देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ३०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सात्त्विकस्तु महाराज दुर्लभो वै मखः स्मृतः।<br>वैखानसमुनीनां हि विहितोऽसौ महामखः ॥ ३४ | हे महाराज! सात्त्विक यज्ञ तो अत्यन्त दुर्लभ माना गया है। वह महायज्ञ केवल वानप्रस्थ मुनियोंके लिये ही विहित है॥ ३४॥ |
| सात्त्विकं भोजनं ये वै नित्यं कुर्वन्ति तापसाः।<br>न्यायार्जितञ्च वन्यञ्च तथा ऋष्यं सुसंस्कृतम्॥ ३५<br><br>पुरोडाशपरा नित्यं वियूपा मन्त्रपूर्वकाः।<br>श्रद्धाधिका मखा राजन् सात्त्विकाः परमाः स्मृताः॥ ३६ | हे राजन्! तपमें तत्पर जो लोग नित्य न्यायपूर्वक अर्जित किये गये द्रव्य-पदार्थ, वन्य फल-मूल तथा ऋषियोंका सुसंस्कृत सात्त्विक आहार ग्रहण करते हैं—ऐसे तपस्वियोंद्वारा नित्य अतिश्रद्धाके साथ पुरोडाशसे सम्पादित किये जानेवाले समन्त्रक तथा यूपविहीन यज्ञ परम सात्त्विक यज्ञ कहे गये हैं॥ ३५-३६॥ |
| राजसा द्रव्यबहुलाः सयूपाश्च सुसंस्कृताः।<br>क्षत्रियाणां विशाञ्चैव साभिमानाश्च वै मखाः॥ ३७ | जिस यज्ञमें अधिक धन व्यय किया जाता है, जिसमें पशु-बलिके लिये सुन्दर यूप गाड़े जाते हैं तथा जो अभिमानके साथ किये जाते हैं—क्षत्रियों तथा वैश्योंद्वारा सम्पादित किये जानेवाले वे यज्ञ राजस यज्ञ कहे गये हैं॥ ३७॥ |
| तामसा दानवानां वै सक्रोधा मदवर्धकाः।<br>सामर्षाः संस्कृताः क्रूरा मखाः प्रोक्ता महात्मभिः॥ ३८ | महात्माओंने दानवोंद्वारा किये जानेवाले यज्ञोंको तामस यज्ञ कहा है। ऐसे यज्ञ क्रोधभावनाके साथ किये जाते हैं, अहंकारको बढ़ानेवाले होते हैं, ईर्ष्यापूर्वक किये जाते हैं और बड़ी साज-सज्जा तथा क्रूरताके साथ सम्पन्न किये जाते हैं॥ ३८॥ |
| मुनीनां मोक्षकामानां विरक्तानां महात्मनाम्।<br>मानसस्तु स्मृतो यागः सर्वसाधनसंयुतः॥ ३९ | मोक्षकी कामना करनेवाले विरक्त मुनि-महात्माओंके लिये सर्वसाधनसम्पन्न मानस-यज्ञ बताया गया है॥ ३९॥ |
| अन्येषु सर्वयज्ञेषु किञ्चिन्न्यूनं भवेदपि।<br>द्रव्येण श्रद्धया वापि क्रियया ब्राह्मणैस्तथा॥ ४०<br><br>देशकालपृथग्द्रव्यसाधनैः सकलैस्तथा।<br>नान्यो भवति पूर्णो वै तथा भवति मानसः॥ ४१ | अन्य सभी यज्ञोंमें कुछ कमी हो भी सकती है; क्योंकि वे द्रव्य, श्रद्धा, कर्म, ब्राह्मण, देश, काल तथा अन्य द्रव्यसाधनोंसे सम्पन्न किये जाते हैं। अतः अन्य यज्ञ वैसा पूर्ण नहीं होता, जैसा मानस-यज्ञ सदैव पूर्ण हो जाता है॥ ४०-४१॥ |
| प्रथमं तु मनः शोध्यं कर्तव्यं गुणवर्जितम्।<br>शुद्धे मनसि देहो वै शुद्ध एव न संशयः॥ ४२ | [इस यज्ञके लिये] सर्वप्रथम मनको परिशुद्ध तथा गुणसे रहित बनाना चाहिये। मनके शुद्ध हो जानेपर शरीरकी शुद्धि स्वतः हो जाती है, इसमें संशय नहीं है॥ ४२॥ |
| इन्द्रियार्थपरित्यक्तं यदा जातं मनः शुचि।<br>तदा तस्य मखस्यासौ प्रभवेदधिकारवान्॥ ४३ | जब मनुष्यका मन इन्द्रियोंके विषयोंका परित्याग करके पवित्र हो जाता है, तभी वह उस मानस-यज्ञको करनेका अधिकारी होता है ॥ ४३॥ |
| तदासौ मण्डपं कृत्वा बहुयोजनविस्तृतम्।<br>स्तम्भैश्च विपुलैः श्लक्ष्णैर्यज्ञियद्रुमसंभवैः॥ ४४ | तत्पश्चात् वह अपने मनमें पवित्र यज्ञीय वृक्षोंसे निर्मित, अनेक सुन्दर-सुन्दर स्तम्भोंसे अलंकृत तथा अनेक योजन विस्तारवाले यज्ञमण्डपकी रचना करके |
अ० १२] तृतीय स्कन्ध ३०३
अ० १२] तृतीय स्कन्ध ३०३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वेदीं च विशदां तत्र मनसा परिकल्पयेत्।<br>अग्नयोऽपि तथा स्थाप्या विधिवन्मनसा किल॥ ४५ | उसमें मन-ही-मन एक विशाल यज्ञवेदीकी कल्पना करे और उसपर मानसिक अग्निकी विधिपूर्वक स्थापना करे॥ ४४-४५॥ |
| ब्राह्मणानाञ्च वरणं तथैव प्रतिपाद्य च।<br>ब्रह्माध्वर्युस्तथा होता प्रस्तोता विधिपूर्वकम्॥ ४६<br><br>उद्गाता प्रतिहर्ता च सभ्याश्चान्ये यथाविधि।<br>पूजनीया प्रयत्नेन मनसैव द्विजोत्तमाः॥ ४७ | उसी प्रकार [मनमें] ब्राह्मणोंका वरण करके ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता, प्रस्तोता, उद्गाता, प्रतिहर्ता तथा अन्य सभासदोंको नियुक्त करके यथोचित रूपसे प्रयत्नपूर्वक मनसे उनकी पूजा करनी चाहिये॥ ४६-४७॥ |
| प्राणोऽपानस्तथा व्यानः समानोदान एव च।<br>पावकाः पञ्च एवैते स्थाप्या वेद्यां विधानतः॥ ४८ | प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान—इन पाँचों अग्नियोंको यज्ञवेदीपर विधानपूर्वक स्थापित करना चाहिये॥ ४८॥ |
| गार्हपत्यस्तदा प्राणोऽपानश्चाहवनीयकः।<br>दक्षिणाग्निस्तथा व्यानः समानश्चावसथ्यकः॥ ४९<br><br>सभ्योदानः स्मृता होते पावकाः परमोत्कटाः।<br>द्रव्यं च मनसा भाव्यं निर्गुणं परमं शुचि॥ ५० | उनमें प्राणको गार्हपत्य अग्नि, अपानको आहवनीय अग्नि, व्यानको दक्षिणाग्नि, समानको आवसथ्य अग्नि तथा उदानको सभ्य अग्नि कहा गया है। ये पाँचों परम तेजस्वी हैं। इस यज्ञमें मानसिक रूपसे ही दोषरहित तथा परम पवित्र सामग्रियोंकी भी कल्पना करनी चाहिये॥ ४९-५०॥ |
| मन एव तदा होता यजमानस्तथैव तत्।<br>यज्ञाधिदेवता ब्रह्म निर्गुणं च सनातनम्॥ ५१ | इस यज्ञमें होता तथा यजमान दोनोंके रूपमें मन ही होता है। निर्गुण तथा अविनाशी ब्रह्म इस यज्ञमें अधिदेवता होते हैं॥ ५१॥ |
| फलदा निर्गुणा शक्तिः सदा निर्वेददा शिवा।<br>ब्रह्मविद्याखिलाधारा व्याप्य सर्वत्र संस्थिता॥ ५२ | निर्गुणा पराशक्ति सभी फलोंको प्रदान करनेवाली हैं। उन वैराग्यदायिनी, कल्याणकारिणी, ब्रह्मविद्या, समस्त जगत्की आधारस्वरूपा तथा जगत्को व्याप्त करके सर्वत्र विराजमान रहनेवाली आदिशक्ति-स्वरूपा भगवतीको प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे द्विजको मनःकल्पित हवन-सामग्रियोंकी आहुति अपने प्राणरूपी अग्निमें देनी चाहिये॥ ५२ १/२॥ |
| तदुद्देशेन तद् द्रव्यं हुनेत्प्राणाग्निषु द्विजः।<br>पश्चाच्चित्तं निरालम्बं कृत्वा प्राणानपि प्रभो॥ ५३ | हे प्रभो! मानस हवनके पश्चात् अपने मनको आलम्बनरहित करके कुण्डलिनीके मुखमार्गसे अर्थात् सुषुम्ना रन्ध्रद्वारा शाश्वत ब्रह्ममें अपने प्राणोंकी भी आहुति दे देनी चाहिये॥ ५३ १/२॥ |
| कुण्डलीमुखमार्गेण हुनेद् ब्रह्मणि शाश्वते।<br>स्वानुभूत्या स्वयं साक्षात्वात्मभूतां महेश्वरीम्॥ ५४ | अपनी अनुभूतिसे स्वयंका साक्षात्कार करके तथा महेश्वरीको अपनी आत्मस्वरूपा जानकर समाधियोगसे शान्तचित्त होकर ध्यान करना चाहिये॥ ५४ १/२॥ |
| समाधिनैव योगेन ध्यायेच्चेतस्यनाकुलः।<br>सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि॥ ५५ | इस प्रकार जब वह साधक सभी प्राणियोंमें अपने-आपको तथा अपनेमें सभी प्राणियोंको देखने लगता है, तब वह भूतात्मा उन कल्याणस्वरूपा |
| ३०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यदा पश्यति भूतात्मा तदा पश्यति तां शिवाम्।<br>दृष्ट्वा तां ब्रह्मविद्भूयात्सच्चिदानन्दरूपिणीम्॥ ५६<br><br>तदा मायादिकं सर्वं दग्धं भवति भूमिप।<br>प्रारब्धं कर्ममात्रं तु यावद्देहं च तिष्ठति॥ ५७ | भगवतीका दर्शन प्राप्त कर लेता है और उन सच्चिदानन्दस्वरूपिणीका दर्शन करके ब्रह्मज्ञानी हो जाता है। हे भूपाल! तब उसका सब मायाजनित प्रपंच जलकर भस्म हो जाता है और केवल प्रारब्धकर्मका भोग करनेके लिये ही शरीर रहता है॥ ५५–५७॥ |
| जीवन्मुक्तस्तदा जातो मृतो मोक्षमवाप्नुयात्।<br>कृतकृत्यो भवेत्तात यो भजेज्जगदम्बिकाम्॥ ५८<br><br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ध्येया श्रीभुवनेश्वरी।<br>श्रोतव्या चैव मन्तव्या गुरुवाक्यानुसारतः॥ ५९ | हे तात! तब वह जीवन्मुक्त हो जाता है और मृत्युके उपरान्त मोक्ष प्राप्त करता है। जो भगवतीको भजता है, वह सब प्रकारसे कृतकृत्य हो जाता है। इसलिये गुरुके वचनोंके अनुसार सम्पूर्ण प्रयत्नके साथ श्रीभुवनेश्वरी भगवतीका ध्यान, उनके चरित्रका श्रवण तथा मनन करना चाहिये॥ ५८–५९॥ |
| राजन्नेवं कृतो यज्ञो मोक्षदो नात्र संशयः।<br>अन्ये यज्ञाः सकामास्तु प्रभवन्ति क्षयोन्मुखाः॥ ६० | हे राजन्! इस प्रकार किया हुआ यज्ञ मोक्षप्रद होता है; इसमें सन्देह नहीं। इसके अतिरिक्त अन्य सकाम यज्ञ विनाशोन्मुख होते हैं॥ ६०॥ |
| अग्निष्टोमेन विधिवत्स्वर्गकामो यजेदिति।<br>वेदानुशासनं चैतत्प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ६१<br><br>क्षीणे पुण्ये मृत्युलोकं विशन्ति च यथामति।<br>तस्मात्तु मानसः श्रेष्ठो यज्ञोऽप्यक्षय एव सः॥ ६२ | मनीषी विद्वान् यह वेदानुशासन बताते हैं कि स्वर्गकी इच्छावालेको विधिपूर्वक अग्निष्टोम यज्ञ करना चाहिये। मेरी समझसे पुण्य क्षीण होनेपर पुनः उन्हें मृत्युलोकमें आना ही पड़ता है, अतः अक्षय फलवाला वह मानस-यज्ञ ही श्रेष्ठ है॥ ६१–६२॥ |
| न राज्ञा साधितुं योग्यो मखोऽसौ जयमिच्छता।<br>तामसस्तु कृतः पूर्वं सर्पयज्ञस्त्वयाधुना॥ ६३<br><br>वैरं निर्वार्हितं राजंस्तक्षकस्य दुरात्मनः।<br>यत्कृते निहताः सर्पास्त्वयाग्नौ कोटिशः परे॥ ६४ | विजयकी इच्छा रखनेवाला राजा इस मानस-यज्ञको सम्पन्न नहीं कर सकता। हे राजन्! अभी कुछ ही समय पूर्व आपने तामस सर्पयज्ञ किया था, जिसमें आपने दुरात्मा तक्षकसे वैरका बदला चुकाया था और उसमें आपने करोड़ों सर्पोंको अग्निमें जलाकर मार डाला था॥ ६३–६४॥ |
| देवीयज्ञं कुरुष्वाद्य विततं विधिपूर्वकम्।<br>विष्णुना यः कृतः पूर्वं सृष्ट्यादौ नृपसत्तम॥ ६५ | हे नृपश्रेष्ठ! अब आप विधिपूर्वक विस्तृत देवीयज्ञ कीजिये, जिसे पूर्वकालमें सृष्टिके आरम्भमें भगवान् विष्णुने किया था॥ ६५॥ |
| तथा त्वं कुरु राजेन्द्र विधिं ते प्रब्रवीम्यहम्।<br>ब्राह्मणाः सन्ति राजेन्द्र विधिज्ञा वेदवित्तमाः॥ ६६<br><br>देवीबीजविधानज्ञा मन्त्रमार्गविचक्षणाः।<br>याजकास्ते भविष्यन्ति यजमानस्त्वमेव हि॥ ६७ | हे राजेन्द्र! मैं आपको उसकी विधि बता रहा हूँ, आप वैसा कीजिये। हे राजेन्द्र! आपके यहाँ वेदोंके पूर्ण ज्ञाता, विधिको जाननेवाले, देवीके बीजमन्त्रके विधानके जानकार तथा मन्त्रमार्गके विद्वान् अनेक ब्राह्मण हैं, वे ही उस यज्ञमें आपके याजक होंगे और आप यजमान बनेंगे॥ ६६–६७॥ |
| कृत्वा यज्ञं विधानेन दत्त्वा पुण्यं मखार्जितम्।<br>समुद्धर महाराज पितरं दुर्गतिङ्गतम्॥ ६८ | हे महाराज! इस प्रकार आप विधिवत् देवीयज्ञ करके उस यज्ञसे मिले हुए पुण्यको अर्पित करके अपने दुर्गतिप्राप्त पिताका उद्धार कीजिये॥ ६८॥ |
| अ० १२ ] | तृतीय स्कन्ध | ३०५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विप्रामानजं पापं दुर्घटं नरकप्रदम्।<br>तथैव शापजो दोषः प्राप्तः पित्रा तवानघ॥ ६९<br><br>तथा दुर्मरणं प्राप्तं सर्पदंशेन भूभुजा।<br>अन्तराले तथा मृत्युर्न भूमौ कुशसंस्तरे॥ ७०<br><br>न सङ्ग्रामे न गङ्गायां स्नानदानादिवर्जितम्।<br>मरणं ते पितुस्तत्र सौधे जातं कुरुद्वह॥ ७१ | ब्राह्मणके अपमानसे होनेवाला पाप बड़ा भयंकर और नरकदायक होता है। हे अनघ! आपके पिता वैसे ही शापजनित दोषसे ग्रस्त हो चुके हैं; साथ ही साँपके काटनेसे महाराजकी अकालमृत्यु हुई है और भूमिपर बिछे कुशासनपर नहीं अपितु आकाशमें उनका मरण हुआ है, उनकी मृत्यु न रणस्थलमें हुई है और न गंगातटपर ही अपितु हे कुरुश्रेष्ठ! आपके पिता बिना स्नान-दान आदि किये ही महलमें मर गये॥ ६९–७१॥ |
| कृपणानि च सर्वाणि नरकस्य नृपोत्तम।<br>तत्रैकं कारणं तस्य न जातं चातिदुर्लभम्॥ ७२ | हे नृपश्रेष्ठ! ये सब कुत्सित साधन नरकके हेतु हैं। राजाके लिये नरकसे बचनेका एक उपाय था; किंतु वह अत्यन्त दुर्लभ उपाय भी उनसे न बन सका॥ ७२॥ |
| यत्र यत्र स्थितः प्राणी ज्ञात्वा कालं समागतम्।<br>साधनानामभावेऽपि ह्यवशश्चातिसङ्कटे॥ ७३<br><br>यदा निर्वेदमायाति मनसा निर्मलेन वै।<br>पञ्चभूतात्मको देहो मम किञ्चात्र दुःखदम्॥ ७४ | जहाँ कहीं भी प्राणी स्थित रहे, कालको समीप आया जानकर साधनोंके अभावमें भी अत्यन्त कष्टके कारण विवश हुआ वह जब हृदयमें वैराग्य-भाव आ जाय, तब निर्मल मनसे यह सोचने लगे कि यह शरीर तो पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु—इन पंचभूतोंसे निर्मित है, तब फिर यह मेरे लिये क्या दुःखदायी हो सकता है!॥ ७३-७४॥ |
| पतत्वद्य यथाकामं मुक्तोऽहं निर्गुणोऽव्ययः।<br>नाशात्मकानि तत्त्वानि तत्र का परिदेवना॥ ७५ | यह देह अभी नष्ट हो जाय; मैं तो मुक्त, निर्गुण तथा अविनाशी हूँ। ये पंचतत्त्व तो विनाशशील हैं, तब इनके लिये मुझे चिन्ता ही क्या! |
| ब्रह्मैवाहं न संसारी सदा मुक्तः सनातनः।<br>देहेन मम सम्बन्धः कर्मणा प्रतिपादितः॥ ७६ | मैं तो सदा मुक्त और सनातन ब्रह्म हूँ; संसारी जीव नहीं हूँ। इस देहसे मेरा सम्बन्ध केवल कर्मभोगके कारण ही है। |
| तानि सर्वाणि मुक्तानि शुभानि चेतराणि च।<br>मनुष्यदेहयोगेन सुखदुःखानुसाधनात्॥ ७७ | शरीरद्वारा किये गये उन सभी शुभाशुभ कर्मोंका मेरा बन्धन तो छूट चुका है; क्योंकि मनुष्यशरीरसे मैंने दुःख तथा सुख भोग लिया है |
| विमुक्तोऽतिभयाद् घोरादस्मात्संसारसङ्कटात्।<br>इत्येवं चिन्त्यमानस्तु स्नानदानविवर्जितः॥ ७८ | और इस अत्यन्त भयानक, घोर तथा भीषण सांसारिक कष्टसे मैं सर्वथा विमुक्त हूँ, इस प्रकारका चिन्तन करता हुआ पुरुष यदि स्नान-दानरहित भी मृत्यु प्राप्त करता है |
| मरणं चेदवाप्नोति स मुच्येज्जन्मदुःखतः।<br>एषा काष्ठा परा प्रोक्ता योगिनामपि दुर्लभा॥ ७९ | तो भी वह पुनः जन्म लेनेके दुःखसे छूट जाता है। यह सर्वोत्कृष्ट साधन कहा गया है, जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है॥ ७५–७९॥ |
| पिता ते नृपशार्दूल श्रुत्वा शापं द्विजोदितम्।<br>देहे ममत्वं कृतवान्न निर्वेदमवाप्तवान्॥ ८० | हे नृपसत्तम! आपके पिताने ब्राह्मणके द्वारा दिये गये उस शापको सुनकर भी अपने शरीरके प्रति मोह रखा और वैराग्यका आश्रय नहीं लिया॥ ८०॥ |
| ३०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| नीरोगो मम देहोऽयं राज्यं निहतकण्टकम्।<br>कथं जीवाम्यहं कामं मन्त्रज्ञानानयन्तु वै॥ ८१ | उनकी यह प्रबल इच्छा थी कि मेरा यह शरीर सदा निरोग रहे, मैं निष्कंटक राज्य करता रहूँ और चिरकालतक कैसे जीता रहूँ, [—इस भावनासे उन्होंने सचिवोंको आज्ञा दी कि सर्पविष उतारनेका] मन्त्र जाननेवालोंको बुलाओ॥ ८१॥ |
| औषधं मणिमन्त्रं च यन्त्रं परमकं तथा।<br>आरोहणं तथा सौधे कृतवान्नृपतिस्तदा॥ ८२ | राजाने औषध, मणि, मन्त्र तथा उत्तमोत्तम यन्त्रोंका संग्रह किया और वे एक ऊँचे महलपर आरूढ़ हो गये। उस समय उन्होंने न स्नान किया, न दान दिया और न भगवतीका स्मरण ही किया। दैवको प्रधान मानकर वे भूमिपर भी नहीं सोये॥ ८२-८३॥ |
| न स्नानं न कृतं दानं न देव्याः स्मरणं कृतम्।<br>न भूमौ शयनं चैव दैवं मत्वा परं तथा॥ ८३ | |
| मग्नो मोहार्णवे घोरे मृतः सौधेऽहिना हतः।<br>कृत्वा पापं कलेर्द्योगात्तापसस्यावमानजम्॥ ८४ | कलिके प्रभावके कारण एक तपस्वीके प्रति अपमानजन्य पाप करके घोर मोहरूपी सागरमें डूबकर महलके ऊपर सर्पके डँसनेसे वे मर गये। ऐसे आचरणोंसे अवश्य ही नरक होता है। इसलिये हे नृपश्रेष्ठ! अपने उन पिताका पापसे उद्धार कीजिये॥ ८४-८५॥ |
| अवश्यमेव नरकं एतैराचरणैर्भवेत्।<br>तस्मात्तं पितरं पापात्समुद्धर नृपोत्तम॥ ८५ | |
| सूत उवाच<br>इति श्रुत्वा वचस्तस्य व्यासस्यामिततेजसः।<br>साश्रुकण्ठोऽतिदुःखातो बभूव जनमेजयः॥ ८६ | सूतजी बोले— [हे ऋषिगण!] अमित तेजस्वी व्यासजीका यह वचन सुनकर महाराज जनमेजय बड़े दुःखी हुए और अश्रुप्रवाहके कारण उनका कण्ठ रुँध गया। [मनमें पश्चात्ताप करते हुए वे कहने लगे—] आज मेरे इस जीवनको धिक्कार है जो कि मेरे पिता नरकमें पड़े हैं। इसलिये अब मैं ऐसा उपाय करता हूँ, जिससे उत्तरातनय राजा परीक्षित् स्वर्ग चले जायें॥ ८६-८७॥ |
| धिगिदं जीवितं मेऽद्य पिता मे नरके स्थितः।<br>तत्करोमि यथैवाद्य स्वर्गं यात्युत्तरासुतः॥ ८७ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे अम्बायज्ञविधिवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
देवीकी आधारशक्तिसे पृथ्वीका अचल होना तथा उसपर सुमेरु आदि पर्वतोंकी रचना, ब्रह्माजीद्वारा मरीचि आदिकी मानसी सृष्टि करना, काश्यपी सृष्टिका वर्णन, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, कैलास और स्वर्ग आदिका निर्माण; भगवान् विष्णुद्वारा अम्बायज्ञ करना और प्रसन्न होकर भगवती आद्या-शक्तिद्वारा आकाशवाणीके माध्यमसे उन्हें वरदान देना
| राजोवाच<br>हरिणा तु कथं यज्ञः कृतः पूर्वं पितामह।<br>जगत्कारणरूपेण विष्णुना प्रभविष्णुना॥ १ | राजा बोले— हे पितामह! जगत्के कारणस्वरूप तथा परम शक्तिशाली भगवान् विष्णुने पूर्वकालमें वह यज्ञ कैसे किया? हे महामते! उस यज्ञमें कौन-कौन |
| अ० १३ ] | तृतीय स्कन्ध | ३०७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| के सहायास्तु तत्रासन्ब्राह्मणाः के महामते।<br>ऋत्विजो वेदतत्त्वज्ञास्तन्मे ब्रूहि परन्तप॥ २<br><br>पश्चात्करोम्यहं यज्ञं विधिदृष्टेन कर्मणा।<br>श्रुत्वा विष्णुकृतं यागमम्बिकायाः समाहितः॥ ३ | ब्राह्मण सहायक थे और कौन-कौन वेदतत्त्वज्ञ विद्वान् ऋत्विज थे? हे परन्तप! यह सब आप मुझे बतायें। भगवान् विष्णुके द्वारा किये गये अम्बायज्ञको सुनकर बादमें मैं भी सावधान होकर उसी विहित कर्मके अनुसार यज्ञ करूँगा॥ १—३॥ |
| व्यास उवाच<br>राजञ्छृणु महाभाग विस्तारं परमाद्भुतम्।<br>यथा भगवता यज्ञः कृतश्च विधिपूर्वकः॥ ४ | **व्यासजी बोले—**हे महाभाग! हे राजन्! भगवान् विष्णुने जिस तरह विधिपूर्वक देवीयज्ञ किया था, उस परम अद्भुत प्रसंगको आप विस्तारसे सुनें॥ ४॥ |
| विसर्जिता यदा देव्या दत्त्वा शक्तीश्च तास्त्रयः।<br>काजेशाः पुरुषा जाता विमानवरमास्थिताः॥ ५<br><br>प्राप्ता महार्णवं घोरं त्रयस्ते विबुधोत्तमाः।<br>चक्रुः स्थानानि वासार्थं समुत्पाद्य धरां स्थिताः॥ ६ | उस समय जब आदिशक्तिने उन्हें विभिन्न शक्तियाँ प्रदान करके विदा कर दिया, तब श्रेष्ठ विमानपर स्थित वे तीनों ब्रह्मा, विष्णु और महेश पुनः पुरुषके रूपमें हो गये। [वहाँसे चलकर] वे तीनों श्रेष्ठ देवगण घोर महासागरमें पहुँच गये। वहाँ उन्होंने पृथ्वी उत्पन्न करके उसपर रहनेके लिये स्थान बनाया और वहीं रहने लगे॥ ५-६॥ |
| आधारशक्तिरचला मुक्ता देव्या स्वयं ततः।<br>तदाधारा स्थिता जाता धरा मेदःसमन्विता॥ ७ | उसी समय देवीने अचल आधारशक्तिको मुक्त किया, जिसके आश्रयसे वह मेदयुक्त पृथ्वी टिक गयी॥ ७॥ |
| मधुकैटभयोर्मेदःसंयोगान्मेदिनी स्मृता।<br>धारणाच्च धरा प्रोक्ता पृथ्वी विस्तारयोगतः॥ ८ | मधु-कैटभके मेदका संयोग होनेके कारण पृथ्वीको 'मेदिनी' कहा गया है। धारण करनेकी शक्ति होनेके कारण उसे 'धरा' तथा विस्तृत होनेके कारण उसे 'पृथ्वी' कहा गया है॥ ८॥ |
| मही चापि महीयस्त्वाद्वृता सा शेषमस्तके।<br>गिरयश्च कृताः सर्वे धारणार्थं प्रविस्तराः॥ ९<br><br>लोहकीलं यथा काष्ठे तथा ते गिरयः कृताः।<br>महीधरा महाराज प्रोच्यन्ते विबुधैर्जनैः॥ १० | यह पृथ्वी महनीय होनेके कारण 'मही' कही जाती है। यह शेषनागके मस्तकपर स्थित है। इसको यथास्थान स्थित रखनेके लिये सभी विशाल पर्वत रचे गये। जिस प्रकार काठमें लौह कीलें जड़ दी जाती हैं, उसी प्रकार पृथ्वीको सुस्थिर रखनेके लिये विशाल पर्वत बनाये गये। इसी कारण विद्वान्लोग उन पर्वतोंको 'महीधर' कहते हैं॥ ९-१०॥ |
| जातरूपमयो मेरुर्बहुयोजनविस्तरः।<br>कृतो मणिमयैः शृङ्गैः शोभितः परमाद्भुतः॥ ११ | परम अद्भुत सुमेरुपर्वत सोनेका बना हुआ है, वह मणिमय चोटियोंसे सुशोभित है तथा अनेक योजन विस्तारवाला है॥ ११॥ |
| मरीचिर्नारदोऽत्रिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।<br>दक्षो वसिष्ठ इत्येते ब्रह्मणः प्रथिताः सुताः॥ १२<br><br>मरीचेः कश्यपो जातो दक्षकन्यास्त्रयोदश।<br>ताभ्यो देवाश्च दैत्याश्च समुत्पन्ना ह्यनेकशाः॥ १३ | [उस समय सृष्टिका विकास इस प्रकार हुआ—] सर्वप्रथम ब्रह्माके विख्यात मानसिक पुत्र मरीचि, नारद, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष और वसिष्ठ आदि हुए। तत्पश्चात् मरीचिके पुत्र कश्यप हुए। दक्षप्रजापतिको तेरह कन्याएँ हुईं। उन्हीं कन्याओंसे अनेक देवता एवं दैत्य उत्पन्न हुए॥ १२-१३॥ |
| ३०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| ततस्तु काश्यपी सृष्टिः प्रवृत्ता चातिविस्तरा।<br>मनुष्यपशुसर्पादिजातिभेदैरनेकधा ॥ १४॥ | उसके बाद काश्यपी सृष्टि संसारमें फैल गयी। उस सृष्टिमें मनुष्य, पशु और सर्प आदि योनिभेदोंसे अनेक जीव उत्पन्न हुए॥ १४॥ |
| ब्रह्मणश्चार्धदेहात्तु मनुः स्वायम्भुवोऽभवत्।<br>शतरूपा तथा नारी सञ्जाता वामभागतः॥ १५॥ | ब्रह्माके दाहिने आधे शरीरसे स्वायम्भुव मनु उत्पन्न हुए तथा बायें भागसे स्त्रीके रूपमें शतरूपा उत्पन्न हुईं॥ १५॥ |
| प्रियव्रतोत्तानपादौ सुतौ तस्या बभूवतुः।<br>तिस्रः कन्या वरारोहा ह्यभवन्नतिसुन्दराः॥ १६॥ | उन्हीं शतरूपासे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए तथा तीन अत्यन्त सुन्दर और उत्तम गुणोंवाली पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं॥ १६॥ |
| एवं सृष्टिं समुत्पाद्य भगवान्कमलोद्भवः।<br>चकार ब्रह्मलोकञ्च मेरुशृङ्गे मनोहरम्॥ १७॥ | इस प्रकार सृष्टिरचना करके कमलसे उत्पन्न भगवान् ब्रह्माजीने सुमेरुपर्वतके शिखरपर एक सुन्दर ब्रह्मलोक बनाया॥ १७॥ |
| वैकुण्ठं भगवान्विष्णू रमारमणमुत्तमम्।<br>क्रीडास्थानं सुरम्यञ्च सर्वलोकोपरिस्थितम्॥ १८॥ | भगवान् विष्णुने भी लक्ष्मीजीके विहार करनेयोग्य वैकुण्ठलोक बनाया। वह अत्यन्त रमणीय तथा उत्तम क्रीडास्थान सभी लोकोंके ऊपर विराजमान है॥ १८॥ |
| शिवोऽपि परमं स्थानं कैलासाख्यं चकार ह।<br>समासाद्य भूतगणं विजहार यथारुचि॥ १९॥ | शिवजीने भी कैलास नामक एक उत्तम स्थान बना लिया, जिसमें वे भूतगणोंको साथ लेकर इच्छानुसार विहार करने लगे॥ १९॥ |
| स्वर्गस्त्रिविष्टपो मेरुशिखरोपरि कल्पितः।<br>तच्च स्थानं सुरेन्द्रस्य नानारत्नविराजितम्॥ २०॥ | सुमेरुपर्वतके एक शिखरपर देवलोक स्वर्गकी रचना हुई। वह इन्द्रलोक अनेक प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित तथा इन्द्रका निवास था॥ २०॥ |
| समुद्रमथनात्प्राप्तः पारिजातस्तरूत्तमः।<br>चतुर्दन्तस्तथा नागः कामधेनुश्च कामदा॥ २१॥<br>उच्चैःश्रवास्तथाश्वो वै रम्भाद्याप्सरसस्तथा।<br>इन्द्रेणोपात्तमखिलं जातं वै स्वर्गभूषणम्॥ २२॥<br>धन्वन्तरिश्चन्द्रमाश्च सागराच्च समुद्बभौ।<br>स्वर्गस्थितौ विराजते देवौ बहुगुणैर्वृतौ॥ २३॥ | समुद्रमन्थनसे सर्वोत्तम वृक्ष पारिजात, चार दाँतोंवाला ऐरावत हाथी, कामना पूर्ण करनेवाली कामधेनु, उच्चैःश्रवा घोड़ा और रम्भा आदि अनेक अप्सराएँ निकलीं। इन्द्रने स्वर्गको सुशोभित करनेवाले इन सबको अपने पास रख लिया। धन्वन्तरिवैद्य तथा चन्द्रमा भी समुद्रसे निकले; वे दोनों देव अनेक गुणोंसे युक्त होकर स्वर्गमें रहते हुए शोभा पाने लगे॥ २१-२३॥ |
| एवं सृष्टिः समुत्पन्ना त्रिविधा नृपसत्तम।<br>देवतैर्यङ्मनुष्यादिभेदैर्विविधकल्पिता ॥ २४॥<br>अण्डजाः स्वेदजाश्चैव चोद्भिजाश्च जरायुजाः।<br>चतुर्भेदैः समुत्पन्ना जीवाः कर्मयुताः किल॥ २५॥<br>एवं सृष्टिं समासाद्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>विहारं स्वेषु स्थानेषु चक्रुः सर्वे यथेप्सितम्॥ २६॥ | हे नृपश्रेष्ठ! इस तरह तीन प्रकारकी सृष्टि हुई। देवता, पशु-पक्षी और मानव आदि अनेक भेदोंसे यह सृष्टि कल्पित है। अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज तथा जरायुज—इन चार भेदोंसे अनेक जीवोंकी सृष्टि हुई। उन सभी जीवोंके साथ कर्मका बन्धन लगा हुआ है। इस प्रकार सृष्टि करके ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ये सब अपने-अपने लोकोंमें इच्छापूर्वक विहार करने लगे॥ २४-२६॥ |
| अ० १३ ] | तृतीय स्कन्ध | ३०९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं प्रवर्तिते सर्गे भगवान्प्रभुरच्युतः ।<br>महालक्ष्म्या समं तत्र चिक्रीड भुवने स्वके ॥ २७ | इस प्रकार सृष्टिके विस्तृत हो जानेपर अच्युत भगवान् विष्णु अपने लोकमें लक्ष्मीके साथ विराजमान होकर आनन्द करने लगे ॥ २७ ॥ |
| एकस्मिन्समये विष्णुर्वैकुण्ठे संस्थितः पुरा ।<br>सुधासिन्धुस्थितं द्वीपं सस्मार मणिमण्डितम् ॥ २८<br><br>यत्र दृष्ट्वा महामायां मन्त्रश्चासादितः शुभः ।<br>स्मृत्वा तां परमां शक्तिं स्त्रीभावं गमितो यया ॥ २९<br><br>यज्ञं कर्तुं मनश्चक्रे अम्बिकाया रमापतिः ।<br>उत्तीर्य भुवनात्तस्मात्समाहूय महेश्वरम् ॥ ३० | एक समयकी बात है—भगवान् विष्णु वैकुण्ठमें विराजमान थे। उन्हें एकाएक अमृतसागरमें विद्यमान तथा मणियोंसे सुशोभित उस द्वीपका स्मरण हो आया, जहाँ महामायाका दर्शन करके उन्होंने शुभ मन्त्र प्राप्त किया था। तदनन्तर जिन भगवतीके द्वारा वे पुरुषसे स्त्री बना दिये गये थे, उन परमशक्तिका स्मरण करके लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुने अम्बायज्ञ करनेका मनमें निश्चय कर लिया ॥ २८-२९ १/२ ॥ |
| ब्रह्माणं वरुणं शक्रं कुबेरं पावकं यमम् ।<br>वसिष्ठं कश्यपं दक्षं वामदेवं बृहस्पतिम् ॥ ३१<br><br>सम्भारं कल्पयामास यज्ञार्थं चातिविस्तरम् ।<br>महाविभवसंयुक्तं सात्त्विकं च मनोहरम् ॥ ३२ | इसके बाद अपने धामसे उतरकर उन्होंने शिव, ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, कुबेर, अग्नि, यम, वसिष्ठ, कश्यप, दक्ष, वामदेव तथा बृहस्पतिको आमन्त्रित करके अत्यन्त विस्तारके साथ यज्ञ सम्पन्न करनेके लिये अत्यधिक मूल्यवाली, सात्त्विक तथा मनोरम बहुत-सी सामग्रियाँ एकत्र कीं ॥ ३०-३२ ॥ |
| मण्डपं विततं तत्र कारयामास शिल्पिभिः ।<br>ऋत्विजो वरयामास सप्तविंशतिसुव्रतान् ॥ ३३<br><br>चितिञ्च कारयामास वेदीश्चैव सुविस्तराः ।<br>प्रजेपुर्ब्राह्मणा मन्त्रान्देव्या बीजसमन्वितान् ॥ ३४ | उन्होंने शिल्पियोंद्वारा विशाल यज्ञमण्डप बनवाया और सत्ताईस महान् व्रती ऋत्विजोंका वरण किया। तत्पश्चात् अग्निस्थापनके लिये बड़ी-बड़ी वेदियाँ बनायी गयीं। ब्राह्मणगण बीजसहित देवीमन्त्रोंका जप करने लगे ॥ ३३-३४ ॥ |
| जुहुवुस्ते हविः कामं विधिवत्परिकल्पिते ।<br>कृते तु वितते होमे वागुवाचाशरीरिणी ॥ ३५<br><br>विष्णुं तदा समाभाष्य सुस्वरा मधुराक्षरा ।<br>विष्णो त्वं भव देवानां हरे श्रेष्ठतमः सदा ॥ ३६<br><br>मान्यश्च पूजनीयश्च समर्थश्च सुरेष्वपि ।<br>सर्वे त्वामर्चयिष्यन्ति ब्रह्माद्याश्च सवासवाः ॥ ३७ | विधिवत् प्रज्वलित की गयी अग्निमें वे ब्राह्मण यथेच्छ हव्य-पदार्थकी आहुति देने लगे। इस प्रकार विस्तृत होमकृत्य सम्पन्न होते ही भगवान् विष्णुको सम्बोधित करके मधुर अक्षरों तथा स्पष्ट स्वरोंसे युक्त आकाशवाणी हुई। हे हरे ! हे विष्णो ! आप सदा देवताओंमें श्रेष्ठतम होंगे। सभी देवगणोंमें आप मान्य, पूज्य तथा समर्थ होंगे। संसारमें इन्द्रसहित ब्रह्मा आदि सभी देवता आपकी अर्चना करेंगे ॥ ३५-३७ ॥ |
| प्रभविष्यन्ति भो भक्त्या मानवा भुवि सर्वतः ।<br>वरदस्त्वं च सर्वेषां भविता मानवेषु वै ॥ ३८ | हे विष्णो ! पृथ्वीपर सभी मानव आपकी भक्तिसे युक्त होकर रहेंगे और आप सभी मनुष्योंको वर देनेवाले होंगे ॥ ३८ ॥ |
| कामदः सर्वदेवानां परमः परमेश्वरः ।<br>सर्वयज्ञेषु मुख्यस्त्वं पूज्यः सर्वैश्च याज्ञिकैः ॥ ३९ | आप सभी देवताओंको वांछित फल प्रदान करनेवाले महान् परमेश्वर होंगे। सभी यज्ञोंमें प्रधानरूपसे सभी याज्ञिकोंके द्वारा आप ही पूजे जायँगे ॥ ३९ ॥ |
| ३१० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वां जनाः पूजयिष्यन्ति वरदस्त्वं भविष्यसि।<br>श्रयिष्यन्ति च देवास्त्वां दानवैरतिपीडिताः॥ ४०<br>शरणस्त्वञ्च सर्वेषां भविता पुरुषोत्तम।<br>पुराणेषु च सर्वेषु वेदेषु विततेषु च॥ ४१<br>त्वं वै पूज्यतमः कामं कीर्तिस्तव भविष्यति। | लोग आपकी पूजा करेंगे और आप उनके लिये वरदाता होंगे। राक्षसोंके द्वारा अत्यधिक प्रताड़ित किये जानेपर देवगण आपका आश्रय ग्रहण करेंगे। हे पुरुषोत्तम! आप सभीके शरणदाता होंगे। अत्यन्त विस्तारवाले वेदों तथा सभी पुराणोंमें आप ही पूज्यतम होंगे और आपकी महान् कीर्ति होगी॥ ४०-४१ ½॥ |
| यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भूतले॥ ४२<br>तदांशेनावतीर्याशु कर्तव्यं धर्मरक्षणम्।<br>अवतारः सुविख्याताः पृथिव्यां तव भागशः॥ ४३<br>भविष्यन्ति धरायां वै माननीया महात्मनाम्।<br>अवतारेषु सर्वेषु नानायोनिषु माधव॥ ४४<br>विख्यातः सर्वलोकेषु भविता मधुसूदन।<br>अवतारेषु सर्वेषु शक्तिस्ते सहचारिणी॥ ४५<br>भविष्यति ममांशेन सर्वकार्यप्रसाधिनी।<br>वाराही नारसिंही च नानाभेदैरनेकधा॥ ४६ | इस पृथ्वीतलपर जब-जब धर्मका ह्रास होगा तब-तब आप शीघ्र अपने अंशसे अवतार लेकर धर्मकी रक्षा करेंगे। आपके अंशसे उत्पन्न वे समस्त अवतार पृथ्वीपर अत्यन्त प्रसिद्ध होंगे और महात्मागण आपके उन अवतारोंका सम्मान करेंगे। हे माधव! नानाविध योनियोंमें आपके द्वारा लिये गये अवतारोंमें आप सभी लोकोंमें विख्यात होंगे। हे मधुसूदन! उन सभी अवतारोंमें मेरे अंशसे उत्पन्न शक्ति सदा आपकी सहचारिणी होगी और आपके समस्त कार्योंको सम्पन्न करेगी। वह शक्ति वाराही, नारसिंही आदि भेदोंसे अनेक प्रकारकी होगी॥ ४२-४६॥ |
| नानायुधाः शुभाकाराः सर्वाभरणमण्डिताः।<br>ताभिर्युक्तः सदा विष्णो सुरकार्याणि माधव॥ ४७<br>साधयिष्यसि तत्सर्वं मदत्तवरदानतः।<br>तास्त्वया नावमन्तव्याः सर्वदा गर्वलेशतः॥ ४८ | वे शक्तियाँ सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत, भव्य स्वरूपवाली एवं नानाविध शस्त्रास्त्रोंसे सज्जित होंगी। हे विष्णो! आप उन शक्तियोंसे सदैव युक्त रहेंगे। हे माधव! मेरे द्वारा प्रदत्त वरदानके प्रभावसे आप देवताओंके समस्त कार्य सिद्ध करेंगे। आप लेशमात्र भी अभिमान करके उन शक्तियोंका कभी अपमान न कीजियेगा, अपितु हर प्रकारसे प्रयत्नपूर्वक उन शक्तियोंका पूजन तथा सम्मान कीजियेगा॥ ४७-४८ ½॥ |
| पूजनीयाः प्रयत्नेन माननीयाश्च सर्वथा।<br>नूनं ता भारते खण्डे शक्तयः सर्वकामदाः॥ ४९<br>भविष्यन्ति मनुष्याणां पूजिताः प्रतिमासु च।<br>तासां तव च देवेश कीर्तिः स्यादखिलेष्वपि॥ ५० | समस्त कामनाओंको प्रदान करनेवाली वे शक्तियाँ भारतवर्षमें मनुष्योंद्वारा विविध प्रतिमाओंमें प्रतिष्ठित होकर पूजी जायँगी। हे देवेश! उन शक्तियोंकी तथा आपकी कीर्ति पृथ्वीमण्डल तथा समस्त सातों द्वीपोंमें प्रसिद्ध होगी॥ ४९-५० ½॥ |
| द्वीपेषु सप्तस्वपि च विख्याता भुवि मण्डले।<br>ताश्च त्वां वै महाभाग मानवा भुवि मण्डले॥ ५१<br>अर्चयिष्यन्ति वाञ्छार्थं सकामाः सततं हरे।<br>अर्चासु चोपहारैश्च नानाभावसमन्विताः॥ ५२<br>पूजयिष्यन्ति वेदोक्तैर्मन्त्रैर्नामजपैस्तथा। | हे महाभाग! भूमण्डलपर सकाम मनुष्य अपने मनोरथोंको पूर्ण करनेके लिये आपकी तथा उन शक्तियोंकी निरन्तर उपासना करेंगे। हे हरे! वे लोग अर्चनाओंमें अनेक भावोंसे युक्त होकर नानाविध उपहारों, वैदिक मन्त्रों तथा नामजपसे आपकी आराधना |
| अ० १४ ] | तृतीय स्कन्ध | ३११ |
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| महिमा तव भूर्लोके स्वर्गे च मधुसूदन ॥ ५३<br>पूजनाद्देवदेवेश वृद्धिमेष्यति मानवैः ।<br>व्यास उवाच<br>इति दत्त्वा वराण्वाणी विरराम खसम्भवा ॥ ५४<br>भगवानपि प्रीतात्मा हृष्टवच्छ्रवणाद्दिव ।<br>समाप्य विधिवद्यज्ञं भगवान्हरिरीश्वरः ॥ ५५<br>विसर्जयित्वा तान्देवान्ब्रह्मपुत्रान्मुनीनथ ।<br>जगामानुचरैः सार्धं वैकुण्ठं गरुडध्वजः ॥ ५६<br>स्वानि स्वानि च धिष्ण्यानि पुनः सर्वे सुरास्ततः ।<br>मुनयो विस्मिता वार्तां कुर्वन्तस्ते परस्परम् ॥ ५७<br>ययुः प्रमुदिताः कामं स्वाश्रमान्पावनानथ ॥ ५८<br>श्रुत्वा वाणीं परमविशदां व्योमजां श्रोत्ररम्यां<br>सर्वेषां वै प्रकृतिविषये भक्तिभावश्च जातः ।<br>चक्रुः सर्वे द्विजमुनिगणाः पूजनं भक्तियुक्ता-<br>स्तस्याः कामं निखिलफलदं चागमोक्तं मुनीन्द्राः ॥ ५९ | करेंगे। हे मधुसूदन! हे देवदेवेश! मनुष्योंके द्वारा सुपूजित होनेके कारण आपकी महिमा पृथ्वीलोक तथा स्वर्गलोकमें वृद्धिको प्राप्त होगी॥ ५१—५३ १/२॥<br>व्यासजी बोले— इस प्रकार भगवान् विष्णुको वरदान देकर वह आकाशवाणी चुप हो गयी। उसे सुनते ही भगवान् विष्णु भी प्रसन्नचित्त हो गये। तत्पश्चात् यज्ञका विधिपूर्वक समापन करके तथा उन देवताओं, ब्रह्मपुत्रों और मुनियोंको विदा करके सर्वसमर्थ गरुडध्वज भगवान् विष्णु अपने अनुचरोंके साथ वैकुण्ठलोकको चले गये॥ ५४—५६॥<br>तदनन्तर विस्मयके साथ यज्ञविषयक वार्ता करते हुए वे समस्त देवता अपने-अपने लोकोंको तथा मुनिजन अपने-अपने पवित्र आश्रमोंको अति प्रसन्नतापूर्वक चले गये॥ ५७-५८॥<br>आकाशसे प्रादुर्भूत उस कर्णप्रिय तथा परम विशद वाणीको सुनकर सबके हृदयमें परा प्रकृतिके प्रति भक्तिभाव उत्पन्न हो गया। हे मुनीन्द्रो! अतएव वे सभी ब्राह्मण तथा मुनिजन भक्तिपरायण होकर उन भगवतीका पूजन करने लगे, जो वेदशास्त्रोंमें वर्णित है तथा सम्पूर्ण वांछित फलोंको प्रदान करनेवाला है॥ ५९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे अम्बिकामखस्य विष्ण्वनुष्ठानवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
देवीमाहात्म्यसे सम्बन्धित राजा ध्रुवसन्धिकी कथा, ध्रुवसन्धिकी मृत्युके बाद राजा युधाजित् और वीरसेनका अपने-अपने दौहित्रोंके पक्षमें विवाद
| जनमेजय उवाच<br>श्रुतो वै हरिणा क्लृप्तो यज्ञो विस्तरतो द्विज ।<br>महिमानं तथाम्बाया वद विस्तरतो मम ॥ १<br>श्रुत्वा देव्याश्चरित्रं वै कुर्वे मखमनुत्तमम् ।<br>प्रसादात्तव विप्रेन्द्र भविष्यामि च पावनः ॥ २<br>व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्याश्चरितमुत्तमम् ।<br>इतिहासं पुराणञ्च कथयामि सुविस्तरम् ॥ ३ | जनमेजय बोले— हे द्विज! मैंने विष्णुद्वारा किये गये देवीयज्ञके विषयमें विस्तारपूर्वक सुन लिया। अब आप मुझे विस्तृत रूपसे भगवतीकी महिमा बताइये॥ १॥<br>हे विप्रेन्द्र! देवीका चरित्र सुनकर मैं भी वह उत्कृष्ट देवीयज्ञ अवश्य करूँगा और इस प्रकार आपकी कृपासे पवित्र हो जाऊँगा॥ २॥<br>व्यासजी बोले— हे राजन्! सुनिये, अब मैं भगवतीके उत्तम चरित्रका वर्णन करूँगा। मैं इसके साथ-साथ विस्तृत इतिहास तथा पुराण भी कहूँगा॥ ३॥ |
| ३१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कोसलेषु नृपश्रेष्ठः सूर्यवंशसमुद्भवः।<br>पुष्यपुत्रो महातेजा ध्रुवसन्धिरिति स्मृतः॥ ४ | कोसलदेशमें सूर्यवंशमें एक महातेजस्वी श्रेष्ठ राजा उत्पन्न हुए। वे महाराज पुष्यके पुत्र थे और ध्रुवसन्धिके नामसे विख्यात थे॥ ४॥ |
| धर्मात्मा सत्यसन्धश्च वर्णाश्रमहिते रतः।<br>अयोध्यायां समृद्धायां राज्यं चक्रे शुचिव्रतः॥ ५ | वे धर्मात्मा, सत्यनिष्ठ तथा वर्णाश्रम-धर्मकी रक्षाके लिये सदा तत्पर रहते थे। पवित्र व्रतधारी वे ध्रुवसन्धि वैभवशालिनी अयोध्यानगरीमें राज्य करते थे॥ ५॥ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये तथा द्विजाः।<br>स्वां स्वां वृत्तिं समास्थाय तद्राज्ये धर्मतोऽभवन्॥ ६<br><br>न चौराः पिशुना धूर्तास्तस्य राज्ये च कुत्रचित्।<br>दम्भाः कृतघ्ना मूर्खाश्च वसन्ति किल मानवाः॥ ७ | उनके राज्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, द्विजगण तथा अन्य सभी अपनी-अपनी जीविकामें तत्पर रहकर धर्मपूर्वक आचरण करते थे। उनके राज्यमें कहीं भी चोर, निन्दक, धूर्त, पाखण्डी, कृतघ्न तथा मूर्ख मनुष्य निवास नहीं करते थे॥ ६-७॥ |
| एवं वै वर्तमानस्य नृपस्य कुरुसत्तम।<br>द्वे पत्न्यौ रूपसम्पन्ने ह्यासतुः कामभोगदे॥ ८<br><br>मनोरमा धर्मपत्नी सुरूपातिविचक्षणा।<br>लीलावती द्वितीया च सापि रूपगुणान्विता॥ ९ | हे कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार धर्मपूर्वक राज्य करते हुए उन राजाकी रूपवती तथा आनन्दोपभोग प्रदान करनेवाली दो पत्नियाँ थीं। उनकी धर्मपत्नी मनोरमा थी, जो सुन्दर रूपवाली तथा परम विदुषी थी और दूसरी पत्नी लीलावती थी; वह भी रूप तथा गुणोंसे सम्पन्न थी॥ ८-९॥ |
| विजहार सपत्नीभ्यां गृहेषूपवनेषु च।<br>क्रीडागिरौ दीर्घिकासु सौधेषु विविधेषु च॥ १० | महाराज ध्रुवसन्धि उन दोनों पत्नियोंके साथ राजभवनों, उपवनों, क्रीड़ापर्वत, बावलियों तथा विभिन्न महलोंमें विहार करते थे॥ १०॥ |
| मनोरमा शुभे काले सुषुवे पुत्रमुत्तमम्।<br>सुदर्शनाभिधं पुत्रं राजलक्षणसंयुक्तम्॥ ११ | रानी मनोरमाने शुभ वेलामें राजलक्षणोंसे सम्पन्न एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया। उसका नाम सुदर्शन पड़ा॥ ११॥ |
| लीलावत्यपि तत्पत्नी मासेनेकेन भामिनी।<br>सुषुवे सुन्दरं पुत्रं शुभे पक्षे दिने तथा॥ १२ | उनकी दूसरी सुन्दर पत्नी लीलावतीने भी एक माहके भीतर शुभ पक्ष तथा शुभ दिनमें एक सुन्दर पुत्रको जन्म दिया॥ १२॥ |
| चकार नृपतिस्तत्र जातकर्मादिकं द्वयोः।<br>ददौ दानानि विप्रेभ्यः पुत्रजन्मप्रमोदितः॥ १३ | महाराज ध्रुवसन्धिने उन दोनों बालकोंका जातकर्म आदि संस्कार किया तथा पुत्र-जन्मसे प्रमुदित एवं उल्लसित होकर उन्होंने ब्राह्मणोंको नानाविध दान दिये॥ १३॥ |
| प्रीतिं तयोः समां राजा चकार सुतयोर्नृप।<br>नृपश्चकार सौहार्देष्वन्तरं न कदाचन॥ १४ | हे राजन्! महाराज ध्रुवसन्धि उन दोनों पुत्रोंपर समान प्रीति रखते थे। वे उन दोनोंके प्रति अपने प्रेम-भावमें कभी भी अन्तर नहीं आने देते थे॥ १४॥ |
| चूडाकर्म तयोश्चक्रे विधिना नृपसत्तमः।<br>यथाविभवमेवासौ प्रीतियुक्तः परन्तपः॥ १५ | परम तपस्वी उन राजेन्द्रने अपने वैभवके अनुसार बड़े हर्षोल्लासके साथ विधिपूर्वक उन दोनोंका चूडाकर्म-संस्कार किया॥ १५॥ |
| अ० १४ ] | तृतीय स्कन्ध | ३१३ | | :--- | :--- |
| कृतचूडौ सुतौ कामं जह्रतुर्नृपतेर्मनः।<br>क्रीडमानावुभौ कान्तौ लोकानामनुरञ्जकौ॥ १६ | चूडाकर्म-संस्कार हो जानेपर उन दोनों बालकोंने राजाके मनको मोहित कर लिया; वे दोनों कान्तिमान् बालक खेलते समय सभी लोगोंको मुग्ध कर लेते थे॥ १६॥ |
| तयोः सुदर्शनो ज्येष्ठो लीलावत्याः सुतः शुभः।<br>शत्रुजित्संज्ञकः कामं चाटुवाक्यो बभूव ह॥ १७ | उन दोनोंमें [मनोरमाका पुत्र] सुदर्शन ज्येष्ठ था। लीलावतीका शत्रुजित् नामक पुत्र अत्यन्त सुन्दर तथा मृदुभाषी था॥ १७॥ |
| नृपतेः प्रीतिजनको मञ्जुवाक्चारुदर्शनः।<br>प्रजानां वल्लभः सोऽभूत्तथा मन्त्रिजनस्य वै॥ १८ | उसके मधुरभाषी तथा अत्यन्त सुन्दर होनेके कारण राजा उससे अधिक प्रेम करने लगे और उसी तरहसे वह प्रजाजनों तथा मन्त्रियोंका भी प्रियपात्र बन गया॥ १८॥ |
| यथा तस्मिन्नृपः प्रीतिं चकार गुणयोगतः।<br>मन्दभाग्यान्मन्दभावो न तथा वै सुदर्शने॥ १९ | शत्रुजित्के गुणोंके कारण राजाका जैसा प्रेम उसपर हो गया, वैसा प्रेम सुदर्शनके प्रति नहीं था। वे सुदर्शनके प्रति मन्दभाग्य होनेके कारण कम अनुराग रखने लगे॥ १९॥ |
| एवं गच्छति काले तु ध्रुवसन्धिर्नृपोत्तमः।<br>जगाम वनमध्येऽसौ मृगयाभिरतः सदा॥ २० | इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर आखेटके प्रति सदा तत्पर रहनेवाले नृपश्रेष्ठ ध्रुवसन्धि आखेटके लिये वनमें गये॥ २०॥ |
| निघ्नन्मृगान् रुरूंश्कम्बून्सूकरानावयाञ्छशान्।<br>महिषाञ्छरभान्खड्गांश्चिक्रीड नृपतिर्वने॥ २१ | वे राजा ध्रुवसन्धि वनमें रुरु मृगों, बनैले सूअरों, गवयों, खरगोशों, भैंसों, शरभों तथा गैंडोंको मारते हुए आखेट करने लगे॥ २१॥ |
| क्रीडमाने नृपे तत्र वने घोरऽतिदारुणे।<br>उदतिष्ठन्निकुञ्जात्तु सिंहः परमकोपनः॥ २२ | जब महाराज उस गहन तथा महाभयंकर वनमें शिकार खेल रहे थे, उसी समय महान् रोषमें भरा हुआ एक सिंह झाड़ीसे निकला॥ २२॥ |
| राज्ञा शिलीमुखेनादौ विद्धः क्रोधवशं गतः।<br>दृष्ट्वाग्रे नृपतिं सिंहो ननाद मेघनिःस्वनः॥ २३ | पहले तो राजाने उसे बाणसे आहत कर दिया; तब अत्यन्त कोपाविष्ट वह सिंह उन्हें अपने सामने देखकर मेघके समान गरजने लगा॥ २३॥ |
| कृत्वा चोर्ध्वं स लाङ्गूलं प्रसारितबृहत्सटः।<br>हन्तुं नृपतिमाकाशादुत्पपातातिकोपनः॥ २४ | अपनी पूँछ खड़ी करके तथा गर्दनके लम्बे केशोंको छितराकर अत्यन्त कुपित वह सिंह राजाको मारनेके लिये छलाँग लगाकर उनपर झपटा॥ २४॥ |
| नृपतिस्तरसा वीक्ष्य दधारासिं करे तदा।<br>वामे चर्म समादाय स्थितः सिंह इवापरः॥ २५ | तब उसे देखकर राजाने भी तत्काल अपने हाथमें तलवार धारण कर ली और बायें हाथमें ढाल लेकर दूसरे सिंहके समान खड़े हो गये॥ २५॥ |
| सेवकास्तस्य ये सर्वे तेऽपि बाणान्मृथक्पृथक्।<br>अमुञ्चन्कुपिताः कामं सिंहोपरि रुषान्विताः॥ २६ | यह देखकर उनके जो सेवकगण थे, वे सभी अत्यन्त कुपित हो उठे और रोषपूर्वक उस सिंहपर अलग-अलग बाणोंसे प्रहार करने लगे॥ २६॥ |
| ३१४ | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १४ |
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| हाहाकारो महानासीत्संप्रहारश्च दारुणः।<br>उत्पपात ततः सिंहो नृपस्योपरि दारुणः॥ २७ | वहाँ महान् हाहाकार मच गया तथा भीषण प्रहार होने लगा। इसी बीच वह भयानक सिंह राजापर टूट पड़ा॥ २७॥ | | तं पतन्तं समालोक्य खड्गेनाभ्यहनन्नृपः।<br>सोऽपि क्रूरैर्नखाग्रैश्च तत्रागत्य विदारितः॥ २८ | उसे अपने ऊपर झपटते देखकर राजाने खड्गसे उसपर प्रहार किया। उस सिंहने भी राजाके समीप आकर अपने भयानक तथा तीक्ष्ण नखोंसे राजाको क्षत-विक्षत कर डाला॥ २८॥ | | स नखैराहतो राजा पपात च ममार वै।<br>चुक्रुशुः सैनिकास्ते तु निर्जघ्नुर्विशिखैस्तदा॥ २९<br><br>मृतः सिंहोऽपि तत्रैव भूपतिश्च तथा मृतः।<br>सैनिकैर्मन्त्रिमुख्याश्च तत्रागत्य निवेदिताः॥ ३० | नखोंके प्रहारसे आहत होकर राजा गिर पड़े और उनकी मृत्यु हो गयी। इससे सभी सैनिक और भी क्रोधित हो उठे; तब वे बाणोंसे सिंहपर भीषण प्रहार करने लगे। इस प्रकार राजा ध्रुवसन्धि तथा वह सिंह दोनों मर गये। तदनन्तर सैनिकोंने आकर मन्त्रिप्रवरोंको यह समाचार बताया॥ २९-३०॥ | | परलोकगतं भूपं श्रुत्वा ते मन्त्रिसत्तमाः।<br>संस्कारं कारयामासुर्गत्वा तत्र वनान्तिके॥ ३१ | राजाके परलोकगमनका समाचार सुनकर उन श्रेष्ठ मन्त्रियोंने उस वनमें जाकर उनका दाह-संस्कार करवाया॥ ३१॥ | | परलोकक्रियां सर्वां वसिष्ठो विधिपूर्वकम्।<br>कारयामास तत्रैव परलोकसुखावहाम्॥ ३२ | वहींपर गुरु वसिष्ठने परलोकमें सुख प्रदान करनेवाले सभी श्राद्ध आदि पारलौकिक कृत्य विधिपूर्वक सम्पन्न करवाये॥ ३२॥ | | प्रजाः प्रकृतयश्चैव वसिष्ठश्च महामुनिः।<br>सुदर्शनं नृपं कर्तुं मन्त्रं चक्रुः परस्परम्॥ ३३ | तदनन्तर प्रजाजनों, मन्त्रियों तथा महामुनि वसिष्ठने सुदर्शनको राजा बनानेके उद्देश्यसे आपसमें विचार-विमर्श किया॥ ३३॥ | | धर्मपत्नीसुतः शान्तः पुरुषश्च सुलक्षणः।<br>अयं नृपासनार्हश्च ह्यब्रुवन्मन्त्रिसत्तमाः॥ ३४ | श्रेष्ठ मन्त्रियोंने कहा कि सुदर्शन महाराजकी धर्मपत्नी मनोरमाके पुत्र हैं, शान्त स्वभाववाले पुरुष हैं तथा सभी लक्षणोंसे सम्पन्न हैं, अतः ये राजसिंहासनके योग्य हैं॥ ३४॥ | | वसिष्ठोऽपि तथैवाह योग्योऽयं नृपतेः सुतः।<br>बालोऽपि धर्मवान् राजा नृपासनमिहार्हति॥ ३५ | गुरु वसिष्ठने भी वही बात कही कि महाराजका यह पुत्र सुदर्शन राजपिके योग्य है; क्योंकि बालक होते हुए भी धर्मपरायण राजकुमार ही राजसिंहासनका अधिकारी होता है॥ ३५॥ | | कृते मन्त्रे मन्त्रिवृद्धैर्युधाजिन्नाम पार्थिवः।<br>तत्राजगाम तरसा श्रुत्वा तूज्जयिनीपतिः॥ ३६ | वयोवृद्ध मन्त्रियोंके द्वारा इस प्रकार विचार करनेके उपरान्त यह समाचार सुनकर उज्जयिनीनरेश राजा युधाजित् शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे॥ ३६॥ | | मृतं जामातरं श्रुत्वा लीलावत्याः पिता तदा।<br>तत्राजगाम त्वरितो दौहित्रप्रियकाम्यया॥ ३७ | लीलावतीके पिता युधाजित् अपने दामादकी मृत्युके विषयमें सुनकर अपने दौहित्रके हितकी कामनासे उस समय शीघ्रतापूर्वक वहाँ आये॥ ३७॥ |
| अ० १४ ] | तृतीय स्कन्ध | ३१५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वीरसेनस्तथायातः सुदर्शनहितेच्छया।<br>कलिङ्गाधिपतिश्चैव मनोरमापिता नृपः॥ ३८ | उसी समय सुदर्शनके हित-साधनके उद्देश्यसे मनोरमाके पिता कलिंगाधिपति महाराज वीरसेन भी वहाँ आ गये॥ ३८॥ |
| उभौ तौ सैन्यसंयुक्तौ नृपौ साध्वससंस्थितौ।<br>चक्रतुर्मन्त्रिमुख्यैस्तैर्मन्त्रं राज्यस्य कारणात्॥ ३९ | सेनाओंसे सम्पन्न तथा एक-दूसरेसे भयभीत वे दोनों राजा राज्यके अधिकारीका निर्णय करनेके लिये प्रधान अमात्योंके साथ मन्त्रणा करने लगे॥ ३९॥ |
| युधाजित्तु तदापृच्छज्ज्येष्ठः कः सुतयोर्द्वयोः।<br>राज्यं प्राप्नोति ज्येष्ठो वै न कनीयान्कदाचन॥ ४० | युधाजित्ने पूछा कि इन दोनों राजकुमारोंमें ज्येष्ठ कौन है? ज्येष्ठ ही राज्य प्राप्त करता है, कनिष्ठ कदापि नहीं॥ ४०॥ |
| वीरसेनोऽपि तत्राह धर्मपत्नीसुतः किल।<br>राज्यार्हः स यथा राजन् शास्त्रज्ञेभ्यो मया श्रुतम्॥ ४१ | उसी समय वीरसेनने भी कहा—हे राजन्! मैंने शास्त्रविदोंसे ऐसा सुना है कि धर्मपत्नीका पुत्र ही राज्यका अधिकारी माना जाता है॥ ४१॥ |
| युधाजित्पुनराहेदं ज्येष्ठोऽयं च यथा गुणैः।<br>राजलक्षणसंयुक्तो न तथायं सुदर्शनः॥ ४२ | युधाजित्ने पुनः कहा कि यह शत्रुजित् गुणोंके कारण ज्येष्ठ है। यह सुदर्शन राजोचित चिह्नोंसे युक्त होते हुए भी वैसा नहीं है॥ ४२॥ |
| विवादोऽत्र सुसम्पन्नो नृपयोस्तत्र लुब्धयोः।<br>कः सन्देहमपाकर्तुं क्षमः स्यादतिसङ्कटे॥ ४३ | अपने-अपने स्वार्थके वशीभूत उन दोनों राजाओंमें वहाँ विवाद होने लगा। अब उस महासंकटकी परिस्थितिमें उनके सन्देहका समाधान करनेमें कौन समर्थ हो सकता था?॥ ४३॥ |
| युधाजिन्मन्त्रिणः प्राह यूयं स्वार्थपराः किल।<br>सुदर्शनं नृपं कृत्वा धनं भोक्तुं किलेच्छथ॥ ४४ | युधाजित्ने मन्त्रियोंसे कहा कि आपलोग अवश्य ही स्वार्थपरायण हो गये हैं और सुदर्शनको राजा बनाकर धनका स्वयं उपभोग करना चाहते हैं॥ ४४॥ |
| युष्माकं तु विचारोऽयं मया ज्ञातस्तथेङ्गितैः।<br>शत्रुजित्सबलस्तस्मात्सम्मतो वो नृपासने॥ ४५ | मैंने आप लोगोंका यह विचार तो आप सबकी भाव-भंगिमासे पहले ही जान लिया था। शत्रुजित् सुदर्शनसे अधिक बलवान् है, अतः आप लोगोंकी सम्मति तो यह होनी चाहिये कि शत्रुजित् ही राजसिंहासनपर आसीन होनेयोग्य है॥ ४५॥ |
| मयि जीवति कः कुर्यात्कनीयांसं नृपं किल।<br>त्यक्त्वा ज्येष्ठं गुणार्हञ्च सेनया च समन्वितम्॥ ४६ | ऐसा कौन व्यक्ति है, जो मेरे जीवित रहते गुणोंमें बड़े तथा सेनासे सुसज्जित राजकुमारको छोड़कर [गुणोंमें] छोटे पुत्रको राजा बना सके॥ ४६॥ |
| नूनं युद्धं करिष्यामि तस्मिन्खड्गस्य मेदिनी।<br>धारया च द्विधा भूयाद्युष्माकं तत्र का कथा॥ ४७ | इसके लिये मैं निश्चितरूपसे घोर संग्राम करूँगा। मेरे खड्गकी धारसे पृथिवीके भी दो टुकड़े हो सकते हैं, फिर आप लोगोंकी बात ही क्या!॥ ४७॥ |
| वीरसेनस्तु तच्छ्रुत्वा युधाजितमभाषत।<br>बालौ द्वौ सदृशप्रज्ञौ को भेदोऽत्र विचक्षण॥ ४८ | यह सुनकर वीरसेनने युधाजित्से कहा—हे विद्वन्! दोनों ही बालक समान बुद्धि रखते हैं; इनमें भेद ही क्या है?॥ ४८॥ |
| ३१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
|---|
| एवं विवदमानौ तौ संस्थितौ नृपती तदा।<br>प्रजाश्च ऋषयश्चैव बभूवुर्व्यग्रमानसाः॥ ४९ | तदनन्तर उन दोनोंको इस प्रकार परस्पर विवाद करते देखकर प्रजाजनों तथा ऋषियोंके मनमें व्यग्रता होने लगी॥ ४९॥ | | समाजग्मुश्च सामन्ताः ससैन्याः क्लेशतत्पराः।<br>विग्रहं चाभिकाङ्क्षन्तः परस्परमतन्द्रिताः॥ ५० | तब एक-दूसरेको क्लेश पहुँचानेके लिये उद्यत तथा युद्धकी इच्छावाले दोनों पक्षोंके सामन्त सावधान होकर अपनी-अपनी सेनाओंके साथ वहाँ आ पहुँचे॥ ५०॥ | | निषादा ह्याययुस्तत्र शृङ्गवेरपुराश्रयाः।<br>राज्यद्रव्यमपाहर्तुं मृतं श्रुत्वा महीपतिम्॥ ५१<br><br>पुत्रौ च बालकौ श्रुत्वा विग्रहं च परस्परम्।<br>चौरास्तत्र समाजग्मुर्देशदेशान्तरादपि॥ ५२ | उसी समय महाराज ध्रुवसन्धिकी मृत्युका समाचार सुनकर शृंगवेरपुरमें रहनेवाले निषादगण राजकोष लूटनेके लिये वहाँ आ गये। दोनों राजकुमार अभी बालक हैं तथा वे आपसमें कलह कर रहे हैं—यह सुनकर देश-देशान्तरके चोर-लुटेरे भी वहाँ आ गये॥ ५१-५२॥ | | सम्मर्दस्तत्र सञ्जातः कलहे समुपस्थिते।<br>युधाजिद्वीरसेनश्च युद्धकामौ बभूवतुः॥ ५३ | इस प्रकार वहाँपर भारी कलह उपस्थित हो जानेपर युद्ध आरम्भ हो गया। युधाजित् तथा वीरसेन भी युद्धके लिये उद्यत हो गये॥ ५३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे युधाजिद्वीरसेनयोर्युद्धार्थं सजीभवनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
~~ ० ~~
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
राजा युधाजित् और वीरसेनका युद्ध, वीरसेनकी मृत्यु, राजा ध्रुवसन्धिकी रानी मनोरमाका अपने पुत्र सुदर्शनको लेकर भारद्वाजमुनिके आश्रममें जाना तथा वहीं निवास करना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| संयुगे च सति तत्र भूपयोराहवाय समुपात्तशस्त्रयोः।<br>क्रोधलोभवशयोः समं ततः सम्बभूव तुमुलस्तु विमर्दः॥ १ | [हे राजन्!] युद्ध आरम्भ हो जानेपर क्रोध एवं लोभके वशीभूत उन दोनों राजाओंने लड़नेके लिये शस्त्र उठा लिये और तब उनके बीच भयानक संग्राम आरम्भ हो गया॥ १॥ |
| संस्थितः स समरे धृतचापः पार्थिवः पृथुलबाहुयुधाजित्।<br>संयुतः स्वबलवाहनादिकैराहवाय कृतनिश्चयो नृपः॥ २ | युद्धके लिये कृतसंकल्प वे विशालबाहु राजा युधाजित् धनुष धारण करके अपनी सेना तथा वाहन आदिके साथ रणभूमिमें डट गये॥ २॥ |
| वीरसेन इह सैन्यसंयुतः क्षात्रधर्ममनुसृत्य सङ्गरे।<br>पुत्रिकामजहिताय पार्थिवः संस्थितः सुरपतेः समतेजाः॥ ३ | इधर इन्द्रके समान तेजस्वी राजा वीरसेन भी क्षत्रियोचित धर्मका अनुसरण करते हुए अपने दौहित्रके हित-साधनहेतु विशाल सेनाके साथ रणक्षेत्रमें उपस्थित हो गये॥ ३॥ |
| स बाणवृष्टिं विससर्ज पार्थिवो<br>युधाजितं वीक्ष्य रणे स्थितञ्च।<br>गिरिं तडित्वानिव तोयवृष्टिभिः<br>क्रोधान्वितः सत्यपराक्रमोऽसौ॥ ४ | सत्यपराक्रमी राजा वीरसेनने युधाजित्को समरांगणमें उपस्थित देखकर क्रोधयुक्त होकर इस प्रकार बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी, मानो पर्वतपर मेघ जल बरसा रहा हो॥ ४॥ |
| अ० १५ ] | तृतीय स्कन्ध | ३१७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं वीरसेनो विशिखैः शिलाशितैः<br> समावृणोदाशुगमैरजिह्मगैः ।<br>चिच्छेद बाणैश्च शिलीमुखानसौ<br> तेनैव मुक्तानतिवेगपातिनः ॥ ५ | राजा वीरसेनने पत्थरपर घिसकर तीक्ष्ण बनाये गये, द्रुतगामी तथा सीधे प्रवेश करनेवाले बाणोंसे युधाजित्को आच्छादित कर दिया और युधाजित्के द्वारा छोड़े गये अत्यन्त तीव्रगामी बाणोंको उन्होंने अपने बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े कर दिया ॥ ५ ॥ |
| गजरथतुरगाणां सम्बभूवातियुद्धं<br> सुरनरमुनिसङ्घैर्वीक्षितं चातिघोरम् ।<br>विततविहगवृन्दैरावृतं व्योम सद्यः<br> पिशितमशितुकामैः काकगृध्रादिभिश्च ॥ ६ | इस प्रकार हाथियों, रथों तथा घोड़ोंसे अतिभयंकर युद्ध होने लगा जिसे देवता, मनुष्य तथा मुनिगण देख रहे थे। मांसभक्षणकी लालसावाले कौए, गीध आदि पक्षियोंके विस्तृत समूहसे शीघ्र ही वहाँका आकाशमण्डल ढक गया ॥ ६ ॥ |
| तत्राद्भुता क्षतजसिन्धुरुवाह घोरा<br> वृन्देभ्य एव गजवीरतुरङ्गमाणाम् ।<br>त्रासावहा नयनमार्गगता नराणां<br> पापात्मनां रविजमार्गभवेव कामम् ॥ ७ | उस युद्धभूमिमें हाथियों, घोड़ों तथा सैन्यसमूहोंके शरीरसे निकले रक्तसे अद्भुत तथा भयंकर नदी बह चली, जो लोगोंको उसी प्रकार दिखायी पड़ रही थी, जैसे यमलोकके मार्गमें प्रवाहित वैतरणी पापियोंको भयावह दीखती है॥ ७॥ |
| कीर्णानि भिन्नपुलिने नरमस्तकानि<br> केशावृतानि च विभान्ति यथैव सिन्धौ ।<br>तुम्बीफलानि विहितानि विहर्तुकामै-<br> र्बालैर्यथा रविसुताप्रभवैश्च नूनम् ॥ ८ | [तीव्र धारके वेगसे] कटे हुए तटवाली उस नदीमें मनुष्योंके केशयुक्त इधर-उधर बिखरे मस्तक, खेलनेमें तत्पर बालकोंद्वारा यमुनामें फेंके गये तुम्बीफलोंके समान प्रतीत हो रहे थे ॥ ८ ॥ |
| वीरं मृतं भुवि गतं पतितं रथाद्वै<br> गृध्रः पलार्थमुपरि भ्रमतीति मन्ये ।<br>जीवोऽप्यसौ निजशरीरमवेक्ष्य कान्तं<br> काङ्क्षत्यहोऽतिविवशोऽपि पुनः प्रवेष्टुम् ॥ ९ | रथसे गिरे हुए किसी मृत वीरको पृथ्वीपर पड़ा हुआ देखकर मांसकी इच्छासे गीध उसके ऊपर मँडराने लगता था, इससे ऐसा प्रतीत होता था मानो उस वीरका जीव अपने शरीरको अति सुन्दर देखकर अत्यन्त विवश हो उसमें पुनः प्रवेश करनेकी इच्छा कर रहा हो ॥ ९ ॥ |
| आजौ हतोऽपि नृवरः सुविमानरूढः<br> स्वाङ्के स्थितां सुरवधूं प्रवदत्यभीष्टम् ।<br>पश्याधुना मम शरीरमिदं पृथिव्यां<br> बाणाहतं निपतितं करभोरु कान्तम् ॥ १० | युद्धभूमिमें हत कोई वीर योद्धा सुन्दर विमानमें आरूढ़ होकर अपनी गोदमें बैठी हुई किसी देवांगनासे अपना मनोभाव इस प्रकार व्यक्त करता था—हे करभोरु! इस समय बाणोंसे आहत होकर धरतीपर पड़े हुए मेरे इस कान्तियुक्त शरीरको देखो ॥ १० ॥ |
| एको हतस्तु रिपुणैव गतोऽन्तरिक्षं<br> देवाङ्गनां समधिगम्य युतो विमाने ।<br>तावत्प्रिया हुतवहे सुसमर्प्य देहं<br> जग्राह कान्तमबला सबला स्वकीया ॥ ११ | शत्रुके द्वारा मारा गया एक वीर ज्यों ही अन्तरिक्षमें पहुँचा और अप्सराके पास जाकर विमानमें बैठा, त्यों ही उसकी अपनी प्रिय स्त्री अपना शरीर अग्निको भलीभाँति समर्पित करके पुनः दिव्य शरीर पाकर अपने पतिके पास जा पहुँची ॥ ११ ॥ |
| ३१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| युद्धे मृतौ च सुभटौ दिवि सङ्गतौ ता-<br>वन्योन्यशस्त्रनिहतौ सह सम्प्रयातौ।<br>तत्रैव जघ्नतुरलं परमाहितास्त्रा-<br>वेकाप्सरोऽर्थविहतौ कलहाकुलौ च॥ १२ | उस युद्धमें दो वीर परस्पर एक-दूसरेके शस्त्र-प्रहारसे आहत होकर मर गये और साथ-साथ ही स्वर्गलोकमें पहुँचे। वहाँपर भी एक अप्सराको प्राप्त करनेके लिये वे दोनों वीर शस्त्रयुक्त होकर एक-दूसरेको मारनेहेतु युद्ध करने लगे॥ १२॥ |
| कश्चिद्युवा समधिगम्य सुराङ्गनां वै<br>रूपाधिकां गुणवतीं किल भक्तियुक्तः।<br>स्वीयान् गुणान्प्रवितानान्प्रवदंस्तदासौ<br>तां प्रेमदामनुचकार च योगयुक्तः॥ १३ | कोई अनुरागमय युवा वीर अतिशय रूपवती तथा गुणवती अप्सराको प्राप्त करके अत्यन्त बढ़ा-चढ़ाकर अपने गुणोंका वर्णन करते हुए उसके प्रति भक्तिपरायण होकर प्रयत्नपूर्वक उस प्रेमदायिनीके गुण आदिका अनुकरण करने लगा॥ १३॥ |
| भौमं रजोऽतिविततं दिवि संस्थितञ्च<br>रात्रिं चकार तरणिञ्च समावृणोद्यत्।<br>मग्नं तदेव रुधिराम्बुनिधावकस्मात्<br>प्रादुर्बभूव रविरप्यतिकान्तियुक्तः॥ १४ | घोर युद्धके कारण रणभूमिसे उड़ी हुई अत्यधिक धूलने अन्तरिक्षस्थित सूर्यको ढक दिया और दिनमें ही रात हो गयी। पुनः वही धूल जब अथाह रक्त-सिन्धुमें विलीन हो जाती तब अत्यन्त प्रभाववाले सूर्य अचानक प्रकट हो जाते॥ १४॥ |
| कश्चिद् गतस्तु गगनं किल देवकन्यां<br>सम्प्राप्य चारुवदनां किल भक्तियुक्ताम्।<br>नाङ्गीचकार चतुरो व्रतनाशभीतो<br>यास्यत्ययं मम वृथा ह्यनुकूलशब्दः॥ १५ | कोई युवक वीर युद्धमें मरकर स्वर्ग पहुँचा तो उसे एक सुन्दर रूपवाली देवकन्या मिली, जो उसके ऊपर आसक्त हो गयी। किंतु ब्रह्मचर्यव्रतके नाश होनेसे भयभीत उस चतुर वीरने उसे स्वीकार नहीं किया; [उसने सोचा कि ऐसा करनेसे] मेरे अनुरूप यह ब्रह्मचारी शब्द व्यर्थ हो जायगा॥ १५॥ |
| सङ्ग्रामे संवृते तत्र युधाजित्पृथिवीपतिः।<br>जघान वीरसेनं तं बाणैस्तीव्रैः सुदारुणैः॥ १६ | तदनन्तर घोर संग्राम छिड़ जानेपर राजा युधाजित्ने अपने तीक्ष्ण तथा अत्यन्त भीषण बाणोंसे वीरसेनको मार डाला॥ १६॥ |
| निहतः स पपातोर्व्यां छिन्नमूर्धा महीपतिः।<br>प्रभग्नं तद्बलं सर्वं निर्गतं च चतुर्दिशम्॥ १७ | इस प्रकार कटे मस्तकवाले महाराज वीरसेन पृथ्वीपर गिर पड़े। उनकी सम्पूर्ण सेना नष्ट हो गयी और चारों दिशाओंमें भाग गयी॥ १७॥ |
| मनोरमा हतं श्रुत्वा पितरं रणमूर्धनि।<br>भयत्रस्ताथ सञ्जाता पितुर्वैरमनुस्मरन्॥ १८<br>हनिष्यति युधाजिद्वै पुत्रं मम दुराशयः।<br>राज्यलोभेन पापात्मा सेति चिन्तापराभवत्॥ १९ | अपने पिता वीरसेनको समरांगणमें मारा गया सुनकर तथा अपने पिताके वैरका स्मरण करते हुए मनोरमा भयसे व्याकुल हो गई। वह इस चिन्तामें पड़ गई कि बुरे विचारोंवाला वह पापी युधाजित् राज्यके लोभसे मेरे पुत्रको अवश्य ही मार डालेगा॥ १८-१९॥ |
| किं करोमि क्व गच्छामि पिता मे निहतो रणे।<br>भर्ता चापि मृतोऽद्यैव पुत्रोऽयं मम बालकः॥ २० | अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे पिताजी युद्धमें मारे गये तथा पतिदेव भी मर चुके हैं और मेरा यह पुत्र अभी बालक ही है॥ २०॥ |
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३१९
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लोभोऽतीव च पापिष्ठस्तेन को न वशीकृतः।<br>किं न कुर्यात्तदाविष्टः पापं पार्थिवसत्तमः॥ २१<br><br>पितरं मातरं भ्रातॄन्गुरून्स्वजनबान्धवान्।<br>हन्ति लोभसमाविष्टो जनो नात्र विचारणा॥ २२<br><br>अभक्ष्यभक्षणं लोभादगम्यागमनं तथा।<br>करोति किल तृष्णार्तो धर्मत्यागं तथा पुनः॥ २३ | लोभ बड़ा ही पापी होता है, इसने किसको अपने वशमें नहीं किया। लोभसे ग्रस्त हो जानेपर श्रेष्ठ राजा भी कौन-सा पाप नहीं कर सकता। लोभसे अभिभूत मनुष्य अपने माता-पिता, भाई, गुरु तथा बन्धु-बान्धवोंको भी मार डालता है; इसमें सन्देह नहीं है। लोभके कारण मनुष्य अभक्ष्यका भक्षण तथा अगम्या स्त्रीके साथ गमन भी कर लेता है; यहाँतक कि लोभसे व्याकुल होकर वह धर्मका त्याग भी कर देता है॥ २१—२३॥ |
| न सहायोऽस्ति मे कश्चिन्नगरेऽत्र महाबलः।<br>यदाधारे स्थिता चाहं पालयामि सुतं शुभम्॥ २४ | अब इस नगरमें कोई बलवान् पुरुष मुझे सहायता देनेवाला भी नहीं रह गया, जिसके आश्रयमें रहकर मैं अपने सुन्दर पुत्रका पालन कर सकूँ॥ २४॥ |
| हते पुत्रे नृपेणाद्य किं करिष्याम्यहं पुनः।<br>न मे त्रातास्ति भुवने येन वै सुस्थिता ह्यहम्॥ २५ | यदि राजा युधाजित् मेरे पुत्रको मार डाले, तो मैं फिर क्या करूँगी? इस संसारमें मेरा कोई रक्षक नहीं है, जिसके सहारे मैं निश्चिन्त रह सकूँ?॥ २५॥ |
| सापि वैरयुता कामं सपत्नी सर्वदा भवेत्।<br>लीलावती न मे पुत्रे भविष्यति दयावती॥ २६ | मेरी सौत लीलावती भी सदा मुझसे वैरभाव रखती है, अतः वह भी मेरे पुत्रपर दया नहीं करेगी॥ २६॥ |
| युधाजिति समायाते न मे निःसरणं भवेत्।<br>ज्ञात्वा बालं सुतं सोऽद्य कारागारं नयिष्यति॥ २७ | युधाजित्के रणभूमिसे लौटकर आ जानेपर मेरा यहाँसे निकल भागना सम्भव नहीं हो सकेगा; वह मेरे पुत्रको बालक जानकर उसे कारागारमें डाल देगा॥ २७॥ |
| श्रूयते हि पुरेन्द्रेण मातुर्गर्भगतः शिशुः।<br>कृन्तितः सप्तधा पश्चात्कृतास्ते सप्त सप्तधा॥ २८<br><br>प्रविश्य चोदरं मातुः करे कृत्वल्पकं पविम्।<br>एकोनपञ्चाशदपि तेऽभवन्मरुतो दिवि॥ २९ | सुना जाता है कि पूर्वकालमें इन्द्रने अपने वज्रको अत्यन्त छोटा बनाकर अपनी सौतेली माता दितिके गर्भमें प्रवेश करके गर्भस्थ शिशुको काटकर उसके सात टुकड़े कर दिये थे। इसके बाद उसने पुनः एक-एक टुकड़ेके सात-सात खण्ड कर दिये थे। वे ही आगे चलकर देवलोकमें उनचास मरुत्के रूपमें प्रतिष्ठित हुए॥ २८—२९॥ |
| सपत्न्यै गरलं दत्तं सपत्न्या नृपभार्यया।<br>गर्भनाशार्थमुद्दिश्य पुरैतद्वै मया श्रुतम्॥ ३०<br><br>जातस्तु बालकः पश्चाद्देहे विषयुतः किल।<br>तेनासौ सगरो नाम विख्यातो भुवि मण्डले॥ ३१ | मैंने यह भी सुना है कि पूर्वकालमें एक राजाकी किसी रानीने अपनी सौतके गर्भको नष्ट करनेके उद्देश्यसे उसे विष दे दिया था। कुछ समय बीतनेपर वह बालक विषके साथ उत्पन्न हुआ, इसीसे वह भूमण्डलपर ‘सगर’ नामसे प्रसिद्ध हो गया॥ ३०—३१॥ |
| जीवमानोऽथ भर्ता वै कैकेय्या नृपभार्यया।<br>रामः प्रव्राजितो ज्येष्ठो मृतो दशरथो नृपः॥ ३२ | महाराज दशरथकी भार्या कैकेयीने पतिके जीवनकालमें ही उनके ज्येष्ठ पुत्र रामचन्द्रको वनवास दे दिया था, जिसके फलस्वरूप राजा दशरथकी मृत्यु भी हो गयी॥ ३२॥ |
३२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मन्त्रिणस्त्ववशाः कामं ये मे पुत्रं सुदर्शनम्।<br>राजानं कर्तुकामा वै युधाजिद्वशगाश्च ते॥ ३३<br><br>न मे भ्राता तथा शूरो यो मां बन्धात्प्रमोचयेत्।<br>महत्कष्टं च सम्प्राप्तं मया वै दैवयोगतः॥ ३४<br><br>उद्यमः सर्वथा कार्यः सिद्धिर्दैवाद्धि जायते।<br>उपायं पुत्ररक्षार्थं करोम्यद्य त्वरान्विता॥ ३५ | जो मन्त्री मेरे पुत्र सुदर्शनको राजा बनाना चाहते थे, वे भी अब विवश होकर युधाजित्के अधीन हो गये हैं। मेरा भाई भी ऐसा योद्धा नहीं है, जो मुझे बन्धनसे छुड़ा सके। दैवयोगसे मैं महान् संकटमें पड़ गयी हूँ। फिर भी उद्योग तो सर्वथा करना ही चाहिये, सफलता तो दैवके आधीन है। अतः अब मैं अपने पुत्रकी रक्षाके लिये शीघ्र ही कोई उपाय करूँगी॥ ३३—३५॥ |
| इति सञ्चिन्त्य सा बाला विदल्लं चातिमानिनम्।<br>निपुणं सर्वकार्येषु चिन्त्यं मन्त्रिवरोत्तमम्॥ ३६<br><br>समाहूय तमेकान्ते प्रोवाच बहुदुःखिता।<br>गृहीत्वा बालकं हस्ते रुदती दीनमानसा॥ ३७<br><br>पिता मे निहतः संख्ये पुत्रोऽयं बालकस्तथा।<br>युधाजिद् बलवान् राजा किं विधेयं वदस्व मे॥ ३८ | ऐसा सोचकर वह रानी अतिसम्मानित, सभी कार्योंमें दक्ष तथा विचार-कुशल श्रेष्ठ मन्त्रिप्रवर विदल्लको बुलवाकर उन्हें एकान्तमें ले गयी और बालकको हाथमें लेकर रोती हुई दीन मनवाली उस मनोरमाने अत्यन्त दुःखित होकर उनसे कहा—मेरे पिता युद्धमें मारे गये और मेरा यह पुत्र अभी अबोध बालक है। राजा युधाजित् बलवान् हैं। [ऐसी परिस्थितिमें] मुझे क्या करना चाहिये? मुझे बतायें॥ ३६—३८॥ |
| तामुवाच विदल्लोऽसौ नात्र स्थातव्यमेव च।<br>गमिष्यामो वने कामं वाराणस्याः पुनः किल॥ ३९<br><br>तत्र मे मातुलः श्रीमान्वर्तते बलवत्तरः।<br>सुबाहुरिति विख्यातो रक्षिता स भविष्यति॥ ४० | तब विदल्लने उससे कहा—अब यहाँ नहीं रहना चाहिये, हमलोग यहाँसे वाराणसीके वनमें चलेंगे। वहाँ सुबाहु नामसे विख्यात मेरे मामा रहते हैं। वे समृद्धिशाली तथा महाबलशाली हैं; वे ही हमारे रक्षक होंगे॥ ३९-४०॥ |
| युधाजिद्दर्शनोत्कण्ठमनसा नगराद् बहिः।<br>निर्गत्य रथमारुह्य गन्तव्यं नात्र संशयः॥ ४१ | मनमें युधाजित्के दर्शनकी लालसासे नगरसे बाहर निकल चलना चाहिये और रथपर सवार हो प्रस्थान कर देना चाहिये; इसमें शंकाकी आवश्यकता नहीं है॥ ४१॥ |
| इत्युक्ता तेन सा राज्ञी गत्वा लीलावतीं प्रति।<br>उवाच पितरं द्रष्टुं गच्छाम्यद्य सुलोचने॥ ४२ | विदल्लके ऐसा कहनेपर रानी मनोरमा लीलावतीके पास गयी और बोली—हे सुनयने! मैं [तुम्हारे] पिताजीका दर्शन करने जा रही हूँ॥ ४२॥ |
| इत्युक्त्वा रथमारुह्य सैरन्ध्रीसंयुता तदा।<br>विदल्लेन च संयुक्ता निःसृता नगराद् बहिः॥ ४३<br><br>त्रस्ता ह्यार्तातिकृपणा पितुः शोकसमाकुला।<br>दृष्ट्वा युधाजितं भूपं पितरं गतजीवितम्॥ ४४<br><br>संस्कार्य च त्वरायुक्ता वेपमाना भयाकुला।<br>दिनद्वयेन सम्प्राप्ता राज्ञी भागीरथी तटम्॥ ४५ | ऐसा कहकर मनोरमा एक दासी और मन्त्री विदल्लको साथ लेकर रथपर सवार हो नगरसे बाहर निकल गयी। उस समय बहुत डरी हुई, दुःखित, अत्यन्त दीन तथा पिताके मृत्युजन्य शोकसे व्याकुल वह मनोरमा राजा युधाजित्से मिलकर तत्काल अपने मृत पिताका दाहसंस्कार कराकर भयसे व्याकुल हो काँपती हुई दो दिनोंमें गंगाजीके तटपर पहुँच गयी॥ ४३—४५॥ |
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३२१
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३२१
| निषादैर्लुणि्ठता तत्र गृहीतं सकलं वसु।<br>रथञ्चापि गृहीत्वा ते निर्गता दस्यवः शठाः॥ ४६<br><br>रुदती सुतमादाय चारुवस्त्रा मनोरमा।<br>निर्ययौ जाह्नवीतीरे सैरन्ध्रीकरलम्बिता॥ ४७<br><br>आरुह्य च भयाच्छीघ्रमुडुपं सा भयाकुला।<br>तीर्त्वा भागीरथीं पुण्यां ययौ त्रिकूटपर्वतम्॥ ४८ | वहाँके निषादोंने उसे लूट लिया तथा उसका सारा धन और रथ छीन लिया। सब कुछ लेकर वे धूर्त दस्यु चले गये। तब वह रोती हुई अपने पुत्रको लेकर सैरंध्रीके हाथका सहारा लेकर किसी प्रकार गंगाके तटपर गयी और एक छोटी-सी नौकापर डरती हुई बैठकर पवित्र गंगाको पार करके वह भयाक्रान्त मनोरमा त्रिकूटपर्वतपर पहुँच गयी॥ ४६—४८॥ |
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| भारद्वाजाश्रमं प्राप्ता त्वरया च भयाकुला।<br>संवीक्ष्य तापसांस्तत्र सञ्जाता निर्भया तदा॥ ४९<br><br>मुनिना सा ततः पृष्टा कासि कस्य परिग्रहः।<br>कष्टेनात्र कथं प्राप्ता सत्यं ब्रूहि शुचिस्मिते॥ ५०<br><br>देवी वा मानुषी वासि बालपुत्रा वने कथम्।<br>राज्यभ्रष्टेव वामोरु भासि त्वं कमलेक्षणे॥ ५१ | वह भयभीत मनोरमा भारद्वाजमुनिके आश्रममें शीघ्रतासे पहुँची। तब वहाँ तपस्वियोंको देखकर वह निर्भय हो गयी। तदनन्तर भारद्वाजमुनिने पूछा—हे शुचिस्मिते! तुम कौन हो, किसकी पत्नी हो? इतने कष्टसे तुम यहाँ कैसे आ गयी हो? मुझसे सत्य कहो। तुम कोई देवी हो अथवा मानवी हो। अपने इस बालक पुत्रके साथ वनमें क्यों विचरण कर रही हो? हे सुन्दरि! हे कमलनयने! तुम राज्यभ्रष्ट-जैसी प्रतीत हो रही हो॥ ४९—५१॥ |
| एवं सा मुनिना पृष्टा नोवाच वरवर्णिनी।<br>रुदती दुःखसन्तप्ता विदल्लं च समादिशत्॥ ५२ | मुनिके पूछनेपर उस रूपवती रानीने कुछ भी उत्तर नहीं दिया और दुःखसे सन्तप्त होकर रोती हुई उसने अपने मन्त्री विदल्लको सारी बातें बतानेके लिये संकेत किया॥ ५२॥ |
| विदल्लस्तमुवाचेदं ध्रुवसन्धिर्नृपोत्तमः।<br>तस्य भार्या धर्मपत्नी नाम्ना चेयं मनोरमा॥ ५३ | तब विदल्लने मुनिसे कहा—ध्रुवसन्धि एक श्रेष्ठ नरेश थे। ये उन्हींकी मनोरमा नामवाली धर्मपत्नी हैं॥ ५३॥ |
| सिंहेन निहतो राजा सूर्यवंशी महाबलः।<br>पुत्रोऽयं नृपतेस्तस्य नाम्ना चैव सुदर्शनः॥ ५४ | सूर्यवंशमें उत्पन्न उन महाबली महाराजको सिंहने मार डाला। सुदर्शन नामका यह बालक उन्हीं राजाका पुत्र है॥ ५४॥ |
| अस्याः पितातिधर्मात्मा दौहित्रार्थं मृतो रणे।<br>युधाजिद्द्रव्यसन्त्रस्ता सम्प्राप्ता विजने वने॥ ५५ | इनके अत्यन्त धर्मात्मा पिता अपने इसी दौहित्रके लिये संग्राममें मारे गये। अतएव युधाजित्के भयसे संत्रस्त होकर ये इस निर्जन वनमें आयी हुई हैं॥ ५५॥ |
| त्वामेव शरणं प्राप्ता बालपुत्रा नृपात्मजा।<br>त्राता भव महाभाग त्वमस्या मुनिसत्तम॥ ५६ | हे महाभाग! हे मुनिश्रेष्ठ! अबोध पुत्रवाली ये राजपुत्री अब आपकी शरणमें आयी हैं। अतः आप इनकी रक्षा कीजिये॥ ५६॥ |
| आर्तस्य रक्षणे पुण्यं यज्ञाधिकमुदाहृतम्।<br>भयत्रस्तस्य दीनस्य विशेषफलदं स्मृतम्॥ ५७ | किसी दुःखी प्राणीकी रक्षा करनेमें यज्ञ करनेसे भी अधिक पुण्य बताया गया है। भयभीत तथा दीनकी रक्षाको तो और भी अधिक फलदायक कहा गया है॥ ५७॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 11 A