भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

| २८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- | | नारद उवाच<br>एवं प्रकृतिजाः प्रोक्ता गुणाः सत्यवतीसुत ॥ ३१<br>विश्वस्य कारणं ते वै मया पूर्वं यथाश्रुतम् ।<br><br>व्यास उवाच<br>इत्युक्तं नारदेनाथ मम सर्वं सविस्तरम् ॥ ३२<br>गुणानां लक्षणं सर्वं कार्यं चैव विभागशः ।<br>आराध्या परमा शक्तिर्यया सर्वमिदं ततम् ॥ ३३<br>सगुणा निर्गुणा चैव कार्यभेदे सदैव हि ।<br>अकर्ता पुरुषः पूर्णो निरीहः परमोऽव्ययः ॥ ३४<br>करोत्येषा महामाया विश्वं सदसदात्मकम् ।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः सूर्यश्चन्द्रः शचीपतिः ॥ ३५<br>अश्विनौ वसवस्त्वष्टा कुबेरो यादसां पतिः ।<br>वह्निवायुस्तथा पूषा सेनानीश्च विनायकः ॥ ३६<br>सर्वे शक्तियुताः शक्ताः कर्तुं कार्याणि स्वानि च ।<br>अन्यथा तेऽप्यशक्ता वै प्रस्पन्दितुमनीश्वराः ॥ ३७ | **नारदजी बोले—**हे सत्यवतीसुत व्यासजी! ये सत्त्वादि तीनों गुण भी प्रकृतिसे उत्पन्न कहे गये हैं और ये जगत्के कारण हैं, जैसा मैंने पहले भी सुना है॥ ३१ १/२ ॥<br><br>व्यासजी बोले—[हे राजन्!] इस प्रकार नारदजीने विस्तारपूर्वक गुणोंके लक्षण और उनके विभागोंके सहित कार्योंको भी मुझे बतलाया है। सर्वदा उन्हीं परमशक्तिकी आराधना करनी चाहिये, जिनसे यह समस्त संसार व्याप्त है। वे भगवती कार्यभेदसे सगुणा और निर्गुणा दोनों हैं। वह परमपुरुष तो अकर्ता, पूर्ण, निःस्पृह तथा परम अविनाशी है; ये महामाया ही सत् और असद्रूप जगत्की रचना करती हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार, आठों वसु, विश्वकर्मा, कुबेर, वरुण, अग्नि, वायु, पूषा, कुमार कार्तिकेय और गणपति—ये सभी देवता उन्हीं महामायाकी शक्तिसे युक्त होकर अपने-अपने कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। हे मुनीश्वरो! यदि ऐसा न हो तो वे हिलने-डुलनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते॥ ३२—३७॥ | | सा चैव कारणं राजन् जगतः परमेश्वरी ।<br>समाराधय तां भूप कुरु यज्ञं जनाधिप ॥ ३८<br>पूजनं परया भक्त्या तस्या एव विधानतः ।<br>महालक्ष्मीर्महाकाली तथा महासरस्वती ॥ ३९<br>ईश्वरी सर्वभूतानां सर्वकारणकारणम् ।<br>सर्वकामार्थदा शान्ता सुखसेव्या दयान्विता ॥ ४० | हे राजन्! वे परमेश्वरी ही इस जगत्की परम कारण हैं, अतः हे नरपते! अब आप उन्हींकी आराधना करें, उन्हींका यज्ञ करें और परम भक्तिके साथ विधिवत् उन्हींका पूजन करें। वे ही महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती हैं। वे सब जीवोंकी अधीश्वरी, समस्त कारणोंकी एकमात्र कारण, सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली, शान्तस्वरूपिणी, सुखपूर्वक सेवनीय तथा दयासे परिपूर्ण हैं॥ ३८—४०॥ | | नामोच्चारणमात्रेण वाञ्छितार्थफलप्रदा ।<br>देवैराराधिता पूर्वं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ॥ ४१<br>मोक्षकामैश्च विविधैस्तापसैर्विजितात्मभिः ।<br>अस्पष्टमपि यन्नाम प्रसङ्गेनापि भाषितम् ॥ ४२ | ये भगवती नामोच्चारणमात्रसे ही मनोवांछित फल देनेवाली हैं। पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवताओं तथा मोक्षकी कामना करनेवाले अनेक जितेन्द्रिय तपस्वियोंने उनकी आराधना की थी। किसी प्रसंगवश अस्पष्टरूपसे ही उच्चारित किया गया उनका नाम सर्वथा दुर्लभ मनोरथोंको भी पूर्ण कर देता है॥ ४१—४२ १/२ ॥ | | ददाति वाञ्छितानर्थान्दुर्लभानपि सर्वथा ।<br>ऐ ऐ इति भयार्तेन दृष्ट्वा व्याघ्रादिकं वने ॥ ४३ | हे नृपश्रेष्ठ! इस सम्बन्धमें एक दृष्टान्त है—सत्यव्रत नामके एक मुनिने वनमें व्याघ्रादि हिंसक पशुओंको देखकर भयसे पीड़ित होकर ‘ऐ-ऐ’ |