देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० ९ ] | तृतीय स्कन्ध | २८५ |
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| प्रोषितभर्तृकाणां वै मोहदं प्रवदन्त्यपि।<br>स्वभावस्था गुणाः सर्वे विपरीता विभान्ति वै॥ १९ | उसी प्रकार ये सत्त्वादि गुण अपनी स्वाभाविक परिस्थितिमें रहते हुए भी अन्य गुणोंसे मिलनेपर विपरीत दृष्टिगोचर होते हैं॥ १५—१९॥ | | लक्षणानि पुनस्तेषां शृणु पुत्र ब्रवीम्यहम्।<br>लघुप्रकाशकं सत्त्वं निर्मलं विशदं सदा॥ २० | हे पुत्र! अब मैं उन गुणोंके लक्षण पुनः बता रहा हूँ; सुनो। सत्त्वगुण सूक्ष्म, प्रकाशक, स्वच्छ, निर्मल एवं व्यापक होता है। जब मानवके सम्पूर्ण अंग और नेत्र आदि इन्द्रियाँ हल्के हों, मन निर्मल हो तथा वह उन राजस एवं तामस विषयोंको न ग्रहण करता हो, तब यह समझ लेना चाहिये कि शरीरमें अब सत्त्वगुण प्रधानरूपसे विद्यमान है। जब जिस किसीकी देहमें रजोगुण प्रधानरूपसे विद्यमान रहता है तब यह बार-बार जम्हाई, स्तम्भन, तन्द्रा तथा चंचलता उत्पन्न करता है। इसी प्रकार जब अत्यन्त कलह करनेका मन चाहता हो, अन्यत्र जानेकी इच्छा हो, चित्त चंचल हो और वाद-विवादमें उलझनेकी प्रवृत्ति हो, मनमें काम-भावनाका गहरा परदा पड़ जाय, तब यह समझ ले कि शरीरमें तमोगुणकी प्रधानता है। उस समय शरीरके अंग भारी हो जाते हैं, इन्द्रियाँ तामसिक भावोंके वशीभूत रहती हैं, चित्त विमूढ़ रहता है और वह निद्राकी इच्छा नहीं करता। हे नारद! इस प्रकार सभी गुणोंके लक्षण समझना चाहिये॥ २०—२५ १/२॥ | | यदाङ्गानि लघून्येव नेत्रादीनीन्द्रियाणि च।<br>निर्मलं च तथा चेतो गृह्णाति विषयान्न तान्॥ २१ | | | तदा सत्त्वं शरीरे वै मन्तव्यञ्च समुत्कटम्।<br>जृम्भां स्तम्भं च तन्द्रां च चलञ्चैव रजः पुनः॥ २२ | | | यदा तदुत्कटं जातं देहे यस्य च कस्यचित्।<br>कलिं मृगयते कर्तुं गन्तुं ग्रामान्तरं तथा॥ २३ | | | चलचित्तश्च सोऽत्यर्थं विवादे चोद्यतस्तथा।<br>गुरुमावरणं कामं तमो भवति तद्यदा॥ २४ | | | तदाङ्गानि गुरूण्याशु प्रभवन्त्यावृतानि च।<br>इन्द्रियाणि मनः शून्यं निद्रां नैवाभिवाञ्छति॥ २५ | | | गुणानां लक्षणान्येवं विज्ञेयानीह नारद। | | | नारद उवाच<br>विभिन्नलक्षणाः प्रोक्ताः पितामह गुणास्त्रयः॥ २६<br><br>कथमेकत्र संस्थाने कार्यं कुर्वन्ति शाश्वतम्।<br>परस्परं मिलित्वा हि विभिन्नाः शत्रवः किल॥ २७<br><br>एकत्रस्थाः कथं कार्यं कुर्वन्तीति वदस्व मे। | **नारदजी बोले—**हे पितामह! आपने तीनों गुणोंको भिन्न-भिन्न लक्षणोंवाला बताया, तो फिर ये एक स्थानमें होकर निरन्तर कार्य कैसे करते हैं? विपरीत होते हुए भी शत्रुरूप ये गुण एकत्र होकर परस्पर मिल करके किस प्रकार कार्य करते हैं; यह मुझे बताइये॥ २६—२७ १/२॥ | | ब्रह्मोवाच<br>शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि गुणास्ते दीपवृत्तयः॥ २८<br><br>प्रदीपश्च यथा कार्यं प्रकरोत्यर्थदर्शनम्।<br>वर्तिस्तैलं यथार्चिश्च विरुद्धाश्च परस्परम्॥ २९<br><br>विरुद्धं हि तथा तैलमग्निना सह सङ्गतम्।<br>तैलं वर्तिविरोध्येव पावकोऽपि परस्परम्॥ ३०<br>एकत्रस्थाः पदार्थानां प्रकुर्वन्ति प्रदर्शनम्। | **ब्रह्माजी बोले—**हे पुत्र! सुनो, मैं बताता हूँ। उन तीनों गुणोंका स्वभाव दीपकके समान है। जैसे दीपकमें तेल, बत्ती और अग्निशिखा तीनों परस्पर विरोधी धर्मवाले हैं, परंतु तीनोंके सहयोगसे ही दीपक वस्तुओं आदिका दर्शन कराता है। यद्यपि आगके साथ मिला हुआ तेल आगका विरोधी है और तेल बत्ती तथा अग्निका विरोधी है तथापि वे एकत्र होकर वस्तुओंका दर्शन कराते हैं॥ २८—३० १/२॥ |