देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० १२] तृतीय स्कन्ध ३०३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वेदीं च विशदां तत्र मनसा परिकल्पयेत्।<br>अग्नयोऽपि तथा स्थाप्या विधिवन्मनसा किल॥ ४५ | उसमें मन-ही-मन एक विशाल यज्ञवेदीकी कल्पना करे और उसपर मानसिक अग्निकी विधिपूर्वक स्थापना करे॥ ४४-४५॥ |
| ब्राह्मणानाञ्च वरणं तथैव प्रतिपाद्य च।<br>ब्रह्माध्वर्युस्तथा होता प्रस्तोता विधिपूर्वकम्॥ ४६<br><br>उद्गाता प्रतिहर्ता च सभ्याश्चान्ये यथाविधि।<br>पूजनीया प्रयत्नेन मनसैव द्विजोत्तमाः॥ ४७ | उसी प्रकार [मनमें] ब्राह्मणोंका वरण करके ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता, प्रस्तोता, उद्गाता, प्रतिहर्ता तथा अन्य सभासदोंको नियुक्त करके यथोचित रूपसे प्रयत्नपूर्वक मनसे उनकी पूजा करनी चाहिये॥ ४६-४७॥ |
| प्राणोऽपानस्तथा व्यानः समानोदान एव च।<br>पावकाः पञ्च एवैते स्थाप्या वेद्यां विधानतः॥ ४८ | प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान—इन पाँचों अग्नियोंको यज्ञवेदीपर विधानपूर्वक स्थापित करना चाहिये॥ ४८॥ |
| गार्हपत्यस्तदा प्राणोऽपानश्चाहवनीयकः।<br>दक्षिणाग्निस्तथा व्यानः समानश्चावसथ्यकः॥ ४९<br><br>सभ्योदानः स्मृता होते पावकाः परमोत्कटाः।<br>द्रव्यं च मनसा भाव्यं निर्गुणं परमं शुचि॥ ५० | उनमें प्राणको गार्हपत्य अग्नि, अपानको आहवनीय अग्नि, व्यानको दक्षिणाग्नि, समानको आवसथ्य अग्नि तथा उदानको सभ्य अग्नि कहा गया है। ये पाँचों परम तेजस्वी हैं। इस यज्ञमें मानसिक रूपसे ही दोषरहित तथा परम पवित्र सामग्रियोंकी भी कल्पना करनी चाहिये॥ ४९-५०॥ |
| मन एव तदा होता यजमानस्तथैव तत्।<br>यज्ञाधिदेवता ब्रह्म निर्गुणं च सनातनम्॥ ५१ | इस यज्ञमें होता तथा यजमान दोनोंके रूपमें मन ही होता है। निर्गुण तथा अविनाशी ब्रह्म इस यज्ञमें अधिदेवता होते हैं॥ ५१॥ |
| फलदा निर्गुणा शक्तिः सदा निर्वेददा शिवा।<br>ब्रह्मविद्याखिलाधारा व्याप्य सर्वत्र संस्थिता॥ ५२ | निर्गुणा पराशक्ति सभी फलोंको प्रदान करनेवाली हैं। उन वैराग्यदायिनी, कल्याणकारिणी, ब्रह्मविद्या, समस्त जगत्की आधारस्वरूपा तथा जगत्को व्याप्त करके सर्वत्र विराजमान रहनेवाली आदिशक्ति-स्वरूपा भगवतीको प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे द्विजको मनःकल्पित हवन-सामग्रियोंकी आहुति अपने प्राणरूपी अग्निमें देनी चाहिये॥ ५२ १/२॥ |
| तदुद्देशेन तद् द्रव्यं हुनेत्प्राणाग्निषु द्विजः।<br>पश्चाच्चित्तं निरालम्बं कृत्वा प्राणानपि प्रभो॥ ५३ | हे प्रभो! मानस हवनके पश्चात् अपने मनको आलम्बनरहित करके कुण्डलिनीके मुखमार्गसे अर्थात् सुषुम्ना रन्ध्रद्वारा शाश्वत ब्रह्ममें अपने प्राणोंकी भी आहुति दे देनी चाहिये॥ ५३ १/२॥ |
| कुण्डलीमुखमार्गेण हुनेद् ब्रह्मणि शाश्वते।<br>स्वानुभूत्या स्वयं साक्षात्वात्मभूतां महेश्वरीम्॥ ५४ | अपनी अनुभूतिसे स्वयंका साक्षात्कार करके तथा महेश्वरीको अपनी आत्मस्वरूपा जानकर समाधियोगसे शान्तचित्त होकर ध्यान करना चाहिये॥ ५४ १/२॥ |
| समाधिनैव योगेन ध्यायेच्चेतस्यनाकुलः।<br>सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि॥ ५५ | इस प्रकार जब वह साधक सभी प्राणियोंमें अपने-आपको तथा अपनेमें सभी प्राणियोंको देखने लगता है, तब वह भूतात्मा उन कल्याणस्वरूपा |