी ध्वनियोंके साथ पूरे नगरमें उत्सव मनाया गया॥ ४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—11 B
| अ० १६ ] | तृतीय स्कन्ध | ३२३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विप्राणां वेदपाठैश्च बन्दिनां स्तुतिभिस्तथा।<br>अयोध्या मुदितेवासीज्जयशब्दैः सुमङ्गलैः॥ ५ | ब्राह्मणोंके वेदपाठों, बन्दीजनोंके स्तुतिगान तथा मंगलकारी जयघोषसे अयोध्यानगरी प्रफुल्लित-सी दिखायी दे रही थी॥ ५॥ |
| हृष्टपुष्टजनाकीर्णा स्तुतिवादित्रनिःस्वना।<br>नवे तस्मिन्महीपाले पूर्बभौ नूतनेव सा॥ ६ | हृष्ट-पुष्टजनोंसे भरी-पूरी और स्तुतियों तथा वाद्योंकी ध्वनिसे निनादित वह अयोध्या उस नये नरेशके अभिषिक्त होनेपर नवीन पुरीकी भाँति सुशोभित हो रही थी॥ ६॥ |
| केचित्साधुजना ये वै चक्रुः शोकं गृहे स्थिताः।<br>सुदर्शनं विचिन्त्याद्य क्व गतोऽसौ नृपात्मजः॥ ७<br><br>मनोरमातिसाध्वी सा क्व गता सुतसंयुता।<br>पितास्या निहतः संख्ये राज्यलोभेन वैरिणा॥ ८ | उस नगरीमें जो कोई भी सज्जनलोग थे, उन्होंने अपने घरमें ही रहकर शोक मनाया। वे सुदर्शनके विषयमें सोचते हुए कह रहे थे कि वह राजकुमार कहाँ चला गया? महान् पतिव्रता वह मनोरमा अपने पुत्रके साथ कहाँ चली गयी? राज्यलोभी शत्रु युधाजित्ने युद्धमें उसके पिताको मार डाला॥ ७-८॥ |
| इत्येवं चिन्त्यमानास्ते साधवः समबुद्धयः।<br>अतिष्ठन्दुःखितास्तत्र शत्रुजिद्वशवर्तिनः॥ ९ | ऐसा विचार करते हुए सबमें समान बुद्धि रखनेवाले वे साधुजन शत्रुजित्के अधीन होकर दुःखी मनसे रहने लगे॥ ९॥ |
| युधाजिदपि दौहित्रं स्थापयित्वा विधानतः।<br>राज्यञ्च मन्त्रिसात्कृत्वा चलितः स्वां पुरीं प्रति॥ १० | इस प्रकार युधाजित् भी विधानपूर्वक अपने दौहित्रको राजसिंहासनपर बैठाकर तथा राज्यभार मन्त्रियोंको सौंपकर अपनी नगरीको प्रस्थान कर गया॥ १०॥ |
| श्रुत्वा सुदर्शनं तत्र मुनीनामाश्रमे स्थितम्।<br>हन्तुकामो जगामाशु चित्रकूटं स पर्वतम्॥ ११ | सुदर्शन मुनियोंके आश्रममें रह रहा है—ऐसा सुनकर युधाजित् उसे मार डालनेकी इच्छासे तत्काल ही चित्रकूट-पर्वतकी ओर चल पड़ा॥ ११॥ |
| निषादाधिपतिं शूरं पुरस्कृत्य बलाभिधम्।<br>दुर्दशाख्यमगादाशु शृङ्गवेरपुराधिपम्॥ १२ | वह दुर्दर्श नामक शृंगवेरपुरके राजाके यहाँ पहुँचा और उस विशाल सेनासम्पन्न तथा पराक्रमी निषादराजको अगुआ बनाकर उसने शीघ्र ही आगेकी ओर प्रस्थान किया॥ १२॥ |
| श्रुत्वा मनोरमा तत्र बभूवातिसुदुःखिता।<br>आगच्छन्तं बालपुत्रा भयार्ता सैन्यसंयुतम्॥ १३ | युधाजित्को सेनासहित आते हुए सुनकर अबोध सन्तानवाली वह मनोरमा भयभीत तथा अत्यन्त दुःखित हो गयी॥ १३॥ |
| तमुवाचातिशोकार्ता मुनिं साश्रुविलोचना।<br>किं करोमि क्व गच्छामि युधाजित्समुपस्थितः॥ १४ | अत्यन्त शोकसन्तप्त वह मनोरमा आँखोंमें आँसू भरकर मुनि भारद्वाजसे बोली कि युधाजित् यहाँ भी आ पहुँचा; अब मैं क्या करूँ तथा कहाँ जाऊँ?॥ १४॥ |
| पिता मे निहतोऽनेन दौहित्रो भूपतिः कृतः।<br>सुतं मे हन्तुकामोऽत्र समायाति बलान्वितः॥ १५ | इसने मेरे पिताका वध कर दिया तथा अपने दौहित्रको राजा बना दिया। अब वह विशाल सेनाके साथ मेरे पुत्रके वधकी कामनासे यहाँ आ रहा है॥ १५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—11 C
| ३२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
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| पुरा श्रुतं मया स्वामिन् पाण्डवा वै वने स्थिताः।<br>मुनीनामाश्रमे पुण्ये पाञ्चाल्या सहितास्तदा ॥ १६<br>गतास्ते मृगयां पार्था भ्रातरः पञ्च एव ते।<br>द्रौपदी संस्थिता तत्र मुनीनामाश्रमे शुभे ॥ १७ | हे स्वामिन्! मैंने सुना है कि पूर्वकालमें जब मुनियोंके पवित्र आश्रममें द्रौपदीके साथ पाण्डव निवास कर रहे थे, उसी समय एक दिन वे पाँचों भाई आखेटके लिये चले गये और द्रौपदी वहींपर मुनियोंके उस पावन आश्रममें रह गयी थी॥ १६-१७॥ | | धौम्योऽत्रिर्गालवः पैलो जाबालिगौतमो भृगुः।<br>च्यवनश्चात्रिगोत्रश्च कण्वश्चैव जतुः क्रतुः ॥ १८<br>वीतिहोत्रः सुमन्तुश्च यज्ञदत्तोऽथ वत्सलः।<br>राशासनः कहोडश्च यवक्रीर्यज्ञकृत्क्रतुः ॥ १९<br>एते चान्ये च मुनयो भारद्वाजादयः शुभाः।<br>वेदपाठयुताः सर्वे संस्थिताश्चाश्रमे स्थिताः॥ २० | धौम्य, अत्रि, गालव, पैल, जाबालि, गौतम, भृगु, च्यवन, अत्रिगोत्रज कण्व, जतु, क्रतु, वीतिहोत्र, सुमन्तु, यज्ञदत्त, वत्सल, राशासन, कहोड, यवक्री, यज्ञकृत् क्रतु—ये सब और भारद्वाज आदि अन्य पुण्यात्मा मुनिगण उस पावन आश्रममें विराजमान थे। वे सभी वेदपाठ कर रहे थे॥ १८-२०॥ | | दासीभिः सहिता तत्र याज्ञसेनी स्थिता मुने।<br>आश्रमे चारुसर्वाङ्गी निर्भया मुनिसंवृते ॥ २१ | हे मुने! मुनि-समुदायसे सम्पन्न उस आश्रममें सर्वाङ्गसुन्दरी वह द्रौपदी अपनी दासियोंके साथ निर्भय होकर रहती थी॥ २१॥ | | पार्था मृगानुगास्तावत्प्रयाताश्च वनाद्वनम्।<br>धनुर्बाणधरा वीराः पञ्च वै शत्रुतापनाः ॥ २२ | शत्रुओंको सन्ताप पहुँचानेमें समर्थ तथा धनुष-बाण धारण किये वे पाँचों पाण्डव मृगका पीछा करते हुए एक वनसे दूसरे वनमें निकल गये॥ २२॥ | | तावत्सिन्धुपतिः श्रीमान्मार्गस्थो बलसंयुतः।<br>आगतश्चाश्रमाभ्याशे श्रुत्वा तु निगमध्वनिम् ॥ २३ | इसी बीच समृद्धिशाली सिन्धुनरेश [जयद्रथ] वेद-ध्वनि सुनकर अपनी सेनाके साथ आश्रमके पास आ गया॥ २३॥ | | श्रुत्वा वेदध्वनिं राजा मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>उत्ततार रथात्तूर्णं दर्शनाकाङ्क्षया नृपः ॥ २४ | वेदपाठ सुनकर राजा जयद्रथ पुण्यात्मा मुनियोंके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक रथसे उतरा॥ २४॥ | | यदा निरगमत्तत्र भृत्यद्वयसमन्वितः।<br>वेदपाठयुतान्वीक्ष्य मुनीनुद्यमसंस्थितः॥ २५<br>कृताञ्जलिपुटः स्वामिन्संस्थितोऽथ जयद्रथः।<br>आश्रमे मुनिभिर्जुष्टे भूपतिः संविवेश ह॥ २६ | जब वह अपने दो भृत्योंके साथ आगे बढ़ा तो मुनियोंको वेदपाठमें संलग्न देखकर वहींपर बैठ गया। हे स्वामिन्! राजा जयद्रथ हाथ जोड़कर कुछ देरतक बैठा रहा। इसके बाद वह मुनियोंसे भरे हुए उस आश्रममें प्रविष्ट हुआ॥ २५-२६॥ | | तत्रोपविष्टं राजानं द्रष्टुकामाः स्त्रियस्तदा।<br>आययुर्मुनिभार्याश्च कोऽयमित्यब्रुवन्नृपम् ॥ २७ | तत्पश्चात् मुनियोंकी पत्नियाँ तथा अन्य स्त्रियाँ वहाँ बैठे हुए राजा जयद्रथको देखनेकी इच्छासे वहाँ आ गयीं और लोगोंसे पूछने लगीं—यह कौन है?॥ २७॥ | | तासां मध्ये वरारोहा याज्ञसेनी समागता।<br>जयद्रथेन दृष्टा सा रूपेण श्रीरिवापरा॥ २८ | उन्हीं स्त्रियोंके साथ परम सुन्दरी द्रौपदी भी आयी थी। जयद्रथकी दृष्टि दूसरी लक्ष्मीके समान प्रतीत हो रही उस द्रौपदीपर पड़ गयी॥ २८॥ | | तां विलोक्यासितापाङ्गीं देवकन्यामिवापराम्।<br>पप्रच्छ नृपतिर्धौम्यं केयं श्यामा वरानना॥ २९ | दूसरी देवकन्याकी भाँति प्रतीत हो रही उस श्याम नेत्रोंवाली द्रौपदीको देखकर राजा जयद्रथने ऋषि धौम्यसे पूछा कि यह सुन्दर मुखवाली युवती कौन है?॥ २९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 11 D
| अ० १६ ] | तृतीय स्कन्ध | ३२५ |
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| भार्या कस्य सुता कस्य नाम्ना का वरवर्णिनी।<br>रूपलावण्यसंयुक्ता शचीव वसुधाङ्गता॥ ३० | यह किसकी पत्नी है, किसकी पुत्री है और इस परम सुन्दरीका नाम क्या है? रूप तथा सौन्दर्यसे सम्पन्न यह स्त्री तो धरापर उतरकर आयी हुई साक्षात् इन्द्राणीकी भाँति प्रतीत हो रही है॥ ३०॥ | | बर्बूलवनमध्यस्था लवङ्गलतिका यथा।<br>राक्षसीवृन्दगा नूनं रम्भेवाभाति भामिनी॥ ३१ | यह स्त्री बबूलके वनमें स्थित लवंगलता तथा [कुरूपा] राक्षसियोंके समूहमें सचमुच रम्भाके समान प्रतीत हो रही है॥ ३१॥ | | सत्यं वद महाभाग कस्येयं वल्लभाबला।<br>राजपत्नीव चाभाति नैषा मुनिवधूर्द्विज॥ ३२ | हे महाभाग! आप सच-सच बताइये कि यह स्त्री किसकी पत्नी है? हे द्विज! यह तो किसी रानी-जैसी प्रतीत हो रही है; मुनिपत्नी तो यह कदापि नहीं हो सकती॥ ३२॥ | | धौम्य उवाच<br>पाण्डवानां प्रिया भार्या द्रौपदी शुभलक्षणा।<br>पाञ्चाली सिन्धुराजेन्द्र वसत्यत्र वराश्रमे॥ ३३ | धौम्य बोले—हे सिन्धुराजेन्द्र! समस्त शुभ लक्षणोंवाली यह पाण्डवोंकी प्रिय भार्या तथा पांचालनरेशकी पुत्री द्रौपदी है। यह इसी पवित्र आश्रममें निवास करती है॥ ३३॥ | | जयद्रथ उवाच<br>क्व गताः पाण्डवाः पञ्च शूराः सम्प्रति विश्रुताः।<br>वसन्त्यत्र वने वीरा वीतशोका महाबलाः॥ ३४ | जयद्रथ बोला—विख्यात पराक्रमी पाँचों पाण्डव कहाँ गये हुए हैं? क्या वे महान् बलशाली वीर निश्चिन्त होकर इस समय इसी वनमें रह रहे हैं?॥ ३४॥ | | धौम्य उवाच<br>मृगयार्थं गताः पञ्च पाण्डवा रथसंस्थिताः।<br>आगमिष्यन्ति मध्याह्ने मृगानादाय पार्थिवाः॥ ३५ | धौम्य बोले—पाँचों पाण्डव इस समय रथपर आरूढ़ होकर आखेटके लिये वनमें गये हुए हैं। वे राजागण मध्याह्नकालमें मृगोंको लेकर आ जायँगे॥ ३५॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य उदतिष्ठदसौ नृपः।<br>द्रौपदीसन्निधौ गत्वा प्रणम्येदमुवाच ह॥ ३६<br><br>कुशलं ते वरारोहे क्व गताः पतयश्च ते।<br>एकादश गतान्यद्य वर्षाणि च वने किल॥ ३७ | मुनिका यह वचन सुनकर वह राजा जयद्रथ अपने आसनसे उठा और द्रौपदीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार बोला—हे परम सुन्दरि! आप सकुशल तो हैं न, आपके पतिगण कहाँ गये हुए हैं? आपको वनमें निवास करते हुए आज ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं॥ ३६-३७॥ | | द्रौपदी तु तदोवाच स्वस्ति तेऽस्तु नृपात्मज।<br>विश्रमस्वाश्रमाभ्याशे क्षणादायान्ति पाण्डवाः॥ ३८ | तत्पश्चात् द्रौपदीने कहा—हे राजकुमार! आपका कल्याण हो। अभी थोड़ी ही देरमें पाण्डव आ जायँगे, तबतक आप आश्रमके समीप ही विश्राम कीजिये॥ ३८॥ | | एवं ब्रुवन्त्यां तस्यां तु लोभाविष्टः स भूपतिः।<br>जहार द्रौपदीं वीरोऽनादृत्य मुनिसत्तमान्॥ ३९ | उसके ऐसा कहनेपर लोभसे आक्रान्त उस वीर जयद्रथने मुनिवरोंकी अवहेलना करके द्रौपदीका हरण कर लिया॥ ३९॥ |
३२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६
३२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| कस्यचिन्नैव विश्वासः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः।<br>कुर्वन्दुःखमवाप्नोति दृष्टान्तस्त्वत्र वै बलिः॥ ४०<br>वैरोचनसुतः श्रीमान्धर्मिष्ठः सत्यसङ्गरः।<br>यज्ञकर्ता च दाता च शरण्यः साधुसम्मतः॥ ४१ | [मनोरमाने कहा—हे स्वामिन्!] अतएव बुद्धिमान् लोगोंको चाहिये कि वे किसीपर भी विश्वास न करें, ऐसा करनेवाला व्यक्ति दुःख प्राप्त करता है। इस विषयमें राजा बलि उदाहरण हैं। विरोचनपुत्र राजा बलि वैभवसम्पन्न, धर्मपरायण, सत्यप्रतिज्ञ, यज्ञकर्ता, दानी, शरणदाता तथा साधुजनोंके सम्मान्य थे॥ ४०-४१॥ |
| नाधर्मे निरतः क्वापि प्रह्लादस्य च पौत्रकः।<br>एकोनशतयज्ञान्वै स चकार सदक्षिणान्॥ ४२<br>सत्त्वमूर्तिः सदा विष्णुः सेव्यः स योगिनामपि।<br>निर्विकारोऽपि भगवान्देवकार्यार्थसिद्धये॥ ४३<br>कश्यपाच्च समुद्भूतो विष्णुः कपटवामनः।<br>राज्यं छलेन हृतवान्महीं चैव ससागराम्॥ ४४ | प्रह्लादके पौत्र वे राजा बलि कभी अधर्मका आचरण नहीं करते थे। उन्होंने दक्षिणायुक्त निन्यानवे यज्ञ किये थे, फिर भी सत्त्वगुणकी साक्षात् मूर्ति, योगियोंद्वारा सदा आराधित तथा विकारोंसे रहित भगवान् विष्णु भी देवताओंका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये कश्यपसे उत्पन्न हुए और उन्होंने वामनका कपटवेष धारण करके छलपूर्वक उनका राज्य तथा सागरसमेत पृथ्वी ले ली॥ ४२—४४॥ |
| सोऽभवत्सत्यवाग्राजा बलिवैरोचनिस्तदा।<br>कपटं कृतवान्विष्णुुरिन्द्रार्थे तु मया श्रुतम्॥ ४५ | विरोचनके पुत्र बलि एक सत्यवादी राजा थे<br>मैंने तो ऐसा सुना है कि भगवान् विष्णुने इन्द्रके लिये ही यह कपट किया था॥ ४५॥ |
| अन्यः किं न करोत्येवं कृतं वै सत्त्वमूर्त्तिना।<br>वामनं रूपमास्थाय यज्ञपातं चिकीर्षता॥ ४६ | जब साक्षात् सत्त्वकी मूर्ति भगवान् विष्णुने बलिका यज्ञ ध्वंस करनेकी कामनासे वामनरूप धारण करके ऐसा किया, तब अन्य लोग क्यों नहीं करेंगे?॥ ४६॥ |
| न च विश्वसितव्यं वै कदाचित्केनचित्तथा।<br>लोभश्चेतसि चेत्स्वामिन्कीदृक्पापकृतं भयम्॥ ४७ | अतएव हे स्वामिन्! किसीपर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि यदि चित्तमें लोभ रहता है तो पाप करनेमें किसी भी प्रकारका डर ही क्या?॥ ४७॥ |
| लोभाहताः प्रकुर्वन्ति पापानि प्राणिनः किल।<br>परलोकाद्भयं नास्ति कस्यचित्कर्हिचिन्मुने॥ ४८ | हे मुने! लोभके वशीभूत प्राणी सभी प्रकारके पाप कर बैठते हैं। उस समय किसीको परलोकका किंचिन्मात्र भी भय नहीं रहता॥ ४८॥ |
| मनसा कर्मणा वाचा परस्वादानहेतुतः।<br>प्रपतन्ति नराः सम्यग्लोभोपहतचेतसः॥ ४९ | लोभसे नष्ट हुए चित्तवाले प्राणी दूसरोंका धन हड़पनेके लिये मन, वचन तथा कर्मसे सम्यक् तत्पर रहते हैं॥ ४९॥ |
| देवानाराध्य सततं वाञ्छन्ति च धनं नराः।<br>न देवास्तत्करे कृत्वा समर्था दातुमञ्जसा॥ ५० | देवताओंकी निरन्तर आराधना करके मनुष्य उनसे धनकी कामना करते हैं। यह निश्चित है कि वे देवता अपने हाथोंसे धन उठाकर उन्हें देनेमें पूरी तरहसे समर्थ नहीं हैं॥ ५०॥ |
अ० १६ ] तृतीय स्कन्ध ३२७
| अन्यस्यानीयते वित्तं प्रयच्छन्ति मनीषितम्।<br>वाणिज्येनाथ दानेन चौर्येणापि बलेन वा॥ ५१ | किंतु व्यवसाय, दान, चोरी अथवा बलपूर्वक लूट आदि किसी भी माध्यमसे मनुष्यका अभिलषित धन [उन देवताओंके द्वारा] दूसरेके पाससे ला करके उन्हें दे दिया जाता है॥ ५१॥ |
| विक्रयार्थं गृहीत्वा च धान्यवस्त्रादिकं बहु।<br>देवानर्चयते वैश्यो महर्द्धिर्मे भवेदिति॥ ५२ | विक्रय करनेके लिये पर्याप्त धान्य तथा वस्त्र आदिका संग्रह करके वैश्य इस भावनासे देवताओंकी पूजा करता है कि ‘मेरे पास विपुल धन हो जाय।’ |
| नात्र किं परवित्तेच्छा वाणिज्येन परन्तप।<br>ग्रहणकाले तु सम्प्राप्ते महर्घञ्चापि काङ्क्षति॥ ५३ | हे परन्तप! क्या इस व्यापारके द्वारा दूसरोंका धन ग्रहण करनेकी उन्हें इच्छा नहीं होती ? वस्तुका संग्रह करनेके बादसे ही वह भाव महँगा होनेकी इच्छा करने लगता है॥ ५२-५३॥ |
| एवं हि प्राणिनः सर्वे परस्वादानतत्पराः।<br>वर्तन्ते सततं ब्रह्मन् विश्वासः कीदृशः पुनः॥ ५४ | हे ब्रह्मन्! इस प्रकार सभी प्राणी दूसरोंका धन ले लेनेके लिये निरन्तर तत्पर रहते हैं तो फिर विश्वास कैसा?॥ ५४॥ |
| वृथा तीर्थं वृथा दानं वृथाध्ययनमेव च।<br>लोभमोहावृतानां वै कृतं तदकृतं भवेत्॥ ५५ | लोभ तथा मोहसे घिरे हुए लोगोंका तीर्थ, दान, अध्ययन—सब व्यर्थ हो जाता है; उनका किया हुआ वह सारा कर्म न करनेके समान हो जाता है॥ ५५॥ |
| तस्मादेनं महाभाग विसर्जय गृहं प्रति।<br>सपुत्राहं वसिष्यामि जानकीवद् द्विजोत्तम॥ ५६ | अतः हे महाभाग! इस युधाजित्को घर लौटा दीजिये। हे द्विजोत्तम! जानकीकी भाँति मैं अपने पुत्रके साथ यहीं निवास करूँगी॥ ५६॥ |
| इत्युक्तोऽसौ मुनिस्तावद् गत्वा युधाजितं नृपम्।<br>उवाच वचनं राज्ञे भारद्वाजः प्रतापवान्॥ ५७ | मनोरमाके ऐसा कहनेपर तेजस्वी भारद्वाजमुनि राजा युधाजित्के पास जाकर उनसे बोले—हे राजन्! |
| गच्छ राजन् यथाकामं स्वपुरं नृपसत्तम।<br>नेयं मनोरमाभ्येति बालपुत्रा सुदुःखिता॥ ५८ | हे नृपश्रेष्ठ! अपने इच्छानुसार आप अपने नगरको चले जायें। छोटे बालकवाली यह मनोरमा बड़ी दुःखी है; वह नहीं आ रही है॥ ५७-५८॥ |
| युधाजिदुवाच<br>मुने मुञ्च हठं सौम्य विसर्जय मनोरमाम्।<br>न च यास्याम्यहं मुक्त्वा नेष्याम्यद्य बलात्पुनः॥ ५९ | युधाजित् बोला— हे सौम्य मुने! आप हठ छोड़ दीजिये और मनोरमाको विदा कीजिये, इसे छोड़कर मैं नहीं जाऊँगा, [यदि आप नहीं मानेंगे तो] मैं इसे अभी बलपूर्वक ले जाऊँगा॥ ५९॥ |
| ऋषिरुवाच<br>नयस्व यदि शक्तिस्ते बलेनाद्य ममाश्रमात्।<br>विश्वामित्रो यथा धेनुं वसिष्ठस्य मुनेः पुरा॥ ६० | ऋषि बोले— जैसे प्राचीन कालमें विश्वामित्र वसिष्ठमुनिकी गौ ले जानेके लिये उद्यत हुए थे, उसी प्रकार यदि आपमें शक्ति हो तो आज मेरे आश्रमसे इसे बलपूर्वक ले जाइये॥ ६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे युधाजिद्भारद्वाजयोः संवादवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
| ३२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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अथ सप्तदशोऽध्यायः
युधाजित्का अपने प्रधान अमात्यसे परामर्श करना, प्रधान अमात्यका इस सन्दर्भमें वसिष्ठ-विश्वामित्र-प्रसंग सुनाना और परामर्श मानकर युधाजित्का वापस लौट जाना, बालक सुदर्शनको दैवयोगसे कामराज नामक बीजमन्त्रकी प्राप्ति, भगवतीकी आराधनासे सुदर्शनको उनका प्रत्यक्ष दर्शन होना तथा काशिराजकी कन्या शशिकलाको स्वप्नमें भगवतीद्वारा सुदर्शनका वरण करनेका आदेश देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मुनेस्तत्रावनीपतिः।<br>मन्त्रिवृद्धं समाहूय पप्रच्छ तमतन्द्रितः॥ १<br><br>किं कर्तव्यं सुबुद्धेऽत्र मयाद्य वद सुव्रत।<br>बलान्नयामि तां कामं सपुत्राञ्च सुभाषिणीम्॥ २<br><br>रिपुरल्पोऽपि नोपेक्ष्यः सर्वथा शुभमिच्छता।<br>राजयक्ष्मेव संवृद्धो मृत्यवे परिकल्पयेत्॥ ३ | [हे राजन्!] भारद्वाजमुनिका यह वचन सुनकर राजा युधाजित्ने अपने प्रधान अमात्यको बुलाकर बड़ी सावधानीसे उनसे पूछा— हे सुबुद्धे! आप बतायें कि अब मुझे क्या करना चाहिये? हे सुव्रत! क्या मधुर वचन बोलनेवाली मनोरमाको पुत्रसहित बलपूर्वक ले चलूँ? अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह तुच्छ शत्रुकी भी उपेक्षा न करे; क्योंकि वह राजयक्ष्मा रोगके समान बढ़कर मृत्युका कारण बन जाता है॥ १-३॥ |
| नात्र सैन्यं न योद्धास्ति यो मामत्र निवारयेत्।<br>गृहीत्वा हन्मि तं तत्र दौहित्रस्य रिपुं किल॥ ४<br><br>निष्कण्टकं भवेद्राज्यं यताम्यद्य बलादहम्।<br>हते सुदर्शने नूनं निर्भयोऽसौ भवेदिति॥ ५ | यहाँ न कोई सेना है और न कोई योद्धा ही है जो मुझे रोक सके। अतः मैं अपने दौहित्रके शत्रु उस सुदर्शनको पकड़कर अभी मार डालूँगा। यदि मैं बलपूर्वक इस प्रयत्नमें सफल हो जाता हूँ तो उसका राज्य निष्कंटक हो जायगा। सुदर्शनके मर जानेपर निश्चय ही वह निर्भय हो जायगा॥ ४-५॥ |
| प्रधान उवाच | प्रधान अमात्यने कहा— |
| साहसं न हि कर्तव्यं श्रुतं राजन् मुनेर्वचः।<br>विश्वामित्रस्य दृष्टान्तः कथितस्तेन मारिष॥ ६ | हे राजन्! ऐसा दुःसाहस नहीं करना चाहिये। अभी आपने भारद्वाजमुनिका वचन सुना ही है। हे मान्य! उन्होंने [इस सम्बन्धमें] विश्वामित्रका दृष्टान्त दिया है॥ ६॥ |
| पुरा गाधिसुतः श्रीमान्विश्वामित्रोऽतिविश्रुतः।<br>विचरन्स नृपश्रेष्ठो वसिष्ठाश्रममभ्यगात्॥ ७ | प्राचीन समयमें गाधितनय विश्वामित्र एक समृद्धिशाली तथा प्रसिद्ध राजा थे। एक बार वे महाराज घूमते हुए महर्षि वसिष्ठके आश्रममें जा पहुँचे॥ ७॥ |
| नमस्कृत्य च तं राजा विश्वामित्रः प्रतापवान्।<br>उपविष्टो नृपश्रेष्ठो मुनिना दत्तविष्टरः॥ ८<br><br>निमन्त्रितो वसिष्ठेन भोजनाय महात्मना।<br>ससैन्यश्च स्थितो राजा गाधिपुत्रो महायशाः॥ ९ | प्रतापी राजाओंमें श्रेष्ठ वे महाराज विश्वामित्र उन्हें प्रणाम करके मुनिद्वारा प्रदत्त आसनपर बैठ गये। उसके बाद महात्मा वसिष्ठजीने उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया, तब वे महायशस्वी गाधिपुत्र विश्वामित्र अपने सैनिकोंसहित उपस्थित हो गये॥ ८-९॥ |
| अ० १७ ] | तृतीय स्कन्ध | ३२१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नन्दिन्यासादितं सर्वं भक्ष्यभोज्यादिकं च यत्।<br>भुक्त्वा राजा ससैन्यश्च वाञ्छितं तत्र भोजनम्॥ १०<br><br>प्रतापं तञ्च नन्दिन्याः परिज्ञाय स पार्थिवः।<br>ययाचे नन्दिनीं राजा वसिष्ठं मुनिसत्तमम्॥ ११ | उस समय भक्ष्य तथा भोज्य आदि जो भी आवश्यक हुआ, वह सब उनकी नन्दिनी गौने उपस्थित कर दिया। सेनासमेत राजा विश्वामित्र मनोवांछित भोजन करके इसे नन्दिनी गौका प्रभाव समझकर वे राजा उन मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीसे नन्दिनी गौ माँगने लगे॥ १०-११॥ |
| विश्वामित्र उवाच<br>मुने धेनुसहस्त्रं ते घटोध्नीनां ददाम्यहम्।<br>नन्दिनीं देहि मे धेनुं प्रार्थयामि परन्तप॥ १२ | विश्वामित्र बोले—हे मुने! मैं आपको पर्याप्त दूध देनेवाली हजारों गौएँ दूँगा; आप मुझे यह अपनी नन्दिनी गौ दे दीजिये। हे परन्तप! मैं यही प्रार्थना कर रहा हूँ॥ १२॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>होमधेनुरियं राजन्न ददामि कथञ्चन।<br>सहस्रञ्चापि धेनूनां तवेदं तव तिष्ठतु॥ १३ | वसिष्ठ बोले—हे राजन्! यह गौ होमके लिये हविष्य प्रदान करती है। अतः मैं इसे किसी प्रकार भी नहीं दे सकता। आपकी हजार गौएँ आपके ही पास रहें॥ १३॥ |
| विश्वामित्र उवाच<br>अयुतं वाथ लक्ष्यं वा ददामि मनसेप्सितम्।<br>देहि मे नन्दिनीं साधो ग्रहीष्यामि बलादथ॥ १४ | विश्वामित्र बोले—हे साधो! मैं आपकी इच्छाके अनुसार दस हजार अथवा एक लाख गौएँ दे रहा हूँ, आप नन्दिनी मुझे दे दीजिये, नहीं तो मैं इसे बलपूर्वक ग्रहण कर लूँगा॥ १४॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>कामं गृहाण नृपते बलादद्य यथारुचि।<br>नाहं ददामि ते राजन्स्वेच्छया नन्दिनीं गृहात्॥ १५ | वसिष्ठ बोले—हे नृपते! जैसी आपकी रुचि हो, आप इसे बलपूर्वक अभी ले लीजिये, किंतु हे राजन्! मैं तो इस नन्दिनीको स्वेच्छासे अपने आश्रमसे आपको नहीं दूँगा॥ १५॥ |
| तच्छ्रुत्वा नृपतिर्भृत्यानादिदेश महाबलान्।<br>नयध्वं नन्दिनीं धेनुं बलदर्पसुसंस्थिताः॥ १६ | यह सुनकर राजा विश्वामित्रने अपने महाबली अनुचरोंको आदेश दिया कि तुमलोग इस नन्दिनी गौको ले चलो। तब बलके अभिमानमें चूर उन अनुचरोंने आक्रमण करके उस धेनुको बलपूर्वक बाँधकर पकड़ लिया॥ १६ ½ ॥ |
| ते भृत्या जगृहुस्तां तु हठादाक्रम्य यन्त्रिताम्।<br>वेपमाना मुनिं प्राह सुरभिः साश्रुलोचना॥ १७ | तब आँखोंमें आँसू भरकर काँपती हुई उस नन्दिनीने मुनिसे कहा—हे मुने! आप मुझे क्यों त्याग रहे हैं? ये सब मुझे बाँधकर खींच रहे हैं॥ १७ ½ ॥ |
| मुने त्यजसि मां कस्मात्कर्षयन्ति सुयन्त्रिताम्।<br>मुनिस्तां प्रत्युवाचेदं त्यजे नाहं सुदुग्धदे॥ १८<br><br>बलान्नयति राजासौ पूजितोऽद्य मया शुभे।<br>किं करोमि न चेच्छामि त्यक्तुं त्वां मनसा किल॥ १९ | वसिष्ठजीने उससे कहा—हे उत्तम दूध देनेवाली नन्दिनी! मैं तुम्हें त्याग नहीं रहा हूँ। ये राजा तुम्हें बलपूर्वक ले जा रहे हैं; जबकि मैंने अभी इनका स्वागत किया है। हे शुभे! मैं क्या करूँ? मैं अपने मनसे तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता॥ १८-१९॥ |
| ३३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| इत्युक्ता मुनिना धेनुः क्रोधयुक्ता बभूव ह।<br>हम्भारवं चकाराशु क्रूरशब्दं सुदारुणम्॥ २० | मुनिके ऐसा कहनेपर वह धेनु क्रोधित हो गयी और कर्कश शब्दोंवाला अत्यन्त भयंकर हम्भारव करने लगी॥ २०॥ |
| उद्गतास्तत्र देहात्तु दैत्या घोरतरास्तदा।<br>सायुधास्तिष्ठ तिष्ठेति ब्रुवन्तः कवचावृताः॥ २१ | उसी समय उसके शरीरसे महाभयंकर दैत्य 'ठहरो-ठहरो'—ऐसा कहते हुए निकल पड़े। वे शस्त्र धारण किये हुए थे और उनका शरीर कवचसे ढँका हुआ था॥ २१॥ |
| सैन्यं सर्वं हतं तैस्तु नन्दिनी प्रतिमोचिता।<br>एकाकी निर्गतो राजा विश्वामित्रोऽतिदुःखितः॥ २२<br><br>हन्त पापोऽतिदीनात्मा निन्दन् क्षात्रबलं महत्।<br>ब्राह्मं बलं दुराराध्यं मत्वा तपसि संस्थितः॥ २३<br><br>तप्त्वा बहूनि वर्षाणि तपो घोरं महावने।<br>ऋषित्वं प्राप गाधेयस्त्यक्त्वा क्षात्रं विधिं पुनः॥ २४ | उन्होंने सारी सेनाका संहार कर दिया और नन्दिनीको उनसे छुड़ा लिया। तब अत्यन्त व्यथित होकर राजा विश्वामित्र अकेले ही घर लौट गये। [वे अपने मनमें सोचने लगे—] हाय! मैं कितना पापी एवं दीनात्मा हूँ। क्षत्रियबलकी निन्दा करते हुए वे विश्वामित्र ब्राह्मणके बलको महान् तथा दुराराध्य समझकर तप करने लगे। महावनमें अनेक वर्षोंतक कठोर तपस्या करके विश्वामित्रने क्षात्रधर्मका त्याग करके अन्तमें ऋषित्व प्राप्त कर लिया॥ २२—२४॥ |
| तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र मा कृथा वैरमद्भुतम्।<br>कुलनाशकरं नूनं तापसैः सह संयुगम्॥ २५ | अतः हे राजेन्द्र! आप भी ऐसा अद्भुत वैर न करें; क्योंकि तपस्वियोंके साथ किया जानेवाला युद्ध निश्चित ही कुलका नाश करनेवाला होता है॥ २५॥ |
| मुनिवर्यं व्रजाद्य त्वं समाश्वास्य तपोनिधिम्।<br>सुदर्शनोऽपि राजेन्द्र तिष्ठत्वत्र यथासुखम्॥ २६ | अतः आप तपोनिधि मुनिवर भारद्वाजके पास अभी जाइये और उन्हें आश्वासन दीजिये। हे राजेन्द्र! सुदर्शनको यहीं छोड़ दीजिये, जिससे वह आनन्दपूर्वक रह सके॥ २६॥ |
| बालोऽयं निर्धनः किं ते करिष्यति नृपाहितम्।<br>वृथा ते वैरभावोऽयमनाथे दुर्बले शिशौ॥ २७ | हे राजन्! यह दीन बालक आपका क्या अहित कर सकेगा? ऐसे दुर्बल एवं अनाथ बालकके प्रति आपका यह वैरभाव व्यर्थ है॥ २७॥ |
| दया सर्वत्र कर्तव्या दैवाधीनमिदं जगत्।<br>ईर्ष्या किं नृपश्रेष्ठ यद्भाव्यं तद्भविष्यति॥ २८ | हे नृपश्रेष्ठ! सर्वत्र दया करनी चाहिये। यह संसार सदा दैवके अधीन रहता है। ईर्ष्या करनेसे क्या लाभ? जो होनी होगी, वह तो होकर ही रहेगी॥ २८॥ |
| वज्रं तृणायते राजन् दैवयोगान्न संशयः।<br>तृणं वज्रायते क्वापि समये दैवयोगतः॥ २९<br><br>शशको हन्ति शार्दूलं मशको वै तथा गजम्।<br>साहसं मुञ्च मेधाविन् कुरु मे वचनं हितम्॥ ३० | हे राजन्! दैवयोगसे कभी वज्र तृण बन जाता है और किसी समय तृण वज्र बन जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। दैवयोगसे ही खरगोश सिंहको और मच्छर हाथीको मार देता है। अतः हे मेधाविन्! आप दुःसाहस छोड़िये तथा मेरा हितकर वचन मानिये॥ २९-३०॥ |
| अ० १७] | तृतीय स्कन्ध | ३३१ |
|---|
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य युधाजिन्नृपसत्तमः।<br>प्रणम्य तं मुनिं मूर्ध्ना जगाम स्वपुरं नृपः ॥ ३१<br><br>मनोरमापि स्वस्थाभूदाश्रमे तत्र संस्थिता।<br>पालयामास पुत्रं तं सुदर्शनमृतव्रतम् ॥ ३२ | [हे जनमेजय!] मन्त्रीकी यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ राजा युधाजित् भारद्वाजमुनिको सिर झुकाकर प्रणाम करके अपने पुरको चले गये। तब रानी मनोरमा भी निश्चिन्त हो गयीं और उस आश्रममें रहती हुई अपने सत्यव्रती पुत्र सुदर्शनका पालन करने लगीं ॥ ३१-३२॥ |
| दिने दिने कुमारोऽसौ जगामोपचयं ततः।<br>मुनिबालगतः क्रीडन्निर्भयः सर्वतः शुभः॥ ३३<br><br>एकस्मिन्समये तत्र विदल्लं समुपागतम्।<br>क्लीबेति मुनिपुत्रस्तमामन्त्रयत्तदन्तिके ॥ ३४ | अब वह सुन्दर कुमार मुनिबालकोंके साथ सर्वत्र निर्भय होकर क्रीड़ा करता हुआ दिनोंदिन बढ़ने लगा। एक दिन सुदर्शनके पास आये हुए विदल्लको किसी मुनिकुमारने ‘क्लीब’ इस नामसे पुकारा ॥ ३३-३४ ॥ |
| सुदर्शनस्तु तच्छ्रुत्वा दधारैकाक्षरं स्फुटम्।<br>अनुस्वारायुतं तच्च प्रोवाचापि पुनः पुनः॥ ३५ | उसे सुनकर सुदर्शनने उसके एकाक्षर ‘क्ली’ शब्दको स्पष्टरूपसे धारण कर लिया और उस अनुस्वारविहीन अक्षरका ही वह बार-बार उच्चारण करने लगा ॥ ३५ ॥ |
| बीजं वै कामराजाख्यं गृहीतं मनसा तदा।<br>जजाप बालकोऽत्यर्थं धृत्वा चेतसि सादरम् ॥ ३६<br><br>भावियोगान्महाराज कामराजाख्यमद्भुतम्।<br>स्वभावेनैव तेनेत्थं गृहीतं बालकेन वै॥ ३७ | बालकने इस कामराज नामक बीजमन्त्रको मनसे ग्रहण कर लिया और उसे हृदयंगम करके आदरपूर्वक जपना प्रारम्भ कर दिया। हे महाराज! दैवयोगसे ही उस बालक सुदर्शनको यह कामराज नामक अद्भुत बीजमन्त्र स्वयमेव प्राप्त हो गया ॥ ३६-३७॥ |
| तदासौ पञ्चमे वर्षे प्राप्य मन्त्रमनुत्तमम्।<br>ऋषिच्छन्दोविहीनञ्च ध्यानन्यासविवर्जितम्॥ ३८<br><br>प्रजपन्मनसा नित्यं क्रीडत्यपि स्वपित्यपि।<br>विसस्मार न तं मन्त्रं ज्ञात्वा सारमिति स्वयम् ॥ ३९ | उस समय केवल पाँच वर्षकी अवस्थामें ही वह ऋषि तथा छन्दसे विहीन और ध्यान तथा न्यासरहित मन्त्र प्राप्तकर मन-ही-मन उसे जपता हुआ खेलता तथा सोता था; उस मन्त्रको स्वयं सबका सार समझकर वह सुदर्शन उसे कभी नहीं भूलता था॥ ३८-३९॥ |
| वर्षे चैकादशे प्राप्ते कुमारोऽसौ नृपात्मजः।<br>मुनिना चोपनीतोऽथ वेदमध्यापितस्तथा ॥ ४०<br><br>धनुर्वेदं तथा साङ्गं नीतिशास्त्रं विधानतः।<br>अभ्यस्ताः सकला विद्यास्तेन मन्त्रबलादिव ॥ ४१ | मुनिने ग्यारहवें वर्षमें उस राजकुमारका उपनयन संस्कार किया और उसे वेद पढ़ाया एवं सांगोपांग धनुर्वेद तथा नीतिशास्त्रकी विधिवत् शिक्षा दी। उस बालकने उसी मन्त्रके प्रभावसे समस्त विद्याओंका सम्यक् अभ्यास कर लिया ॥ ४०-४१॥ |
| कदाचित्सोऽपि प्रत्यक्षं देवीरूपं ददर्श ह।<br>रक्ताम्बरं रक्तवर्णं रक्तसर्वाङ्गभूषणम् ॥ ४२ | एक बार उसने देवीके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन भी किया। उस समय वे लाल वस्त्र धारण किये थीं, उनके विग्रहका रंग भी लाल था और उनके सभी अंगोंमें रक्तवर्णके ही आभूषण सुशोभित हो रहे |
३३२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १७
३३२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १७
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गरुडे वाहने संस्थां वैष्णवीं शक्तिमद्भुताम्।<br>दृष्ट्वा प्रसन्नवदनः स बभूव नृपात्मजः ॥ ४३ | थे। [इस प्रकारका दिव्य स्वरूप धारणकर] वाहन गरुडपर विराजमान उन अद्भुत वैष्णवी शक्तिको देखकर राजकुमार सुदर्शनके मुखमण्डलपर प्रसन्नता छा गयी॥ ४२-४३॥ |
| वने तस्मिन्स्थितः सोऽथ सर्वविद्यार्थतत्त्ववित्।<br>मातरं सेवमानस्तु विजहार नदीतटे॥ ४४<br><br>शरासनञ्च सम्प्राप्तं विशिखाश्च शिलाशिताः।<br>तूणीरकवचं तस्मै दत्तं चाम्बिकया वने ॥ ४५ | इस प्रकार समस्त विद्याओंका रहस्य जाननेवाला वह सुदर्शन उस वनमें रहकर जगदम्बाकी उपासना करता हुआ नदीतटपर विचरण करने लगा। उसी वनमें भगवती जगदम्बाने उसे धनुष, अनेक तीक्ष्ण बाण, तूणीर तथा कवच प्रदान किये॥ ४४-४५॥ |
| एतस्मिन्समये पुत्री काशिराजस्य सुप्रिया।<br>नाम्ना शशिकला दिव्या सर्वलक्षणसंयुता ॥ ४६<br><br>शुश्राव नृपपुत्रं तं वनस्थञ्च सुदर्शनम्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नं शूरं काममिवापरम्॥ ४७ | इसी समय सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त 'शशिकला' नामसे विख्यात काशिराजकी परम प्रिय पुत्रीने उस वनमें रहनेवाले समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, पराक्रमी तथा दूसरे कामदेवके समान प्रतीत होनेवाले राजकुमार सुदर्शनके विषयमें सुना॥ ४६-४७॥ |
| बन्दीजनमुखाच्छ्रुत्वा राजपुत्रं सुसम्मतम्।<br>चकमे मनसा तं वै वरं वरयितुं धिया॥ ४८ | बन्दीजनोंके मुखसे अतिसम्मानित राजकुमारके विषयमें सुनकर शशिकलाने मन-ही-मन बुद्धिपूर्वक उसे पतिरूपमें वरण करनेका निश्चय कर लिया॥ ४८॥ |
| स्वप्ने तस्याः समागम्य जगदम्बा निशान्तरे।<br>उवाच वचनं चेदं समाश्वास्य सुसंस्थिता॥ ४९<br><br>वरं वरय सुश्रोणि मम भक्तः सुदर्शनः।<br>सर्वकामप्रदस्तेऽस्तु वचनान्मम भामिनि ॥ ५० | [उसी दिन] आधी रातको जगदम्बा स्वप्नमें शशिकलाके पास आकर स्थित हो गयीं और उसे आश्वस्त करके यह वचन बोलीं—'हे सुश्रोणि! सुदर्शन मेरा भक्त है, तुम उसीको अपना पति स्वीकार कर लो। हे भामिनि! मेरी आज्ञासे वह तुम्हारी सब कामनाएँ पूर्ण करेगा'॥ ४९-५०॥ |
| एवं शशिकला दृष्ट्वा स्वप्ने रूपं मनोहरम्।<br>अम्बाया वचनं स्मृत्वा जहर्ष भृशमानिनी ॥ ५१ | इस प्रकार स्वप्नमें भगवतीका मनोहर स्वरूप देखकर तथा उनके इस वचनको स्मरण करके परम मानिनी शशिकला प्रसन्न हो गयी॥ ५१॥ |
| उत्थिता सा मुदा युक्ता पृष्टा मात्रा पुनः पुनः।<br>प्रमोदे कारणं बाला नोवाचातित्रपान्विता॥ ५२ | वह प्रसन्नताके साथ उठ गयी। उसकी माताने उसे हर्षित देखकर बार-बार प्रसन्नताका कारण पूछा, किंतु उस सुन्दरीने अति लज्जाके कारण कुछ नहीं बताया॥ ५२॥ |
| जहास मुदमापन्ना स्मृत्वा स्वप्नं मुहुर्मुहुः।<br>सखीं प्राह तदान्यां वै स्वप्नवृत्तं सुविस्तरम् ॥ ५३ | स्वप्नका बार-बार स्मरण करके प्रसन्नतासे युक्त होकर वह जोरसे हँस पड़ती थी। तब उसने अपनी एक अन्य सखीसे स्वप्नका सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह दिया॥ ५३॥ |
| कदाचित्सा विहारार्थमवापोपवनं शुभम्।<br>सखीयुक्ता विशालाक्षी चम्पकैरुपशोभितम् ॥ ५४<br><br>पुष्पाणि चिन्वती बाला चम्पकाधःस्थिताबला। | किसी दिन वह विशालनयनी शशिकला अपनी सखीके साथ चम्पाके वृक्षोंसे सुशोभित एक सुन्दर उपवनमें विहारके लिये गयी। वहाँ पुष्प चुनती हुई वह कुमारी एक चम्पावृक्षके नीचे खड़ी हो गयी। |
| अ० १८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३३३ |
|---|
| अपश्यद् ब्राह्मणं मार्गे आगच्छन्तं त्वरान्वितम् ॥ ५५<br>तं प्रणम्य द्विजं श्यामा बभाषे मधुरं वचः ।<br>कुतो देशान्महाभाग कृतमागमनं त्वया ॥ ५६<br><br>द्विज उवाच<br>भारद्वाजाश्रमाद् बाले नूनमागमनं मम ।<br>जातं वै कार्ययोगेन किं पृच्छसि वदस्व मे ॥ ५७<br><br>शशिकलोवाच<br>तत्राश्रमे महाभाग वर्णनीयं किमस्ति वै ।<br>लोकातिगं विशेषेण प्रेक्षणीयतमं किल ॥ ५८<br><br>ब्राह्मण उवाच<br>ध्रुवसन्धिसुतः श्रीमानास्ते सुदर्शनो नृपः ।<br>यथार्थनामा सुश्रोणि वर्तते पुरुषोत्तमः ॥ ५९<br>तस्य लोचनमत्यन्तं निष्फलं प्रतिभाति मे ।<br>येन दृष्टो न वामोरु कुमारस्तु सुदर्शनः ॥ ६०<br>एकत्र निहिता धात्रा गुणाः सर्वे सिसृक्षुणा ।<br>गुणानामाकरं द्रष्टुं मन्ये तेनैव कौतुकात् ॥ ६१<br>तव योग्यः कुमारोऽसौ भर्ता भवितुमर्हति ।<br>योगोऽयं विहितोऽप्यासीन्मणिकाञ्चनयोरिव ॥ ६२ | तभी उसने मार्गमें शीघ्रतापूर्वक आते हुए किसी ब्राह्मणको देखा। उस ब्राह्मणको प्रणाम करके सुन्दरी शशिकलाने मधुर वाणीमें कहा—हे महाभाग ! आप किस देशसे आये हैं ? ॥ ५४–५६ ॥<br><br>ब्राह्मणने कहा—हे बाले ! एक कार्यवश भारद्वाजमुनिके आश्रमसे मेरा आगमन हुआ है। तुम क्या पूछ रही हो; मुझे बताओ ॥ ५७ ॥<br><br>शशिकला बोली—हे महाभाग ! उस आश्रममें अत्यन्त प्रशंसनीय, संसारमें सबसे बढ़कर तथा विशेषरूपसे दर्शनीय कौन-सी वस्तु है ? ॥ ५८ ॥<br><br>ब्राह्मणने कहा—हे सुश्रोणि ! महाराज ध्रुवसन्धिके पुत्र श्रीमान् सुदर्शन वहाँ रहते हैं। पुरुषोंमें श्रेष्ठ वे सुदर्शन अपने नामके अनुरूप ही हैं ॥ ५९ ॥<br><br>हे सुन्दरि ! जिसने राजकुमार सुदर्शनको नहीं देखा, मैं तो उसके नेत्रोंको अत्यन्त निष्फल मानता हूँ ॥ ६० ॥<br><br>सृष्टिकी अभिलाषावाले ब्रह्माने कौतूहलवश उन एक सुदर्शनमें सभी गुणोंको भर दिया है। अतः गुणोंकी खान सुदर्शनको ही मैं देखनेयोग्य मानता हूँ ॥ ६१ ॥<br><br>वे राजकुमार तुम्हारे अनुरूप हैं और तुम्हारे पति होनेयोग्य हैं। मणि और कांचनकी भाँति यह तुम दोनोंका संयोग पहलेसे ही निश्चित हो चुका है ॥ ६२ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विश्वामित्रकथोत्तरं राजपुत्रस्य कामबीजप्राप्तिवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
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अथाष्टादशोऽध्यायः
राजकुमारी शशिकलाद्वारा मन-ही-मन सुदर्शनका वरण करना, काशिराजद्वारा स्वयंवरकी घोषणा, शशिकलाका सखीके माध्यमसे अपना निश्चय माताको बताना
| व्यास उवाच<br>श्रुत्वा तद्वचनं श्यामा प्रेमयुक्ता बभूव ह ।<br>प्रतस्थे ब्राह्मणस्तस्मात्स्थानादुक्त्वा समाहितः ॥ १<br><br>सा तु पूर्वानुरागाद्वै मग्ना प्रेम्णातिचञ्चला ।<br>कामबाणाहतेवास गते तस्मिन्द्विजोत्तमे ॥ २ | व्यासजी बोले—उस ब्राह्मणका वचन सुनकर सुन्दरी शशिकला प्रेमविभोर हो गयी और वह ब्राह्मण इतना कहकर शान्तभावसे उस स्थानसे चला गया ॥ १ ॥<br><br>उस श्रेष्ठ ब्राह्मणके चले जानेपर वह सुन्दरी पूर्व अनुरागसे तथा विप्रकी बातोंसे प्रेमातिरेकके कारण अत्यधिक अधीर हो उठी ॥ २ ॥ |
३३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८
३३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८
| अथ कामार्दिता प्राह सखीं छन्दोऽनुवर्तिनीम्।<br>विकारश्च समुत्पन्नो देहे यच्छ्रवणादनु ॥ ३<br><br>अज्ञातरसविज्ञानं कुमारं कुलसम्भवम्।<br>धुनोति मदनः पापः किं करोमि क्व यामि च ॥ ४ | तदनन्तर उस शशिकलाने अपनी इच्छाके अनुसार चलनेवाली एक सखीसे कहा कि रससे अनभिज्ञ तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न उस राजकुमारके विषयमें सुनकर मेरे शरीरमें विकार उत्पन्न हो गया है। इस समय कामदेव मुझे अत्यधिक पीड़ा दे रहा है। अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? ॥ ३-४ ॥ |
|---|---|
| स्वप्नेषु वा मया दृष्टः पञ्चबाण इवापरः।<br>तपते मे मनोऽत्यर्थं विरहाकुलितं मृदु ॥ ५ | जबसे मैंने स्वप्नमें दूसरे कामदेवके सदृश उस राजकुमारको देखा है, तभीसे विरहसे आकुल हुआ मेरा कोमल मन अत्यधिक सन्तप्त हो रहा है ॥ ५ ॥ |
| चन्दनं देहलग्नं मे विषवद्भाति भामिनि।<br>स्रगियं सर्पवच्चैव चन्द्रपादाश्च वह्निवत् ॥ ६ | हे भामिनि! इस समय मेरे शरीरमें लगा हुआ चन्दन विषके समान, यह माला सर्पके तुल्य तथा चन्द्रमाकी किरणें अग्निसदृश प्रतीत हो रही हैं ॥ ६ ॥ |
| न च हर्म्ये वने शं मे दीर्घिकायां न पर्वते।<br>न दिवा न निशायां वा न सुखं सुखसाधनैः ॥ ७ | इस समय महलमें, वनमें, बावलीमें तथा पर्वतपर—कहीं भी मेरे चित्तको शान्ति नहीं मिल पा रही है। नानाविध सुख-साधनोंसे दिनमें अथवा रातमें किसी भी समय सुखकी अनुभूति नहीं हो रही है ॥ ७ ॥ |
| न शय्या न च ताम्बूलं न गीतं न च वादनम्।<br>प्रीणयन्ति मनो मेऽद्य न तृप्ते मम लोचने ॥ ८ | शय्या, ताम्बूल, गायन तथा वादन—इनमें कोई भी चीजें मेरे मनको प्रसन्न नहीं कर पा रही हैं और न तो मेरे नेत्रोंको कोई भी वस्तु तृप्त ही कर पा रही है ॥ ८ ॥ |
| प्रयाम्यद्य वने तत्र यत्रासौ वर्तते शठः।<br>भीतास्मि कुललज्जायाः परतन्त्रा पितुस्तथा ॥ ९ | [जी करता है] उसी वनमें चली जाऊँ जहाँ वह निष्ठुर विद्यमान है, किंतु कुलकी लज्जाके कारण भयभीत हूँ, और फिर अपने पिताके अधीन भी हूँ ॥ ९ ॥ |
| स्वयंवरं पिता मेऽद्य न करोति करोमि किम्।<br>दास्यामि राजपुत्राय कामं सुदर्शनाय वै ॥ १० | क्या करूँ, मेरे पिता अभी मेरा स्वयंवर भी नहीं आयोजित कर रहे हैं। [यदि स्वयंवर हुआ तो] मैं इच्छापूर्वक अपनेको सुदर्शनको समर्पित कर दूँगी ॥ १० ॥ |
| सन्त्यन्ये पृथिवीपालाः शतशः सम्भृतर्द्धयः।<br>रमणीया न मे तेऽद्य राज्यहीनोऽप्यसौ मतः ॥ ११ | यद्यपि दूसरे सैकड़ों समृद्धिशाली नरेश हैं, परंतु वे मुझे रमणीय नहीं लगते। राज्यहीन होते हुए भी इस सुदर्शनको मैं अधिक रमणीय मानती हूँ ॥ ११ ॥ |
| व्यास उवाच<br>एकाकी निर्धनश्चैव बलहीनः सुदर्शनः।<br>वनवासी फलाहारस्तस्याश्चित्ते सुसंस्थितः ॥ १२<br><br>वाग्बीजस्य जपात्सिद्धिस्तस्या एषाप्युपस्थिता।<br>सोऽपि ध्यानपरोऽत्यन्तं जजाप मन्त्रमुत्तमम् ॥ १३ | **व्यासजी बोले—**अकेला, निर्धन, बलहीन, वनवासी तथा फलका आहार करनेवाला होते हुए भी सुदर्शन उस शशिकलाके हृदयमें पूर्णरूपसे बस गया था। भगवतीके वाग्बीजमन्त्रके जपसे सुदर्शनको यह सिद्धि प्राप्त हो गयी थी। वह पूर्णरूपसे ध्यानमग्न होकर उस सर्वोत्तम मन्त्रका निरन्तर जप करता रहता था ॥ १२-१३ ॥ |
| अ० १८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वप्ने पश्यत्यसौ देवीं विष्णुमायामखण्डिताम्।<br>विश्वमातरमव्यक्तां सर्वसम्पत्कराम्बिकाम्॥ १४ | एक बार स्वप्नमें सुदर्शनने उन अव्यक्त, पूर्ण ब्रह्मस्वरूपा, जगज्जननी, विष्णुमाया तथा सभी सम्पदा प्रदान करानेवाली भगवती अम्बिकाका दर्शन किया॥ १४॥ |
| शृङ्गवेरपुराध्यक्षो निषादः समुपेत्य तम्।<br>ददौ रथवरं तस्मै सर्वोपस्करसंयुतम्॥ १५<br><br>चतुर्भिस्तुरगैर्युक्तं पताकावरमण्डितम्।<br>जैत्रं राजसुतं ज्ञात्वा ददौ चोपायनं तदा॥ १६<br><br>सोऽपि जग्राह तं प्रीत्या मित्रत्वेन सुसंस्थितम्।<br>वन्यैर्मूलफलैः सम्यगर्चयामास शम्बरम्॥ १७ | उसी समय शृंगवेरपुरके अधिपति निषादने सुदर्शनके पास आकर उसे सब प्रकारकी सामग्रियोंसे परिपूर्ण उत्तम रथ प्रदान किया। उस रथमें चार घोड़े जुते हुए थे और वह सुन्दर पताकासे सुशोभित था। निषादराजने राजकुमार सुदर्शनको विजयशाली समझकर उसे भेंटस्वरूप वह रथ दिया था। सुदर्शनने भी प्रेमपूर्वक उसे स्वीकार कर लिया और मित्ररूपमें आये हुए उस निषादका वन्य फल-मूलोंसे भलीभाँति सत्कार किया॥ १५-१७॥ |
| कृतातिथ्ये गते तस्मिन्निषादाधिपतौ तदा।<br>मुनयः प्रीतियुक्तास्ते तमूचुस्तापसा मिथः॥ १८<br><br>राजपुत्र ध्रुवं राज्यं प्राप्स्यसि त्वं च सर्वथा।<br>स्वल्पैरहोभिरव्यग्रः प्रतापान्नात्र संशयः॥ १९<br><br>प्रसन्ना तेऽम्बिका देवी वरदा विश्वमोहिनी।<br>सहायस्तु सुसम्पन्नो न चिन्तां कुरु सुव्रत॥ २० | तब आतिथ्य स्वीकार करके उस निषादराजके चले जानेपर वहाँके तपस्वी मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर सुदर्शनसे कहने लगे—हे राजकुमार! आप धैर्यवान् हैं; भगवतीकी कृपासे थोड़े ही दिनोंमें निश्चय ही अपना राज्य प्राप्त करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रत! विश्वमोहिनी और वरदायिनी भगवती अम्बिका आपके ऊपर प्रसन्न हैं। अब आपको उत्तम सहायक भी मिल गया है, आप चिन्ता न करें॥ १८-२०॥ |
| मनोरमां तथोचुस्ते मुनयः संशितव्रताः।<br>पुत्रस्तेऽद्य धराधीशो भविष्यति शुचिस्मिते॥ २१ | तत्पश्चात् उन व्रतधारी मुनियोंने मनोरमासे कहा—हे शुचिस्मिते! अब आपका पुत्र सुदर्शन शीघ्र ही भूमण्डलका राजा होगा॥ २१॥ |
| सा तानुवाच तन्वङ्गी वचनं वोऽस्तु सत्फलम्।<br>दासोऽयं भवतां विप्राः किं चित्रं सदुपासनात्॥ २२<br><br>न सैन्यं सचिवाः कोशो न सहायश्च कश्चन।<br>केन योगेन पुत्रो मे राज्यं प्राप्तुमिहार्हति॥ २३<br><br>आशीर्वादाेश्च वो नूनं पुत्रोऽयं मे महीपतिः।<br>भविष्यति न सन्देहो भवन्तो मन्त्रवित्तमाः॥ २४ | तब उस कोमलांगी मनोरमाने उनसे कहा—आपलोगोंका वचन सफल हो। हे विप्रगण! यह सुदर्शन आपलोगोंका सेवक है। सच्ची उपासनासे सब कुछ सम्भव हो जाता है, इसमें आश्चर्य ही क्या? [किंतु] उसके पास न सेना है, न मन्त्री हैं, न कोश है और न कोई सहायक ही है। [ऐसी दशामें] किस उपायसे मेरा पुत्र राज्य पानेके योग्य बन सकता है? आपलोग मन्त्रके पूर्णवेत्ता हैं, अतः आपलोगोंके आशीर्वचनोंसे मेरा यह पुत्र निश्चय ही राजा होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ २२-२४॥ |
| ३३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| रथारूढः स मेधावी यत्र याति सुदर्शनः।<br>अक्षौहिणीसमावृत्त इवाभाति स तेजसा॥ २५<br><br>प्रतापो मन्त्रबीजस्य नान्यः कश्चन भूपते।<br>एवं वै जपतस्तस्य प्रीतियुक्तस्य सर्वथा॥ २६ | रथपर सवार होकर मेधावी सुदर्शन जहाँ भी जाता था, वहाँ वह अपने तेजसे एक अक्षौहिणी सेनासे आवृत प्रतीत होता था। हे भूप! यह उस बीजमन्त्रका ही प्रभाव था, दूसरा कोई कारण नहीं; क्योंकि वह सुदर्शन सर्वदा प्रसन्नतापूर्वक उसी मन्त्रका जप किया करता था॥ २५-२६॥ |
| सम्प्राप्य सद्गुरोर्बीजं कामराजाख्यमद्भुतम्।<br>जपेद्यस्तु शुचिः शान्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ २७ | जो मनुष्य किसी सद्गुरुसे कामराज नामक अद्भुत बीजमन्त्र ग्रहण करके शान्त होकर पवित्रतापूर्वक उसका जप करता है, वह अपनी सभी कामनाएँ पूर्ण कर लेता है॥ २७॥ |
| न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि वापि सुदुर्लभम्।<br>प्रसन्नायाः शिवायाश्च यदप्राप्यं नृपोत्तम॥ २८ | हे नृपश्रेष्ठ! भूतलपर अथवा स्वर्गमें भी कोई ऐसा अत्यन्त दुर्लभ पदार्थ नहीं है, जो कल्याणकारिणी भगवतीके प्रसन्न होनेपर न मिल सके॥ २८॥ |
| ते मन्दास्तेऽतिदुर्भाग्या रोगैस्ते समभिद्रुताः।<br>येषां चित्ते न विश्वासो भवेदम्बार्थनादिषु॥ २९ | वे महान् मूर्ख, भाग्यहीन तथा रोगोंसे व्यथित होते हैं, जिनके मनमें जगदम्बाके अर्चन आदिमें विश्वास नहीं होता॥ २९॥ |
| या माता सर्वदेवानां युगादौ परिकीर्तिता।<br>आदिमातेति विख्याता नाम्ना तेन कुरूद्वह॥ ३०<br><br>बुद्धिः कीर्तिर्धृतिर्लक्ष्मीः शक्तिः श्रद्धा मतिः स्मृतिः।<br>सर्वेषां प्राणिनां सा वै प्रत्यक्षं वै विभासते॥ ३१ | हे कुरुनन्दन! जो भगवती युगके आदिमें सब देवताओंकी माता कही गयी थीं, इसी कारण आदिमाता—इस नामसे विख्यात हैं; वे ही बुद्धि, कीर्ति, धृति, लक्ष्मी, शक्ति, श्रद्धा, मति और स्मृति आदि रूपोंसे समस्त प्राणियोंमें प्रत्यक्ष दिखायी देती हैं॥ ३०-३१॥ |
| न जानन्ति नरा ये वै मोहिता मायया किल।<br>न भजन्ति कुतर्कज्ञा देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम्॥ ३२ | जो लोग मायासे मोहित हैं, वे उन्हें नहीं जान पाते। कुतर्क करनेवाले मनुष्य उन भुवनेश्वरी भगवती शिवाका भजन नहीं करते॥ ३२॥ |
| ब्रह्मा विष्णुस्तथा शम्भुर्वासवो वरुणो यमः।<br>वायुरग्निः कुबेरश्च त्वष्टा पूषाश्विनौ भगः॥ ३३<br><br>आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः।<br>सर्वे ध्यायन्ति तां देवीं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम्॥ ३४ | ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, वरुण, यम, वायु, अग्नि, कुबेर, त्वष्टा, पूषा, दोनों अश्विनीकुमार, भग, आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव एवं मरुद्गण—ये सभी देवता सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाली उन भगवतीका ध्यान करते हैं॥ ३३-३४॥ |
| को न सेवेत विद्वान्वै तां शक्तिं परमात्मिकाम्।<br>सुदर्शनेन सा ज्ञाता देवी सर्वार्थदा शिवा॥ ३५ | कौन ऐसा विद्वान् है, जो उन परमात्मिका शक्तिकी आराधना न करता हो? सुदर्शनने सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन्हीं कल्याणकारिणी भगवतीको जान लिया था॥ ३५॥ |
| ब्रह्मैव सातिदुष्प्राप्या विद्याविद्यास्वरूपिणी।<br>योगगम्या परा शक्तिर्मुमुक्षूणां च वल्लभा॥ ३६ | वे विद्या तथा अविद्यास्वरूपा भगवती ही ब्रह्म हैं और अत्यन्त दुष्प्राप्य हैं। वे पराशक्ति योगद्वारा ही अनुभवगम्य हैं और मोक्ष चाहनेवाले लोगोंको विशेष प्रिय हैं॥ ३६॥ |
| अ० १८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३३७ | | :--- | :--- |
| परमात्मस्वरूपं को वेत्तुमर्हति तां विना।<br>या सृष्टिं त्रिविधां कृत्वा दर्शयत्यखिलात्मने ॥ ३७<br><br>सुदर्शनस्तु तां देवीं मनसा परिचिन्तयन्।<br>राज्यलाभात्परं प्राप्य सुखं वै कानने स्थितः ॥ ३८ | उन भगवतीके बिना परमात्माका स्वरूप जाननेमें कौन समर्थ है? जो तीन प्रकारकी सृष्टि करके सर्वात्मा भगवान्को दिखलाती हैं, उन्हीं भगवतीका मनसे सम्यक् चिन्तन करता हुआ राजकुमार सुदर्शन राज्य-प्राप्तिसे भी अधिक सुखका अनुभव करके वनमें रहता था ॥ ३७-३८ ॥ | | सापि चन्द्रकलात्यर्थं कामबाणप्रपीडिता।<br>नानोपचारैरनिशं दधार दुःखितं वपुः ॥ ३९ | उधर, वह शशिकला भी कामसे निरन्तर अत्यधिक पीड़ित रहती हुई नानाविध उपचारोंसे किसी प्रकार अपना दुःखित शरीर धारण किये हुए थी ॥ ३९ ॥ | | तावत्तस्याः पिता ज्ञात्वा कन्यां पुत्रवरार्थिनीम्।<br>सुबाहुः कारयामास स्वयंवरमतन्द्रितः ॥ ४० | इसी बीच उसके पिता सुबाहुने कन्या शशिकलाको वरकी अभिलाषिणी जानकर बड़ी सावधानीके साथ स्वयंवर आयोजित कराया ॥ ४० ॥ | | स्वयंवरस्तु त्रिविधो विद्वद्भिः परिकीर्तितः।<br>राज्ञां विवाहयोग्यो वै नान्येषां कथितः किल ॥ ४१<br><br>इच्छास्वयंवरश्चैको द्वितीयश्च पणाभिधः।<br>यथा रामेण भग्नं वै त्र्यम्बकस्य शरासनम् ॥ ४२<br><br>तृतीयः शौर्यशुल्कश्च शूराणां परिकीर्तितः।<br>इच्छास्वयंवरं तत्र चकार नृपसत्तमः ॥ ४३ | विद्वानोंने स्वयंवरके तीन प्रकार बताये हैं। वह क्षत्रिय राजाओंके विवाहहेतु उचित कहा गया है, अन्यके लिये नहीं। उनमें प्रथम इच्छास्वयंवर है, जिसमें कन्या अपने इच्छानुसार पति स्वीकार करती है। दूसरा पणस्वयंवर है, जिसमें किसी प्रकारका पण (शर्त) रखा जाता है। जैसे भगवान् श्रीरामने [जानकीके स्वयंवरमें] शिवधनुष तोड़ा था। तीसरा स्वयंवर शौर्यशुल्क है, जो शूरवीरोंके लिये कहा गया है। नृपश्रेष्ठ सुबाहुने उनमें इच्छास्वयंवरका आयोजन किया ॥ ४१—४३ ॥ | | शिल्पिभिः कारिता मञ्चाः शुभैरास्तरणैर्युताः।<br>ततश्च विविधाकाराः सुक्लृप्ताः सभ्यमण्डपाः ॥ ४४ | शिल्पियोंद्वारा बहुत-से मंच बनवाये गये और उनपर सुन्दर आसन बिछाये गये। तत्पश्चात् राजाओंके बैठनेयोग्य विविध आकार-प्रकारके सभामण्डप बनवाये गये ॥ ४४ ॥ | | एवं कृतेऽतिसम्भारे विवाहार्थं सुविस्तरे।<br>सखीं शशिकला प्राह दुःखिता चारुलोचना ॥ ४५<br><br>इदं मे मातरं ब्रूहि त्वमेकान्ते वचो मम।<br>मया वृतः पतिश्चित्ते ध्रुवसंधिसुतः शुभः ॥ ४६<br><br>नान्यं वरं वरिष्यामि तमृते वै सुदर्शनम्।<br>स मे भर्ता नृपसुतो भगवत्या प्रतिष्ठितः ॥ ४७ | इस प्रकार विवाहके लिये सम्पूर्ण सामग्री जुट जानेपर सुन्दर नेत्रोंवाली शशिकलाने दुःखित होकर अपनी सखीसे कहा—एकान्तमें जाकर तुम मेरी मातासे मेरा यह वचन कह दो कि मैंने अपने मनमें ध्रुवसन्धिके सुन्दर पुत्रका पतिरूपमें वरण कर लिया है। उन सुदर्शनके अतिरिक्त मैं किसी दूसरेको पति नहीं बनाऊँगी; क्योंकि स्वयं भगवतीने राजकुमार सुदर्शनको मेरा पति निश्चित कर दिया है ॥ ४५—४७ ॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा सखी गत्वा मातरं प्राह सत्वरा।<br>वैदर्भी विजने वाक्यं मधुरं मञ्जुभाषिणी ॥ ४८ | व्यासजी बोले—उसके ऐसा कहनेपर उस मृदुभाषिणी सखीने शशिकलाकी माता विदर्भसुताके पास शीघ्र जाकर एकान्तमें उनसे मधुर वाणीमें कहा— |
| ३३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ ] |
|---|
| पुत्री ते दुःखिता प्राह साध्वि त्वां मन्मुखेन यत्।<br>शृणु त्वं कुरु कल्याणि तद्धितं त्वरिताधुना॥ ४९<br><br>भारद्वाजाश्रमे पुण्ये ध्रुवसन्धिंसुतोऽस्ति यः।<br>स मे भर्त्ता वृतश्चित्ते नान्यं भूपं वृणोम्यहम्॥ ५० | ‘हे साध्वि! आपकी पुत्रीने अत्यन्त दुःखित होकर मेरे मुखसे आपको जो कहलाया है, उसे आप सुन लें और हे कल्याणि! इस समय शीघ्र ही उसका हित-साधन करें’। [उसका कथन है कि] भारद्वाजमुनिके आश्रममें जो ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शन रहते हैं, उनका मैं अपने मनमें पतिरूपमें वरण कर चुकी हूँ। अतः मैं किसी दूसरे राजाका वरण नहीं करूँगी॥ ४८-५०॥ | | व्यास उवाच<br>राज्ञी तद्वचनं श्रुत्वा स्वपतौ गृहमागते।<br>निवेदयामास तदा पुत्रीवाक्यं यथातथम्॥ ५१ | व्यासजी बोले—वह वचन सुनकर रानीने राजाके आनेपर पुत्रीकी सारी बातें ज्यों-की-त्यों उनको बतायीं॥ ५१॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं राजा विस्मितः प्रहसन्मुहुः।<br>भार्यामुवाच वैदर्भीं सुबाहुस्तु ऋतं वचः॥ ५२ | उसे सुनकर राजा सुबाहु आश्चर्यमें पड़ गये और बार-बार मुसकराते हुए वे अपनी भार्या विदर्भराजकुमारीसे यथार्थ बात कहने लगे—॥ ५२॥ | | सुभ्रु जानासि बालोऽसौ राज्यान्निष्कासितो वने।<br>एकाकी सह मात्रा वै वसते निर्जने वने॥ ५३ | हे सुभ्रु! तुम तो यह जानती ही हो कि वह बालक राज्यसे निकाल दिया गया है और निर्जन वनमें अकेले ही अपनी माताके साथ रहता है। उसीके लिये राजा वीरसेन युधाजित्के द्वारा मार डाले गये। | | तत्कृते निहतो राजा वीरसेनो युधाजिता।<br>स कथं निर्धनो भर्त्ता योग्यः स्याच्चारुलोचने॥ ५४ | हे सुनयने! वह निर्धन योग्य पति कैसे हो सकता है?॥ ५३-५४॥ | | ब्रूहि पुत्रीं ततो वाक्यं कदाचिदपि विप्रियम्।<br>आगमिष्यन्ति राजानः स्थितिमन्तः स्वयंवरे॥ ५५ | तुम यह बात पुत्री शशिकलासे कह दो कि बड़े-से-बड़े प्रतिष्ठित राजा इस स्वयंवरमें आनेवाले हैं। अतः उनके प्रति ऐसी अप्रिय बात वह कभी भी न बोले॥ ५५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे शशिकलया मातरं प्रति संदेशप्रेषणं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
### अथैकोनविंशोऽध्यायः
#### माताका शशिकलाको समझाना, शशिकलाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना, सुदर्शन तथा अन्य राजाओंका स्वयंवरमें आगमन, युधाजित्द्वारा सुदर्शनको मार डालनेकी बात कहनेपर केरलनरेशका उन्हें समझाना
| व्यास उवाच<br>भर्त्रा साभिहिता बालां पुत्रीं कृत्वाङ्कसंस्थिताम्।<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णं समाश्वास्य शुचिस्मिताम्॥ १<br><br>किं वृथा सुदति त्वं हि विप्रियं मम भाषसे।<br>पिता ते दुःखमाप्नोति वाक्येनानेन सुव्रते॥ २ | व्यासजी बोले—पतिके ऐसा कहनेपर रानीने सुन्दर मुसकानवाली उस कन्याको अपनी गोदमें बैठाकर उसे आश्वासन दे करके यह मधुर वचन कहा—हे सुदति! तुम मुझसे ऐसी अप्रिय एवं निष्प्रयोजन बात क्यों कह रही हो? हे सुव्रते! इस कथनसे तुम्हारे पिता बहुत दुःखित हो रहे हैं॥ १-२॥ |
अ० १९] तृतीय स्कन्ध ३३९
अ० १९] तृतीय स्कन्ध ३३९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सुदर्शनोऽतिदुर्भाग्यो राज्यभ्रष्टो निराश्रयः।<br>बलकोषविहीनश्च परित्यक्तस्तु बान्धवैः॥ ३<br><br>मात्रा सह वनं प्राप्तः फलमूलाशनः कृशः।<br>न ते योग्यो वरोऽयं वै वनवासी च दुर्भगः॥ ४ | वह सुदर्शन बड़ा ही अभागा, राज्यच्युत, आश्रयहीन और सेना तथा कोशसे विहीन है; बन्धु-बान्धवोंने उसका परित्याग कर दिया है। वह अपनी माताके साथ वनमें रहकर फल-मूल खाता है और अत्यन्त दुर्बल है। इसलिये वह मन्दभाग्य एवं वनवासी बालक सर्वथा तुम्हारे योग्य वर नहीं है॥ ३-४॥ |
| राजपुत्राः कृतप्रज्ञा रूपवन्तः सुसम्मताः।<br>त्वदर्हाः पुत्रि सन्त्यन्ये राजचिह्नैरलङ्कृताः॥ ५<br><br>भ्रातास्य वर्तते कान्तः स राज्यं कोसलेषु वै।<br>करोति रूपसम्पन्नः सर्वलक्षणसंयुतः॥ ६ | हे पुत्रि! तुम्हारे योग्य अनेक राजकुमार यहाँ उपस्थित हैं; जो बुद्धिमान्, रूपवान्, सम्माननीय और राजचिह्नोंसे अलंकृत हैं। इसी सुदर्शनका एक कान्तिमान्, रूपसम्पन्न तथा सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त भाई भी है, जो इस समय कोसलदेशमें राज्य करता है॥ ५-६॥ |
| अन्यच्च कारणं सुभ्रु शृणु यच्च मया श्रुतम्।<br>युधाजित्सततं तस्य वधकामोऽस्ति भूमिपः॥ ७ | हे सुभ्रु! इसके अतिरिक्त मैंने एक और जो बात सुनी है, तुम उसे सुनो—राजा युधाजित् उस सुदर्शनका वध करनेके लिये सतत प्रयत्नशील रहता है॥ ७॥ |
| दौहित्रः स्थापितस्तेन राज्ये कृत्वातिसङ्गरम्।<br>वीरसेनं नृपं हत्वा सम्मन्त्र्य सचिवैः सह॥ ८<br><br>भारद्वाजाश्रमं प्राप्तं हन्तुकामः सुदर्शनम्।<br>मुनिना वारितः पश्चाज्जगाम निजमन्दिरम्॥ ९ | उसने घोर संग्राम करके [इसके नाना] राजा वीरसेनको मारकर पुनः मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा करके अपने दौहित्र शत्रुजित्को राज्यपर अभिषिक्त कर दिया है। इसके बाद भारद्वाजमुनिके आश्रममें शरणलिये उस सुदर्शनको मारनेकी इच्छासे वह वहाँ भी पहुँचा, किंतु मुनिके मना करनेपर अपने घर लौट गया॥ ८-९॥ |
| शशिकलोवाच<br>मातर्ममेप्सितः कामं वनस्थोऽपि नृपात्मजः।<br>शर्यातिवचनेनैव सुकन्या च पतिव्रता॥ १०<br><br>च्यवनञ्च यथा प्राप्य पतिशुश्रूषणे रता।<br>पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां स्वर्गदं मोक्षदं तथा॥ ११<br><br>अकैतवकृतं नूनं सुखदं भवति स्त्रियाः। | शशिकला बोली— हे माता! मुझे तो वह वनवासी राजकुमार ही अत्यन्त अभीष्ट है। [पूर्वकालमें] शर्यातिकी आज्ञासे ही उनकी पतिव्रता पुत्री सुकन्या च्यवनमुनिके पास जाकर उनकी सेवामें तत्पर हो गयी थी। उसी प्रकार मैं पतिसेवा करूँगी; पतिकी सेवा-शुश्रूषा स्त्रियोंके लिये स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली होती है। अपने पतिके लिये कपटरहित व्यवहार स्त्रियोंके लिये निश्चित रूपसे सुखदायक होता है॥ १०-११ १/२॥ |
| भगवत्या समादिष्टं स्वप्ने वरमनुत्तमम्॥ १२<br><br>तमृतेऽहं कथं चान्यं संश्रयामि नृपात्मजम्।<br>मच्चित्तभित्तौ लिखितो भगवत्या सुदर्शनः॥ १३<br><br>तं विहाय प्रियं कान्तं करिष्येऽहं न चापरम्। | स्वयं भगवती उस सर्वश्रेष्ठ वरका वरण करनेके लिये मुझे स्वप्नमें आज्ञा दे चुकी हैं। अतः उनको छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारका वरण कैसे करूँ? स्वयं भगवतीने मेरे चित्तकी भित्तिपर सुदर्शनको ही अंकित कर दिया है। अतः उस प्रिय सुदर्शनको छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारको पति नहीं बनाऊँगी॥ १२-१३ १/२॥ |