देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 282, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 282
| अ० ६ ] | तृतीय स्कन्ध | २७३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कारणं पञ्चभूतानां तानि सर्वसमुद्भवे।<br>कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि च॥ ७६<br><br>महाभूतानि पञ्चैव मनः षोडशमेव च।<br>कार्यञ्च कारणञ्चैव गणोऽयं षोडशात्मकः॥ ७७ | उत्पत्ति होती है। वे तन्मात्राएँ [पृथ्वी, जल आदि] पंचमहाभूतोंका कारण हैं। सबके सृजनमें पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच महाभूत और सोलहवाँ मन—यह षोडशात्मक समूह कार्य और कारणरूप होता है॥ ७५–७७॥ |
| परमात्मा पुमानाद्यो न कार्यं न च कारणम्।<br>एवं समुद्भवः शम्भो सर्वेषामादिसम्भवे॥ ७८ | वह आदिपुरुष परमात्मा न कार्य है और न कारण। हे शिव! सबकी प्रारम्भिक सृष्टिके उत्पत्तिका यही क्रम है॥ ७८॥ |
| संक्षेपेण मया प्रोक्तस्तव तत्र समुद्भवः।<br>व्रजन्त्वद्य विमानेन कार्यार्थं मम सत्तमाः॥ ७९ | अभी मैंने आपलोगोंकी यह उत्पत्ति-परम्परा संक्षेपमें कही। इसलिये हे श्रेष्ठदेव! अब आपलोग मेरा कार्य सम्पन्न करनेके लिये इस विमानसे प्रस्थान करें॥ ७९॥ |
| स्मरणाद्दर्शनं तुभ्यं दास्येऽहं विषमे स्थिते।<br>स्मर्त्तव्याहं सदा देवाः परमात्मा सनातनः॥ ८०<br><br>उभयोः स्मरणादेव कार्यसिद्धिरसंशयम्। | जब आपलोगोंपर कोई संकट आयेगा, तब मैं स्मरणमात्रसे तत्काल आपलोगोंको दर्शन दूँगी। अतः हे देवो! आपलोग सर्वदा मेरा तथा सनातन परमात्माका स्मरण करते रहें। हम दोनोंके स्मरणसे ही निःसन्देह आपलोगोंकी कार्यसिद्धि होगी॥ ८० १/२॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा विससर्जास्मान्दत्त्वा शक्तीः सुसंस्कृताः॥ ८१<br>विष्णोवेऽथ महालक्ष्मीं महाकालीं शिवाय च।<br><br>महासरस्वतीं मह्यं स्थानात्तस्माद्विसर्जिताः॥ ८२ | ब्रह्माजी बोले—हे नारद! ऐसा कहकर भगवतीने अपनी अद्भुत शक्तियाँ प्रदानकर हमें विदा किया। विष्णुको महालक्ष्मी, शिवको महाकाली और मुझे महासरस्वती प्रदान करके उस स्थानसे विदा कर दिया॥ ८१-८२॥ |
| स्थलान्तरं समासाद्य ते जाताः पुरुषा वयम्।<br>चिन्तयन्तः स्वरूपं तत्प्रभावं परमाद्भुतम्॥ ८३ | उनके स्वरूप तथा अत्यन्त अद्भुत प्रभावका स्मरण करते हुए अन्य स्थानपर पहुँचकर हमलोग पुनः पुरुषरूपमें हो गये॥ ८३॥ |
| विमानं तत्समासाद्य संरूढास्तत्र वै त्रयः।<br>न द्वीपोऽसौ न सा देवी सुधासिन्धुस्तथैव च।<br>पुनर्दृष्टं विमानं वै तत्रास्माभिर्न चान्यथा॥ ८४ | तब लौटकर हम तीनों पुनः उसी विमानमें बैठ गये। [हमने देखा कि] वहाँ न तो वह मणिद्वीप है, न वे महामाया हैं और न वह सुधासागर है। उस समय वहाँ उस विमानके अतिरिक्त और कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता था॥ ८४॥ |
| आसाद्य तस्मिन्वितते विमाने<br>प्राप्ता वयं पङ्कजसन्निधौ च।<br>महार्णवे यत्र हतौ दुरत्ययौ<br>मुरारिणा तौ मधुकैटभाख्यौ॥ ८५ | उस विशाल विमानमें बैठकर हम तीनों पुनः उसी महासागरमें विद्यमान उस कमलके निकट पहुँचे, जहाँ भगवान् विष्णुने मधु-कैटभ नामक दुर्धर्ष दैत्योंका वध किया था॥ ८५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
ब्रह्मणे श्रीदेव्या उपदेशवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥