भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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३१६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १५

| एवं विवदमानौ तौ संस्थितौ नृपती तदा।<br>प्रजाश्च ऋषयश्चैव बभूवुर्व्यग्रमानसाः॥ ४९ | तदनन्तर उन दोनोंको इस प्रकार परस्पर विवाद करते देखकर प्रजाजनों तथा ऋषियोंके मनमें व्यग्रता होने लगी॥ ४९॥ | | समाजग्मुश्च सामन्ताः ससैन्याः क्लेशतत्पराः।<br>विग्रहं चाभिकाङ्क्षन्तः परस्परमतन्द्रिताः॥ ५० | तब एक-दूसरेको क्लेश पहुँचानेके लिये उद्यत तथा युद्धकी इच्छावाले दोनों पक्षोंके सामन्त सावधान होकर अपनी-अपनी सेनाओंके साथ वहाँ आ पहुँचे॥ ५०॥ | | निषादा ह्याययुस्तत्र शृङ्गवेरपुराश्रयाः।<br>राज्यद्रव्यमपाहर्तुं मृतं श्रुत्वा महीपतिम्॥ ५१<br><br>पुत्रौ च बालकौ श्रुत्वा विग्रहं च परस्परम्।<br>चौरास्तत्र समाजग्मुर्देशदेशान्तरादपि॥ ५२ | उसी समय महाराज ध्रुवसन्धिकी मृत्युका समाचार सुनकर शृंगवेरपुरमें रहनेवाले निषादगण राजकोष लूटनेके लिये वहाँ आ गये। दोनों राजकुमार अभी बालक हैं तथा वे आपसमें कलह कर रहे हैं—यह सुनकर देश-देशान्तरके चोर-लुटेरे भी वहाँ आ गये॥ ५१-५२॥ | | सम्मर्दस्तत्र सञ्जातः कलहे समुपस्थिते।<br>युधाजिद्वीरसेनश्च युद्धकामौ बभूवतुः॥ ५३ | इस प्रकार वहाँपर भारी कलह उपस्थित हो जानेपर युद्ध आरम्भ हो गया। युधाजित् तथा वीरसेन भी युद्धके लिये उद्यत हो गये॥ ५३॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे युधाजिद्वीरसेनयोर्युद्धार्थं सजीभवनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥


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अथ पञ्चदशोऽध्यायः

राजा युधाजित् और वीरसेनका युद्ध, वीरसेनकी मृत्यु, राजा ध्रुवसन्धिकी रानी मनोरमाका अपने पुत्र सुदर्शनको लेकर भारद्वाजमुनिके आश्रममें जाना तथा वहीं निवास करना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
संयुगे च सति तत्र भूपयोराहवाय समुपात्तशस्त्रयोः।<br>क्रोधलोभवशयोः समं ततः सम्बभूव तुमुलस्तु विमर्दः॥ १[हे राजन्!] युद्ध आरम्भ हो जानेपर क्रोध एवं लोभके वशीभूत उन दोनों राजाओंने लड़नेके लिये शस्त्र उठा लिये और तब उनके बीच भयानक संग्राम आरम्भ हो गया॥ १॥
संस्थितः स समरे धृतचापः पार्थिवः पृथुलबाहुयुधाजित्।<br>संयुतः स्वबलवाहनादिकैराहवाय कृतनिश्चयो नृपः॥ २युद्धके लिये कृतसंकल्प वे विशालबाहु राजा युधाजित् धनुष धारण करके अपनी सेना तथा वाहन आदिके साथ रणभूमिमें डट गये॥ २॥
वीरसेन इह सैन्यसंयुतः क्षात्रधर्ममनुसृत्य सङ्गरे।<br>पुत्रिकामजहिताय पार्थिवः संस्थितः सुरपतेः समतेजाः॥ ३इधर इन्द्रके समान तेजस्वी राजा वीरसेन भी क्षत्रियोचित धर्मका अनुसरण करते हुए अपने दौहित्रके हित-साधनहेतु विशाल सेनाके साथ रणक्षेत्रमें उपस्थित हो गये॥ ३॥
स बाणवृष्टिं विससर्ज पार्थिवो<br>युधाजितं वीक्ष्य रणे स्थितञ्च।<br>गिरिं तडित्वानिव तोयवृष्टिभिः<br>क्रोधान्वितः सत्यपराक्रमोऽसौ॥ ४सत्यपराक्रमी राजा वीरसेनने युधाजित्‌को समरांगणमें उपस्थित देखकर क्रोधयुक्त होकर इस प्रकार बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी, मानो पर्वतपर मेघ जल बरसा रहा हो॥ ४॥