भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 889 में से

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पृष्ठ 327
३१८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
युद्धे मृतौ च सुभटौ दिवि सङ्गतौ ता-<br>वन्योन्यशस्त्रनिहतौ सह सम्प्रयातौ।<br>तत्रैव जघ्नतुरलं परमाहितास्त्रा-<br>वेकाप्सरोऽर्थविहतौ कलहाकुलौ च॥ १२उस युद्धमें दो वीर परस्पर एक-दूसरेके शस्त्र-प्रहारसे आहत होकर मर गये और साथ-साथ ही स्वर्गलोकमें पहुँचे। वहाँपर भी एक अप्सराको प्राप्त करनेके लिये वे दोनों वीर शस्त्रयुक्त होकर एक-दूसरेको मारनेहेतु युद्ध करने लगे॥ १२॥
कश्चिद्युवा समधिगम्य सुराङ्गनां वै<br>रूपाधिकां गुणवतीं किल भक्तियुक्तः।<br>स्वीयान् गुणान्प्रवितानान्प्रवदंस्तदासौ<br>तां प्रेमदामनुचकार च योगयुक्तः॥ १३कोई अनुरागमय युवा वीर अतिशय रूपवती तथा गुणवती अप्सराको प्राप्त करके अत्यन्त बढ़ा-चढ़ाकर अपने गुणोंका वर्णन करते हुए उसके प्रति भक्तिपरायण होकर प्रयत्नपूर्वक उस प्रेमदायिनीके गुण आदिका अनुकरण करने लगा॥ १३॥
भौमं रजोऽतिविततं दिवि संस्थितञ्च<br>रात्रिं चकार तरणिञ्च समावृणोद्यत्।<br>मग्नं तदेव रुधिराम्बुनिधावकस्मात्<br>प्रादुर्बभूव रविरप्यतिकान्तियुक्तः॥ १४घोर युद्धके कारण रणभूमिसे उड़ी हुई अत्यधिक धूलने अन्तरिक्षस्थित सूर्यको ढक दिया और दिनमें ही रात हो गयी। पुनः वही धूल जब अथाह रक्त-सिन्धुमें विलीन हो जाती तब अत्यन्त प्रभाववाले सूर्य अचानक प्रकट हो जाते॥ १४॥
कश्चिद् गतस्तु गगनं किल देवकन्यां<br>सम्प्राप्य चारुवदनां किल भक्तियुक्ताम्।<br>नाङ्गीचकार चतुरो व्रतनाशभीतो<br>यास्यत्ययं मम वृथा ह्यनुकूलशब्दः॥ १५कोई युवक वीर युद्धमें मरकर स्वर्ग पहुँचा तो उसे एक सुन्दर रूपवाली देवकन्या मिली, जो उसके ऊपर आसक्त हो गयी। किंतु ब्रह्मचर्यव्रतके नाश होनेसे भयभीत उस चतुर वीरने उसे स्वीकार नहीं किया; [उसने सोचा कि ऐसा करनेसे] मेरे अनुरूप यह ब्रह्मचारी शब्द व्यर्थ हो जायगा॥ १५॥
सङ्ग्रामे संवृते तत्र युधाजित्पृथिवीपतिः।<br>जघान वीरसेनं तं बाणैस्तीव्रैः सुदारुणैः॥ १६तदनन्तर घोर संग्राम छिड़ जानेपर राजा युधाजित्ने अपने तीक्ष्ण तथा अत्यन्त भीषण बाणोंसे वीरसेनको मार डाला॥ १६॥
निहतः स पपातोर्व्यां छिन्नमूर्धा महीपतिः।<br>प्रभग्नं तद्बलं सर्वं निर्गतं च चतुर्दिशम्॥ १७इस प्रकार कटे मस्तकवाले महाराज वीरसेन पृथ्वीपर गिर पड़े। उनकी सम्पूर्ण सेना नष्ट हो गयी और चारों दिशाओंमें भाग गयी॥ १७॥
मनोरमा हतं श्रुत्वा पितरं रणमूर्धनि।<br>भयत्रस्ताथ सञ्जाता पितुर्वैरमनुस्मरन्॥ १८<br>हनिष्यति युधाजिद्वै पुत्रं मम दुराशयः।<br>राज्यलोभेन पापात्मा सेति चिन्तापराभवत्॥ १९अपने पिता वीरसेनको समरांगणमें मारा गया सुनकर तथा अपने पिताके वैरका स्मरण करते हुए मनोरमा भयसे व्याकुल हो गई। वह इस चिन्तामें पड़ गई कि बुरे विचारोंवाला वह पापी युधाजित् राज्यके लोभसे मेरे पुत्रको अवश्य ही मार डालेगा॥ १८-१९॥
किं करोमि क्व गच्छामि पिता मे निहतो रणे।<br>भर्ता चापि मृतोऽद्यैव पुत्रोऽयं मम बालकः॥ २०अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे पिताजी युद्धमें मारे गये तथा पतिदेव भी मर चुके हैं और मेरा यह पुत्र अभी बालक ही है॥ २०॥
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