देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 289, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 289
| २८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सन्देहोऽत्र न कर्तव्यो ज्ञात्वेत्युक्तं मया वचः।<br>ज्ञातं तदनुभूतं यत्परिज्ञातं फले सति॥ १६ | सन्देह नहीं करना चाहिये। सम्यक् प्रकारसे जानकर ही मैंने यह बात कही है। मैंने पहले इसे जाना, तत्पश्चात् इसका अनुभव किया और पुनः परिणाम देखकर इसका परिज्ञान प्राप्त किया है॥ १५-१६॥ |
| श्रवणाद्दर्शनाच्चैव सद्येव महामते।<br>संस्कारानुभवाच्चैव परिज्ञातं न जायते॥ १७ | हे महामते! मात्र देख लेने, सुन लेने अथवा संस्कारजनित अपने अनुभवसे ही किसी भी वस्तुका तत्काल परिज्ञान नहीं हो जाता ॥ १७॥ |
| श्रुतं तीर्थं पवित्रञ्च श्रद्धोत्पन्ना च राजसी।<br>निर्गतस्तत्र तीर्थे वै दृष्टं चैव यथाश्रुतम्॥ १८<br><br>स्नातस्तत्र कृतं कृत्यं दत्तं दानं च राजसम्।<br>स्थितस्तत्र कियत्कालं रजोगुणसमावृतः॥ १९<br><br>रागद्वेषान्न निर्मुक्तः कामक्रोधसमावृतः।<br>पुनरेव गृहं प्राप्तो यथापूर्वं तथास्थितः॥ २० | जैसे किसी पवित्र तीर्थके विषयमें सुनकर किसी व्यक्तिके हृदयमें राजसी श्रद्धा उत्पन्न हो गयी और वह उस तीर्थमें चला गया। वहाँ पहुँचकर उसने वही देखा जैसा पहले सुना था। उस तीर्थमें उसने स्नान करके तीर्थकृत्य किया और राजसी दान भी किया। रजोगुणसे युक्त रहकर उस व्यक्तिने कुछ समयतक वहाँ तीर्थवास भी किया। किंतु ऐसा करके भी वह राग-द्वेषसे मुक्त नहीं हो पाया और काम-क्रोध आदि विकारोंसे आच्छादित ही रहा। पुनः अपने घर लौट आया और वह पूर्वकी भाँति वैसे ही रहने लगा॥ १८-२०॥ |
| श्रुतं च नानुभूतं वै तेन तीर्थं मुनीश्वर।<br>न प्राप्तं च फलं यस्मादश्रुतं विद्धि नारद॥ २१ | हे मुनीश्वर! उस व्यक्तिने तीर्थकी महिमा तो सुनी थी, किंतु उसका सम्यक् अनुभव नहीं किया। इसी कारण उसे तीर्थयात्राका कोई फल नहीं प्राप्त हुआ। अतः हे नारद! उसका सुनना न सुननेके बराबर समझें॥ २१॥ |
| निष्पापत्वं फलं विद्धि तीर्थस्य मुनिसत्तम।<br>कृषेः फलं यथा लोके निष्पन्नान्नस्य भक्षणम्॥ २२ | हे मुनिश्रेष्ठ! आप यह जान लें कि तीर्थयात्राका फल पापसे छुटकारा प्राप्त करना है; यह वैसे ही है जैसे संसारमें कृषिका फल उत्पादित अन्नका भक्षण है॥ २२॥ |
| पापदेहविकारा ये कामक्रोधादयः परे।<br>लोभो मोहस्तथा तृष्णा द्वेषो रागस्तथा मदः॥ २३<br><br>असूयेर्ष्याक्षमाशान्तिः पापान्येतानि नारद।<br>न निर्गतानि देहात्तु तावत्पापयुतो नरः॥ २४ | जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, तृष्णा, द्वेष, राग, मद, परदोषदर्शन, ईर्ष्या, सहनशीलताका अभाव और अशान्ति आदि हैं, वे पापमय शरीरके विकार हैं। हे नारद! जबतक ये पाप शरीरसे नहीं निकलते, तबतक मनुष्य पापी ही रहता है॥ २३-२४॥ |
| कृते तीर्थे यदैतानि देहान्न निर्गतानि चेत्।<br>निष्फलः श्रम एवैकः कर्षकस्य यथा तथा॥ २५ | तीर्थयात्रा करनेपर भी यदि ये पाप देहसे नहीं निकले तो तीर्थाटन करनेका वह परिश्रम उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे किसी किसानका। |
| श्रमेणापीडितं क्षेत्रं कृष्टा भूमिः सुदुर्घटा।<br>उप्तं बीजं महार्घं च हिता वृत्तिरुदाहृता॥ २६ | उस किसानने परिश्रमपूर्वक खेतको खोदा, अत्यन्त कठोर भूमिको जोता, उसमें महँगा बीज बोया और अन्य आवश्यक कार्य किये तथा फलप्राप्तिकी इच्छासे उसकी रक्षाके |