देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 270, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 270
| अ० ५ ] | तृतीय स्कन्ध | २६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्वमसि भूः सलिलं पवनस्तथा<br>खमपि वह्निगुणश्च तथा पुनः।<br>जननि तानि पुनः करणानि च<br>त्वमसि बुद्धिमनोऽप्यथ हंकृतिः॥ ३ | पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि आप ही हैं। हे माता! आप ही इन्द्रियरूपिणी तथा आप ही बुद्धि, मन और अहंकारस्वरूपा हैं॥ ३॥ |
| न च विदन्ति वदन्ति च येऽन्यथा<br>हरिहराजकृतं निखिलं जगत्।<br>तव कृतास्त्रय एव सदैव ते<br>विरचयन्ति जगत्सचराचरम्॥ ४ | ब्रह्मा, विष्णु और शंकरने अखिल जगत्की रचना की है—ऐसा जो लोग अन्यथा बोलते हैं, वे कुछ भी नहीं जानते। आपने ही सदासे इन तीनोंकी सृष्टि की है, जो [आपकी ही प्रेरणासे] चराचर जगत्का सृजन-पालन-संहार करते हैं॥ ४॥ |
| अवनिवायुखवह्निजलादिभिः<br>सविषयैः सगुणैश्च जगद् भवेत्।<br>यदि तदा कथमद्य च तत्स्फुटं<br>प्रभवतीति तवाम्ब कलामृते॥ ५ | यदि पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि, जल आदि महाभूतोंके गुणों तथा विषयोंसे ही जगत्का निर्माण सम्भव हो तो भी हे अम्ब! आपकी [चिन्मयी] कलाके बिना वह कैसे व्यक्त हो सकता है?॥ ५॥ |
| भवसि सर्वमिदं सचराचरं<br>त्वमजविष्णुशिवाकृतिकल्पितम् ।<br>विविधवेषविलासकुतूहलै-<br>र्विरमसे रमसेऽम्ब यथारुचि॥ ६ | हे अम्ब! आपने ब्रह्मा, विष्णु और महेशद्वारा निर्मित इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है। आप अनेक प्रकारके वेष धारण करके कुतूहलपूर्ण क्रीड़ाएँ करती हुई यथेच्छ विहार करती हैं और पुनः शान्त भी हो जाती हैं॥ ६॥ |
| सकललोकसिसृक्षुरहं हरिः<br>कमलभूश्च भवाम यदाऽम्बिके।<br>तव पदाम्बुजपांसुपरिग्रहं<br>समधिगम्य तदा ननु चक्रिम॥ ७ | हे अम्बिके! जब मैं (शिव), विष्णु और ब्रह्मा सृष्टिकालमें इस ब्रह्माण्डकी रचना करनेकी इच्छा करते हैं, तब निश्चित ही आपके चरणकमलोंका रजकण प्राप्त करके ही हमलोग अपने-अपने कार्य करनेमें समर्थ होते हैं॥ ७॥ |
| यदि दयार्द्रमना न सदाम्बिके<br>कथमहं विहितश्च तमोगुणः।<br>कमलजश्च रजोगुणसम्भवः<br>सुविहितः किमु सत्त्वगुणो हरिः॥ ८ | हे अम्बिके! यदि आप सदा दयालु चित्तवाली न होतीं तो मैं तमोगुणयुक्त, ब्रह्मा रजोगुणसम्पन्न और विष्णु सत्त्वगुणयुक्त कैसे बनते?॥ ८॥ |
| यदि न ते विषमा मतिरम्बिके<br>कथमिदं बहुधा विहितं जगत्।<br>सचिवभूपतिभृत्यजनावृतं<br>बहुधनैरधनैश्च समाकुलम्॥ ९ | हे अम्बिके! यदि आपकी वैविध्यपूर्ण बुद्धि न होती तो यह संसार इतना विविधतापूर्ण कैसे होता, जिसमें मन्त्री, राजा, सेवक, धनी और निर्धन भरे पड़े हैं॥ ९॥ |
| तव गुणास्त्रय एव सदा क्षमाः<br>प्रकटनावनसंहरणेषु वै।<br>हरिहरद्रुहिणाश्च क्रमात्तया<br>विरचितास्त्रिजगतां किल कारणम्॥ १० | इस ब्रह्माण्डकी सृष्टि, स्थिति और संहार करनेमें आपके तीनों गुण (सत्-रज-तम) ही सर्वथा समर्थ हैं; फिर भी आपने हम ब्रह्मा, विष्णु और महेशको क्रमशः इन कार्योंको सम्पन्न करनेके लिये तीनों लोकोंके कारणरूपमें उत्पन्न किया है॥ १०॥ |
| परिचितानि मया हरिणा तथा<br>कमलजेन विमानगतेन वै।<br>पथिगतैर्भुवनानि कृतानि वा<br>कथय केन भवानि नवानि च॥ ११ | विमानमें बैठा हुआ मैं, ब्रह्मा तथा विष्णु—हमलोग इन भुवनोंसे पूर्णरूपेण परिचित हो गये हैं। हे भवानि! मार्गमें स्थित इन नवीन भुवनोंको किसने बनाया? इसे आप बतायें॥ ११॥ |