देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 279, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 279
| २७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भवोऽयं ते सहायश्च भविष्यति महाबलः।<br>समुत्पाद्य सुरान्सर्वान्विहरस्व यथासुखम्॥ ४१ | ये महाबली शंकरजी भी आपकी सहायता करेंगे। अब आप समस्त देवताओंका सृजन करके स्वेच्छया सुखपूर्वक विहार कीजिये॥ ४१॥ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या नानायज्ञैः सदक्षिणैः।<br>यजिष्यन्ति विधानेन सर्वान्वः सुसमाहिताः॥ ४२ | ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यलोग दक्षिणायुक्त नानाविध यज्ञोंसे विधिपूर्वक पूर्ण मनोयोगके साथ आप सबकी पूजा करेंगे॥ ४२॥ |
| मन्नामोच्चारणात्सर्वे मखेषु सकलेषु च।<br>सदा तृप्ताश्च सन्तुष्टा भविष्यध्वं सुराः किल॥ ४३ | हे देवो! सभी यज्ञोंमें मेरे नामका उच्चारण करते ही आप सभी लोग निश्चितरूपसे सदैव तृप्त एवं सन्तुष्ट हो जायँगे॥ ४३॥ |
| शिवश्च माननीयो वै सर्वथा यत्ततोगुणः।<br>यज्ञकार्येषु सर्वेषु पूजनीयः प्रयत्नतः॥ ४४ | आपलोग तमोगुणसम्पन्न शंकरजीका सब प्रकारसे सम्मान कीजियेगा और सभी यज्ञकार्योंमें प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा कीजियेगा॥ ४४॥ |
| यदा पुनः सुराणां वै भयं दैत्याद्भविष्यति।<br>शक्तयो मे तदोत्पन्ना हरिष्यन्ति सुविग्रहाः॥ ४५<br><br>वाराही वैष्णवी गौरी नारसिंही सदाशिवा।<br>एताश्चान्याश्च कार्याणि कुरु त्वं कमलोद्भव॥ ४६ | जब कभी भी देवताओंके समक्ष दैत्योंसे भय उत्पन्न होगा, उस समय सुन्दर रूपोंवाली वाराही, वैष्णवी, गौरी, नारसिंही, सदाशिवा तथा अन्य देवियोंके रूपमें मेरी शक्तियाँ प्रकट होकर उनका भय दूर कर देंगी। अतः हे कमलोद्भव! अब आप अपने कार्य करें॥ ४५-४६॥ |
| नवाक्षरमिमं मन्त्रं बीजध्यानयुतं सदा।<br>जपन्सर्वाणि कार्याणि कुरु त्वं कमलोद्भव॥ ४७ | हे कमलोद्भव! बीज तथा ध्यानसे युक्त मेरे इस नवाक्षर मन्त्रका जप करते हुए आप समस्त कार्य कीजिये॥ ४७॥ |
| मन्त्राणामुत्तमोऽयं वै त्वं जानीहि महामते।<br>हृदये ते सदा धार्यः सर्वकामार्थसिद्धये॥ ४८ | हे महामते! आप इस मन्त्रको सभी मन्त्रोंसे श्रेष्ठ जानिये। सभी मनोरथोंकी सिद्धिके लिये आपको इस मन्त्रको सदा अपने हृदयमें धारण करना चाहिये॥ ४८॥ |
| इत्युक्त्वा मां जगन्माता हरिं प्राह शुचिस्मिता।<br>विष्णो व्रज गृहाणेमां महालक्ष्मीं मनोहराम्॥ ४९ | मुझसे ऐसा कहकर पवित्र मुसकानवाली जगज्जननीने भगवान् विष्णुसे कहा—हे विष्णो! अब आप इन मनोहर महालक्ष्मीको स्वीकार कीजिये और यहाँसे प्रस्थान कीजिये॥ ४९॥ |
| सदा वक्षःस्थले स्थाने भविता नात्र संशयः।<br>क्रीडार्थं ते मया दत्ता शक्तिः सर्वार्थदा शिवा॥ ५० | ये आपके वक्षःस्थलमें सदा निवास करेंगी, इसमें सन्देह नहीं है। आपके लीलाविनोदके लिये मैंने आपको यह सभी मनोरथ प्रदान करनेवाली कल्याणमयी शक्ति अर्पित की है॥ ५०॥ |
| त्वयेयं नावमन्तव्या माननीया च सर्वदा।<br>लक्ष्मीनारायणाख्योऽयं योगो वै विहितो मया॥ ५१ | आप इनका सर्वदा सम्मान करते रहियेगा और कभी भी तिरस्कार न कीजियेगा। लक्ष्मीनारायण नामक यह संयोग मेरे द्वारा ही रचा गया है॥ ५१॥ |