देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 326, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 326
| अ० १५ ] | तृतीय स्कन्ध | ३१७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तं वीरसेनो विशिखैः शिलाशितैः<br> समावृणोदाशुगमैरजिह्मगैः ।<br>चिच्छेद बाणैश्च शिलीमुखानसौ<br> तेनैव मुक्तानतिवेगपातिनः ॥ ५ | राजा वीरसेनने पत्थरपर घिसकर तीक्ष्ण बनाये गये, द्रुतगामी तथा सीधे प्रवेश करनेवाले बाणोंसे युधाजित्को आच्छादित कर दिया और युधाजित्के द्वारा छोड़े गये अत्यन्त तीव्रगामी बाणोंको उन्होंने अपने बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े कर दिया ॥ ५ ॥ |
| गजरथतुरगाणां सम्बभूवातियुद्धं<br> सुरनरमुनिसङ्घैर्वीक्षितं चातिघोरम् ।<br>विततविहगवृन्दैरावृतं व्योम सद्यः<br> पिशितमशितुकामैः काकगृध्रादिभिश्च ॥ ६ | इस प्रकार हाथियों, रथों तथा घोड़ोंसे अतिभयंकर युद्ध होने लगा जिसे देवता, मनुष्य तथा मुनिगण देख रहे थे। मांसभक्षणकी लालसावाले कौए, गीध आदि पक्षियोंके विस्तृत समूहसे शीघ्र ही वहाँका आकाशमण्डल ढक गया ॥ ६ ॥ |
| तत्राद्भुता क्षतजसिन्धुरुवाह घोरा<br> वृन्देभ्य एव गजवीरतुरङ्गमाणाम् ।<br>त्रासावहा नयनमार्गगता नराणां<br> पापात्मनां रविजमार्गभवेव कामम् ॥ ७ | उस युद्धभूमिमें हाथियों, घोड़ों तथा सैन्यसमूहोंके शरीरसे निकले रक्तसे अद्भुत तथा भयंकर नदी बह चली, जो लोगोंको उसी प्रकार दिखायी पड़ रही थी, जैसे यमलोकके मार्गमें प्रवाहित वैतरणी पापियोंको भयावह दीखती है॥ ७॥ |
| कीर्णानि भिन्नपुलिने नरमस्तकानि<br> केशावृतानि च विभान्ति यथैव सिन्धौ ।<br>तुम्बीफलानि विहितानि विहर्तुकामै-<br> र्बालैर्यथा रविसुताप्रभवैश्च नूनम् ॥ ८ | [तीव्र धारके वेगसे] कटे हुए तटवाली उस नदीमें मनुष्योंके केशयुक्त इधर-उधर बिखरे मस्तक, खेलनेमें तत्पर बालकोंद्वारा यमुनामें फेंके गये तुम्बीफलोंके समान प्रतीत हो रहे थे ॥ ८ ॥ |
| वीरं मृतं भुवि गतं पतितं रथाद्वै<br> गृध्रः पलार्थमुपरि भ्रमतीति मन्ये ।<br>जीवोऽप्यसौ निजशरीरमवेक्ष्य कान्तं<br> काङ्क्षत्यहोऽतिविवशोऽपि पुनः प्रवेष्टुम् ॥ ९ | रथसे गिरे हुए किसी मृत वीरको पृथ्वीपर पड़ा हुआ देखकर मांसकी इच्छासे गीध उसके ऊपर मँडराने लगता था, इससे ऐसा प्रतीत होता था मानो उस वीरका जीव अपने शरीरको अति सुन्दर देखकर अत्यन्त विवश हो उसमें पुनः प्रवेश करनेकी इच्छा कर रहा हो ॥ ९ ॥ |
| आजौ हतोऽपि नृवरः सुविमानरूढः<br> स्वाङ्के स्थितां सुरवधूं प्रवदत्यभीष्टम् ।<br>पश्याधुना मम शरीरमिदं पृथिव्यां<br> बाणाहतं निपतितं करभोरु कान्तम् ॥ १० | युद्धभूमिमें हत कोई वीर योद्धा सुन्दर विमानमें आरूढ़ होकर अपनी गोदमें बैठी हुई किसी देवांगनासे अपना मनोभाव इस प्रकार व्यक्त करता था—हे करभोरु! इस समय बाणोंसे आहत होकर धरतीपर पड़े हुए मेरे इस कान्तियुक्त शरीरको देखो ॥ १० ॥ |
| एको हतस्तु रिपुणैव गतोऽन्तरिक्षं<br> देवाङ्गनां समधिगम्य युतो विमाने ।<br>तावत्प्रिया हुतवहे सुसमर्प्य देहं<br> जग्राह कान्तमबला सबला स्वकीया ॥ ११ | शत्रुके द्वारा मारा गया एक वीर ज्यों ही अन्तरिक्षमें पहुँचा और अप्सराके पास जाकर विमानमें बैठा, त्यों ही उसकी अपनी प्रिय स्त्री अपना शरीर अग्निको भलीभाँति समर्पित करके पुनः दिव्य शरीर पाकर अपने पतिके पास जा पहुँची ॥ ११ ॥ |