देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ३०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सात्त्विकस्तु महाराज दुर्लभो वै मखः स्मृतः।<br>वैखानसमुनीनां हि विहितोऽसौ महामखः ॥ ३४ | हे महाराज! सात्त्विक यज्ञ तो अत्यन्त दुर्लभ माना गया है। वह महायज्ञ केवल वानप्रस्थ मुनियोंके लिये ही विहित है॥ ३४॥ |
| सात्त्विकं भोजनं ये वै नित्यं कुर्वन्ति तापसाः।<br>न्यायार्जितञ्च वन्यञ्च तथा ऋष्यं सुसंस्कृतम्॥ ३५<br><br>पुरोडाशपरा नित्यं वियूपा मन्त्रपूर्वकाः।<br>श्रद्धाधिका मखा राजन् सात्त्विकाः परमाः स्मृताः॥ ३६ | हे राजन्! तपमें तत्पर जो लोग नित्य न्यायपूर्वक अर्जित किये गये द्रव्य-पदार्थ, वन्य फल-मूल तथा ऋषियोंका सुसंस्कृत सात्त्विक आहार ग्रहण करते हैं—ऐसे तपस्वियोंद्वारा नित्य अतिश्रद्धाके साथ पुरोडाशसे सम्पादित किये जानेवाले समन्त्रक तथा यूपविहीन यज्ञ परम सात्त्विक यज्ञ कहे गये हैं॥ ३५-३६॥ |
| राजसा द्रव्यबहुलाः सयूपाश्च सुसंस्कृताः।<br>क्षत्रियाणां विशाञ्चैव साभिमानाश्च वै मखाः॥ ३७ | जिस यज्ञमें अधिक धन व्यय किया जाता है, जिसमें पशु-बलिके लिये सुन्दर यूप गाड़े जाते हैं तथा जो अभिमानके साथ किये जाते हैं—क्षत्रियों तथा वैश्योंद्वारा सम्पादित किये जानेवाले वे यज्ञ राजस यज्ञ कहे गये हैं॥ ३७॥ |
| तामसा दानवानां वै सक्रोधा मदवर्धकाः।<br>सामर्षाः संस्कृताः क्रूरा मखाः प्रोक्ता महात्मभिः॥ ३८ | महात्माओंने दानवोंद्वारा किये जानेवाले यज्ञोंको तामस यज्ञ कहा है। ऐसे यज्ञ क्रोधभावनाके साथ किये जाते हैं, अहंकारको बढ़ानेवाले होते हैं, ईर्ष्यापूर्वक किये जाते हैं और बड़ी साज-सज्जा तथा क्रूरताके साथ सम्पन्न किये जाते हैं॥ ३८॥ |
| मुनीनां मोक्षकामानां विरक्तानां महात्मनाम्।<br>मानसस्तु स्मृतो यागः सर्वसाधनसंयुतः॥ ३९ | मोक्षकी कामना करनेवाले विरक्त मुनि-महात्माओंके लिये सर्वसाधनसम्पन्न मानस-यज्ञ बताया गया है॥ ३९॥ |
| अन्येषु सर्वयज्ञेषु किञ्चिन्न्यूनं भवेदपि।<br>द्रव्येण श्रद्धया वापि क्रियया ब्राह्मणैस्तथा॥ ४०<br><br>देशकालपृथग्द्रव्यसाधनैः सकलैस्तथा।<br>नान्यो भवति पूर्णो वै तथा भवति मानसः॥ ४१ | अन्य सभी यज्ञोंमें कुछ कमी हो भी सकती है; क्योंकि वे द्रव्य, श्रद्धा, कर्म, ब्राह्मण, देश, काल तथा अन्य द्रव्यसाधनोंसे सम्पन्न किये जाते हैं। अतः अन्य यज्ञ वैसा पूर्ण नहीं होता, जैसा मानस-यज्ञ सदैव पूर्ण हो जाता है॥ ४०-४१॥ |
| प्रथमं तु मनः शोध्यं कर्तव्यं गुणवर्जितम्।<br>शुद्धे मनसि देहो वै शुद्ध एव न संशयः॥ ४२ | [इस यज्ञके लिये] सर्वप्रथम मनको परिशुद्ध तथा गुणसे रहित बनाना चाहिये। मनके शुद्ध हो जानेपर शरीरकी शुद्धि स्वतः हो जाती है, इसमें संशय नहीं है॥ ४२॥ |
| इन्द्रियार्थपरित्यक्तं यदा जातं मनः शुचि।<br>तदा तस्य मखस्यासौ प्रभवेदधिकारवान्॥ ४३ | जब मनुष्यका मन इन्द्रियोंके विषयोंका परित्याग करके पवित्र हो जाता है, तभी वह उस मानस-यज्ञको करनेका अधिकारी होता है ॥ ४३॥ |
| तदासौ मण्डपं कृत्वा बहुयोजनविस्तृतम्।<br>स्तम्भैश्च विपुलैः श्लक्ष्णैर्यज्ञियद्रुमसंभवैः॥ ४४ | तत्पश्चात् वह अपने मनमें पवित्र यज्ञीय वृक्षोंसे निर्मित, अनेक सुन्दर-सुन्दर स्तम्भोंसे अलंकृत तथा अनेक योजन विस्तारवाले यज्ञमण्डपकी रचना करके |