भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| २७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा वासुदेवं सा त्रिगुणा प्रकृतिः परा ॥ ६४<br>निर्गुणा शङ्करं देवमवोचदमृतं वचः ।ब्रह्माजी बोले—[हे नारद!] विष्णुसे ऐसा कहकर उस त्रिगुणात्मिका तथा निर्गुणा परा प्रकृतिने देवाधिदेव शंकरसे अमृतमय वचन कहा ॥ ६४ १/२ ॥
देव्युवाच<br>गृहाण हर गौरीं त्वं महाकालीं मनोहराम् ॥ ६५<br>कैलासं कारयित्वा च विहरस्व यथासुखम्।<br>मुख्यस्तमोगुणस्तेऽस्तु गौणौ सत्त्वरजोगुणौ ॥ ६६**देवी बोलीं—**हे हर ! आप इन मनोहरा महाकाली गौरीको अंगीकार कीजिये और कैलासशिखरकी रचना कराकर वहाँ सुखपूर्वक विहार कीजिये। तमोगुण आपमें प्रधानगुणके रूपमें विद्यमान रहेगा और सत्त्वगुण तथा रजोगुण आपमें गौणरूपसे व्याप्त रहेंगे ॥ ६५-६६ ॥
विहरासुरनाशार्थं रजोगुणतमोगुणौ।<br>तपस्तप्तं तथा कर्तुं स्मरणं परमात्मनः ॥ ६७<br>शर्व सत्त्वगुणः शान्तो गृहीतव्यः सदानघ।<br>सर्वथा त्रिगुणा यूयं सृष्टिस्थित्यन्तकारकाः ॥ ६८रजोगुण और तमोगुणके द्वारा दैत्योंके विनाशके लिये आप वहाँ विहार करें और हे शर्व ! परमात्माका स्मरण-ध्यान करनेके लिये आप तप कर चुके हैं। आप शान्तिप्रधान सत्त्वगुणका अवलम्बन कीजिये। हे अनघ ! त्रिगुणात्मक आप तीनों देवता सृष्टि, पालन एवं संहार करनेवाले हैं ॥ ६७-६८ ॥
एभिर्विहीनं संसारे वस्तु नैवात्र कुत्रचित्।<br>वस्तुमात्रं तु यद् दृश्यं संसारे त्रिगुणं हि तत् ॥ ६९संसारमें कहीं भी कोई भी वस्तु इन तीनों गुणोंसे रहित नहीं है। जगत्की जितनी भी दृश्य वस्तुएँ हैं, वे सब त्रिगुणात्मिका हैं ॥ ६९ ॥
दृश्यं च निर्गुणं लोके न भूतं नो भविष्यति।<br>निर्गुणः परमात्मासौ न तु दृश्यः कदाचन ॥ ७०इस संसारमें ऐसी कोई भी दृश्य वस्तु गुणरहित न तो हुई और न होगी। निर्गुण तो एकमात्र वह परमात्मा ही है और वह कभी दृष्टिगोचर नहीं होता ॥ ७० ॥
सगुणा निर्गुणा चाहं समये शङ्करोत्तमा।<br>सदाहं कारणं शम्भो न च कार्यं कदाचन ॥ ७१हे शंकर ! समय आनेपर मैं श्रेष्ठरूपा ही वह सगुणा या निर्गुणा हो जाती हूँ। हे शम्भो ! मैं सर्वदा कारण हूँ, कार्य कभी नहीं ॥ ७१ ॥
सगुणा कारणत्वाद्धै निर्गुणा पुरुषान्तिकै।<br>महत्तत्त्वमहङ्कारो गुणाः शब्दादयस्तथा ॥ ७२<br>कार्यकारणरूपेण संसरन्ते त्वहर्निशम्।<br>सदुद्भूतस्त्वहङ्कारस्तेनाहं कारणं शिवा ॥ ७३किसी कारणविशेषसे मैं सगुणा होती हूँ तो उस परमपुरुषके सांनिध्यमें निर्गुणा रहती हूँ। महत्तत्त्व, अहंकार, तीनों गुण और शब्द आदि विषय कार्यकारणभावसे निरन्तर गतिशील रहते हैं। सत्से अहंकार उत्पन्न होता है; इसीलिये मैं शिवा सबका कारण हूँ ॥ ७२-७३ ॥
अहङ्कारश्च मे कार्यं त्रिगुणोऽसौ प्रतिष्ठितः।<br>अहङ्कारान्महत्तत्त्वं बुद्धिः सा परिकीर्तिता ॥ ७४अहंकार मेरा कार्य है और वह त्रिगुणात्मक रूपमें प्रतिष्ठित है। उस अहंकारसे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है; उसीको बुद्धि कहा गया है ॥ ७४ ॥
महत्तत्त्वं हि कार्यं स्यादहङ्कारो हि कारणम्।<br>तन्मात्राणि त्वहङ्कारादुत्पद्यन्ते सदैव हि ॥ ७५वह महत्तत्त्व कार्य है तथा अहंकार उसका कारण है। इसी अहंकारसे तन्मात्राओंकी सदा