देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 280, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 280
| अ० ६ ] | तृतीय स्कन्ध | २७१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जीवनार्थं कृता यज्ञा देवानां सर्वथा मया।<br>अविरोधेन सङ्गेन वर्तितव्यं त्रिभिः सदा॥ ५२ | मैंने देवताओंकी जीविकाके लिये ही यज्ञोंकी रचना की है। आप तीनों विरोधभावनासे रहित होकर व्यवहार कीजिये॥ ५२॥ |
| त्वं च वेधाः शिवस्त्वेते देवा मद्गुणसम्भवाः।<br>मान्याः पूज्याश्च सर्वेषां भविष्यन्ति न संशयः॥ ५३ | आप (विष्णु), ब्रह्मा, शिव तथा ये सभी देवता मेरे ही प्रभावसे प्रादुर्भूत हुए हैं। अतएव निस्सन्देह आपलोग सभी प्राणियोंके मान्य एवं पूज्य होंगे॥ ५३॥ |
| ये विभेदं करिष्यन्ति मानवा मूढचेतसः।<br>निरयं ते गमिष्यन्ति विभेदान्नात्र संशयः॥ ५४ | जो अज्ञानी मनुष्य इनमें भेदभाव करेंगे, वे इस विभेदके कारण नरकमें पड़ेंगे। इसमें सन्देह नहीं है॥ ५४॥ |
| यो हरिः स शिवः साक्षाद्यः शिवः स स्वयं हरिः।<br>एतयोर्भेदमातिष्ठन्नरकाय भवेन्नरः॥ ५५ | जो विष्णु हैं, वे ही साक्षात् शिव हैं और जो शिव हैं, वे ही स्वयं विष्णु हैं। इन दोनोंमें भेद रखनेवाला मनुष्य नरकगामी होता है॥ ५५॥ |
| तथैव द्रुहिणो ज्ञेयो नात्र कार्या विचारणा।<br>अपरो गुणभेदोऽस्ति शृणु विष्णो ब्रवीमि ते॥ ५६ | ब्रह्माजीके सम्बन्धमें भी ऐसा ही जानिये; इसमें कोई सन्देह नहीं है। हे विष्णो! गुणोंके कारण इनमें जो भेद हैं; उन्हें आपको बता रही हूँ, आप सुनें॥ ५६॥ |
| मुख्यः सत्त्वगुणस्तेऽस्तु परमात्मविचिन्तने।<br>गौणत्वेऽपि परौ ख्यातौ रजोगुणतमोगुणौ॥ ५७<br><br>लक्ष्म्या सह विकारेषु नानाभेदेषु सर्वदा।<br>रजोगुणयुतो भूत्वा विहरस्वानया सह॥ ५८ | परमात्म-चिन्तनकी दृष्टिसे आपका मुख्य गुण सत्त्वगुण है। दूसरे रजोगुण तथा तमोगुण आपके लिये गौण हैं। अतएव विभिन्न भेदयुक्त विकारोंमें रजोगुणसे सम्पन्न होकर आप इन लक्ष्मीके साथ विहार कीजिये॥ ५७-५८॥ |
| वाग्बीजं कामराजं च मायाबीजं तृतीयकम्।<br>मन्त्रोऽयं त्वं रमाकान्त मद्दत्तः परमार्थदः॥ ५९<br><br>गृहीत्वा जप तं नित्यं विहरस्व यथासुखम्।<br>न ते मृत्युभयं विष्णो न कालप्रभवं भयम्॥ ६० | हे लक्ष्मीकान्त! मेरे द्वारा आपको दिया गया वाग्बीज (ऐं), कामराज (क्लीं) तथा तृतीय मायाबीज (ह्रीं) इनसे युक्त यह मन्त्र परमार्थ प्रदान करनेवाला है। आप इसे ग्रहण करके निरन्तर इसका जप कीजिये तथा सुखपूर्वक विहार कीजिये। हे विष्णो! ऐसा करनेसे आपको न तो मृत्युभय होगा और न कालजनित भय ही होगा॥ ५९-६०॥ |
| यावदेष विहारो मे भविष्यति सुनिश्चितः।<br>संहरिष्याम्यहं सर्वं यदा विश्वं चराचरम्॥ ६१<br><br>भवन्तोऽपि तदा नूनं मयि लीना भविष्यथ।<br>स्मर्तव्योऽयं सदा मन्त्रः कामदो मोक्षदस्तथा॥ ६२ | जबतक मैं विहार करती रहूँगी, तबतक यह सृष्टि निश्चितरूपसे रहेगी और जब मैं सम्पूर्ण चराचर जगत्का संहार कर दूँगी, उस समय आपलोग भी मुझमें समाहित हो जायँगे। आपलोग समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले इस मन्त्रका अनवरत स्मरण करते रहें॥ ६१-६२॥ |
| उद्गीथेन च संयुक्तः कर्तव्यः शुभमिच्छता।<br>कारयित्वाथ वैकुण्ठं वस्तव्यं पुरुषोत्तम॥ ६३<br><br>विहरस्व यथाकामं चिन्तयन्मां सनातनीम्। | अपना कल्याण चाहनेवाले व्यक्तिको इस मन्त्रके साथ 'ओंकार' जोड़कर चतुरक्षर मन्त्रका जप करना चाहिये। हे पुरुषोत्तम! अब आप वैकुण्ठका निर्माण कराकर उसीमें निवास कीजिये और मुझ सनातनीका सतत ध्यान करते हुए इच्छापूर्वक विहार कीजिये॥ ६३ ½ ॥ |