भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 293
२८४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मातापित्रोस्तथा सैव बन्धुवर्गस्य प्रीतिदा।<br>दुःखं मोहं सपत्नीषु जनयत्यपि सैव हि॥ ७<br><br>एवं सत्त्वेन तेनैव स्त्रीत्वमापादितेन च।<br>रजस्तमसश्चैव जनिता वृत्तिरन्यथा॥ ८<br><br>रजसा स्त्रीकृतेनैव तमसा च तथा पुनः।<br>अन्योन्यस्य समायोगादन्यथा प्रतिभाति वै॥ ९लिये भी प्रीतिकर होती है, किंतु वही स्त्री अपनी सौतोंके मनमें दुःख और मोह उत्पन्न करती है। इसी प्रकार सत्त्वगुणके स्त्रीभावापन्न होनेपर रजोगुण और तमोगुणसे मिलनेपर भिन्न वृत्ति उत्पन्न होती है। ऐसे ही रजोगुण तथा तमोगुणके स्त्रीभावापन्न होनेपर एक-दूसरेके परस्पर संयोगके कारण विपरीत भावना प्रतीत होती है॥ ६-९॥
अवस्थानात्स्वभावेषु न वै जात्यन्तराणि च।<br>लक्ष्यन्ते विपरीतानि योगान्नारद कुत्रचित्॥ १०हे नारद! यदि ये तीनों गुण परस्पर मिश्रित न होते तो उनके स्वभावमें एक-सी ही प्रवृत्ति रहती, किंतु तीनों गुणोंमें मिश्रण होनेके कारण ही विभिन्नताएँ दिखायी देती हैं॥ १०॥
यथा रूपवती नारी यौवनेन विभूषिता।<br>लज्जामाधुर्ययुक्ता च तथा विनयसंयुता॥ ११<br><br>कामशास्त्रविधिज्ञा च धर्मशास्त्रेऽपि सम्मता।<br>भर्तुः प्रीतिकरी भूत्वा सपत्नीनां च दुःखदा॥ १२जैसे कोई रूपवती स्त्री यौवन, लज्जा, माधुर्य तथा विनयसे युक्त हो, साथ ही वह धर्मशास्त्रके अनुकूल हो तथा कामशास्त्रको जाननेवाली हो, तो वह अपने पतिके लिये प्रीतिकर होती है; किंतु सौतोंके लिये कष्ट देनेवाली होती है॥ ११-१२॥
मोहदुःखस्वभावस्था सत्त्वस्थेत्युच्यते जनैः।<br>तथा सत्त्वं विकुर्वाणमन्यभावं विभाति वै॥ १३[सौतोंके लिये] मोह तथा दुःख देनेवाली होनेपर भी कुछ लोगोंके द्वारा वह सत्त्वगुणी कही जाती है और सत्त्वगुणके अनेक शुभ कार्य करनेपर भी वह सौतोंको विपरीत भाववाली प्रतीत होती है॥ १३॥
चौरैरुपद्रुतानां हि साधूनां सुखदा भवेत्।<br>दुःखा मूढा च दस्यूनां सैव सेना तथागुणा॥ १४जैसे राजाकी सेना चोरोंसे पीड़ित सज्जनोंके लिये सुख देनेवाली होती है, किंतु वही सेना चोरोंके लिये दुःखदायिनी, मूढ़ तथा गुणहीन होती है॥ १४॥
विपरीतप्रतीतिं वै जनयन्ति स्वभावतः।<br>यथा च दुर्दिनं जातं महामेघघनावृतम्॥ १५<br><br>विद्युत्स्तनितसंयुक्तं तिमिरेणावगुण्ठितम्।<br>सिञ्चद्भूमिं प्रवर्षद्वै तमोरूपमुदाहृतम्॥ १६<br><br>यदेतत्कर्षकाणां वै तदेवातीव दुर्दिनम्।<br>बीजोपस्करयुक्तानां सुखदं प्रभवत्युत॥ १७<br><br>अप्रच्छन्नगृहाणाञ्च दुर्भागानां विशेषतः।<br>तृणकाष्ठगृहीतानां दुःखदं गृहमेधिनाम्॥ १८इससे प्रकट होता है कि स्वाभाविक गुण भी विपरीत लक्षणोंवाले दीख पड़ते हैं। जैसे किसी दिन जब चारों ओर काले-काले मेघ घिर आये हों, बिजली चमक रही हो, मेघ गरज रहे हों, अन्धकारसे आच्छादित हो और घनघोर वर्षाके कारण सूखी भूमि सिंच रही हो, तब भी लोग उसे तमोरूप गाढ़ान्धकारसे व्याप्त दुर्दिन नामसे ही पुकारते हैं। एक ओर वही दुर्दिन किसानोंको खेत जोतने तथा बीज बोनेकी सुविधा देनेके कारण सुखदायी प्रतीत होता है, किंतु दूसरी ओर वही दुर्दिन उन अभागे गृहस्थोंके लिये दुःखदायी हो जाता है, जिनके घर अभी छाये नहीं जा सके हैं और जो तृण, काष्ठ आदिके संग्रहमें व्यस्त हैं। साथ ही वही दुर्दिन उन स्त्रियोंके हृदयमें शोक उत्पन्न करता है, जिनके पति परदेश गये हों।