भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 278

अ० ६ ] तृतीय स्कन्ध २६९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अद्यात्र पृथिवी नास्ति क्व गतेति विचारणे।<br>सञ्जाता इति विज्ञेया अस्यास्तु परमाणवः॥ २८आज यहाँ पृथ्‍वी नहीं है, तब वह कहाँ चली गयी ? इसपर विचार करनेपर वह पृथ्‍वी परमाणुरूपसे विद्यमान तो है ही—ऐसा जानना चाहिये॥ २८॥
शाश्वतं क्षणिकं शून्यं नित्यानित्यं सकर्तृकम्।<br>अहंकाराग्रिमञ्चैव सप्तभेदैर्विवक्षितम्॥ २९<br>गृहाणाज महत्तत्त्वमहङ्कारस्तदुद्भवः।<br>ततः सर्वाणि भूतानि रचयस्व यथा पुरा॥ ३०शाश्वत, क्षणिक, शून्य, नित्य, अनित्य, सकर्तृक और अहंकार—इन सात भेदोंमें सृष्टिका वर्णन विवक्षित है। इसलिये हे अज! अब आप उस महत्तत्त्वको ग्रहण कीजिये, जिससे अहंकारकी उत्पत्ति होती है। तत्पश्चात् आप पूर्वकी भाँति समस्त प्राणियोंकी रचना कीजिये॥ २९-३०॥
व्रजन्तु स्वानि धिष्ण्यानि विरच्य निवसन्तु वः।<br>स्वानि स्वानि च कार्याणि कुर्वन्तु दैवभाविताः॥ ३१अब आपलोग जाइये तथा अपने-अपने लोकोंकी रचना करके निवास कीजिये और दैवका चिन्तन करते हुए अपने-अपने कार्य कीजिये॥ ३१॥
गृहाणेमां विधे शक्तिं सुरूपां चारुहासिनीम्।<br>महासरस्वतीं नाम्ना रजोगुणयुतां वराम्॥ ३२<br>श्वेताम्बरधरां दिव्यां दिव्यभूषणभूषिताम्।<br>वरासनसमारूढां क्रीडार्थं सहचारिणीम्॥ ३३हे विधे! सुन्दर रूपवाली, दिव्य हासवाली, रजोगुणसे युक्त, श्रेष्ठ श्वेत वस्त्र धारण करनेवाली, अलौकिक, दिव्याभूषणोंसे विभूषित, उत्तम आसनपर विराजमान इस महासरस्वती नामक शक्तिको क्रीडाविहारके लिये अपनी सहचरीके रूपमें स्वीकार कीजिये॥ ३२-३३॥
एषा सहचरी नित्यं भविष्यति वराङ्गना।<br>मावमंस्था विभूतिं मे मत्वा पूज्यतमां प्रियाम्॥ ३४<br>गच्छ त्वमनया सार्धं सत्यलोकं बताशु वै।<br>बीजाच्चतुर्विधं सर्वं समुत्पादय साम्प्रतम्॥ ३५यह सुन्दरी सदा आपकी सहचरी बनकर रहेगी। इस पूज्यतम प्रेयसीको मेरी विभूति समझकर कभी भी इसका तिरस्कार न कीजियेगा। अब आप शीघ्र ही इसे साथ लेकर सत्यलोकमें प्रस्थान करें और तत्त्वबीजसे चार प्रकारकी समस्त सृष्टि करनेमें तत्पर हो जायँ॥ ३४-३५॥
लिङ्गकोशाश्च जीवैस्तैः सहिताः कर्मभिस्तथा।<br>वर्तन्ते संस्थिताः काले तान्कुरु त्वं यथा पुरा॥ ३६<br>कालकर्मस्वभावाख्यैः कारणैः सकलं जगत्।<br>स्वभावस्वगुणैर्युक्तं पूर्ववत्सचराचरम्॥ ३७समस्त जीवों और कर्मोंके साथ जो लिंगकोश हैं, उन्हें पूर्वकी भाँति आप प्रतिष्ठित कर दें। काल, कर्म और स्वभाव नामवाले—इन कारणोंसे समस्त चराचर सृष्टिको पूर्वकी भाँति अपने-अपने स्वभाव और गुणोंसे युक्त कर दीजिये॥ ३६-३७॥
माननीयस्त्वया विष्णुः पूजनीयश्च सर्वदा।<br>सत्त्वगुणप्रधानत्वादधिकः सर्वतः सदा॥ ३८विष्णु आपके सदा माननीय और पूजनीय हैं; क्योंकि सत्त्वगुणकी प्रधानताके कारण वे सर्वदा सब प्रकारसे श्रेष्ठ हैं॥ ३८॥
यदा यदा हि कार्यं वो भविष्यति दुरत्ययम्।<br>करिष्यति पृथिव्यां वै अवतारं तदा हरिः॥ ३९जब-जब आपलोगोंका कोई कठिन कार्य उपस्थित होगा, उस समय भगवान् श्रीहरि पृथ्‍वीपर अवतार ग्रहण करेंगे॥ ३९॥
तिर्यग्योनावथान्यात्र मानुषीं तनुमाश्रितः।<br>दानवानां विनाशं वै करिष्यति जनार्दनः॥ ४०कहीं तिर्यक्-योनिमें तथा कहीं मानवयोनिमें शरीर धारण करके ये भगवान् जनार्दन दानवोंका अवश्य विनाश करेंगे॥ ४०॥