भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 310
अ० १२ ]तृतीय स्कन्ध३०१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कृते कर्मणि चेत्सिद्धिर्विपरीता यदा भवेत्।<br>वैगुण्यं कल्पनीयं स्यात्प्राज्ञैः पण्डितमौलिभिः॥ २२कर्म करनेपर भी यदि विपरीत परिणाम प्राप्त होता है तो पण्डितशिरोमणि विद्वानोंको सोचना चाहिये कि कार्य करनेमें कोई कमी अवश्य रह गयी थी॥ २२॥
तत्कर्म बहुधा प्रोक्तं विद्वद्भिः कर्मकारिभिः।<br>कर्तृभेदान्मन्त्रभेदाद् द्रव्यभेदात्तथा पुनः॥ २३कर्मशील विद्वानोंने कर्तृभेद, मन्त्रभेद तथा द्रव्यभेदसे उस कर्मको अनेक प्रकारवाला बताया है॥ २३॥
यथा मघवता पूर्वं विश्वरूपो वृतो गुरुः।<br>विपरीतं कृतं तेन कर्म मातृहिताय वै॥ २४<br><br>देवेभ्यो दानवेभ्यस्तु स्वस्तीत्युक्त्वा पुनः पुनः।<br>असुरा मातृपक्षीयाः कृतं तेषाञ्च रक्षणम्॥ २५<br><br>दैत्यान् दृष्ट्वातिसम्पुष्टांश्चुकोप मघवा तदा।<br>शिरांसि तस्य वज्रेण चिच्छेद तरसा हरिः॥ २६पूर्वकालमें इन्द्रने यज्ञमें आचार्यके रूपमें विश्वरूपका वरण किया था। उस विश्वरूपने अपने मातृपक्षके दानवोंके हितार्थ विपरीत कार्य किया। देवताओं तथा दानवों दोनोंका कल्याण हो—ऐसा बार-बार कहकर उसने मातृपक्षके जो असुर थे, उनकी भी रक्षा की। तदनन्तर दानवोंको अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट देखकर इन्द्र कुपित हो उठे और उन्होंने वज्रसे तत्काल उस विश्वरूपके सिर काट दिये॥ २४–२६॥
क्रियावैगुण्यमत्रैव कर्तृभेदादसंशयम्।<br>नोचेत्पञ्चालराजेन रोषेणापि कृता क्रिया॥ २७<br><br>भारद्वाजविनाशाय पुत्रस्योत्पादनाय च।<br>धृष्टद्युम्नः समुत्पन्नो वेदिमध्याच्च द्रौपदी॥ २८इससे यह निस्सन्देह सिद्ध हो जाता है कि कर्ताके भेदसे विपरीत फल हो जाता है। यदि इसे न मानें तो ठीक नहीं; क्योंकि पञ्चालनरेश द्रुपदने रोषपूर्वक द्रोणाचार्यके नाशके निमित्त एक पुत्र उत्पन्न होनेके लिये यज्ञ किया था। [इसके परिणामस्वरूप] यज्ञवेदीके मध्यभागसे धृष्टद्युम्न तथा द्रौपदी—ये दोनों उत्पन्न हुए॥ २७-२८॥
पुरा दशरथेनापि पुत्रेष्टिस्तु कृता यदा।<br>अपुत्रस्य सुतास्तस्य चत्वारः सम्प्रजज्ञिरे॥ २९पूर्वकालमें जब महाराज दशरथने पुत्रेष्टि-यज्ञ किया तो उन पुत्रहीन राजा दशरथके भी चार पुत्र उत्पन्न हुए॥ २९॥
अतः क्रिया कृता युक्त्या सिद्धिदा सर्वथा भवेत्।<br>अयुक्त्या विपरीता स्यात्सर्वथा नृपसत्तम॥ ३०अतः हे नृपश्रेष्ठ! युक्तिपूर्वक किया गया कोई भी कार्य हर प्रकारसे सिद्धि प्रदान करनेवाला होता है और युक्तिपूर्वक न किया गया कार्य सर्वथा विपरीत फल प्रदान करनेवाला होता है॥ ३०॥
पाण्डवानां यथा यज्ञे किञ्चिद्वैगुण्ययोगतः।<br>विपरीतं फलं प्राप्तं निर्जितास्ते दुरोदरे॥ ३१<br><br>सत्यवादी तथा राजन् धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः।<br>द्रौपदी च तथा साध्वी तथान्येऽप्यनुजाः शुभाः॥ ३२<br><br>कुद्रव्ययोगाद्वैगुण्यं समुत्पन्नं मखेऽथवा।<br>साभिमानैः कृताद्वापि दूषणं समुपस्थितम्॥ ३३जैसे पाण्डवोंके यज्ञमें किसी दोषके कारण ही उन्हें विपरीत फल मिला और जुएमें वे हार गये। हे राजन्! युधिष्ठिर सत्यवादी तथा धर्मपुत्र थे, द्रौपदी भी एक पतिव्रता स्त्री थी एवं युधिष्ठिरके अन्य छोटे भाई भी पुण्यात्मा थे, किंतु अन्यायोपार्जित द्रव्योंके प्रयोगके कारण उस यज्ञमें वैगुण्य उत्पन्न हुआ अथवा उन्होंने अभिमानपूर्वक यज्ञ किया था, जिससे दोष उत्पन्न हुआ॥ ३१—३३॥