भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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३७८ श्रीमद्देवीभागवत [अ० २६]

फलैर्नानाविधैरर्घ्यं प्रदातव्यं च तत्र वै।<br>नारिकेलैर्मातुलुङ्गैर्दाडिमीकदलीफलैः ॥ ३०<br>नारंगैः पनसैश्चैव तथा पूर्णफलैः शुभैः।<br>अन्नदानं प्रकर्तव्यं भक्तिपूर्वं नराधिप॥ ३१उस अवसरपर अर्घ्य भी प्रदान करे। हे राजन्! नारियल, बिजौरा नीबू, दाडिम, केला, नारंगी, कटहल तथा बिल्वफल आदि अनेक प्रकारके सुन्दर फलोंके साथ भक्तिपूर्वक अन्नका नैवेद्य एवं पवित्र बलि अर्पित करे॥ ३०-३४॥
मांसाशनं ये कुर्वन्ति तैः कार्यं पशुहिंसनम्।<br>महिषाजवराहाणां बलिदानं विशिष्यते॥ ३२होमके लिये त्रिकोण कुण्ड बनाना चाहिये अथवा त्रिकोणके मानके अनुरूप उत्तम वेदी बनानी चाहिये॥ ३५॥
देव्यग्रे निहता यान्ति पशवः स्वर्गमव्ययम्।<br>न हिंसा पशुजा तत्र निघ्नतां तत्कृतेऽनघ॥ ३३विविध प्रकारके सुन्दर द्रव्योंसे प्रतिदिन भगवतीका त्रिकाल (प्रातः-सायं-मध्याह्न) पूजन करना चाहिये और गायन, वादन तथा नृत्यके द्वारा महान् उत्सव मनाना चाहिये॥ ३६॥
अहिंसा याज्ञिकी प्रोक्ता सर्वशास्त्रविनिर्णये।<br>देवदार्थे विसृष्टानां पशूनां स्वर्गतिर्ध्रुवा॥ ३४[व्रती] नित्य भूमिपर सोये और वस्त्र, आभूषण तथा अमृतके सदृश दिव्य भोजन आदिसे कुमारी कन्याओंका पूजन करे॥ ३७॥
होमार्थं चैव कर्तव्यं कुण्डं चैव त्रिकोणकम्।<br>स्थण्डिलं वा प्रकर्तव्यं त्रिकोणं मानतः शुभम्॥ ३५नित्य एक ही कुमारीका पूजन करे अथवा प्रतिदिन एक-एक कुमारीकी संख्याके वृद्धिक्रमसे पूजन करे अथवा प्रतिदिन दुगुने-तिगुनेके वृद्धिक्रमसे और या तो प्रत्येक दिन नौ कुमारी कन्याओंका पूजन करे॥ ३८॥
त्रिकालं पूजनं नित्यं नानाद्रव्यैर्मनोहरैः।<br>गीतवादित्रनृत्यैश्च कर्तव्यश्च महोत्सवः॥ ३६अपने धन-सामर्थ्यके अनुसार भगवतीकी पूजा करे, किंतु हे राजन्! देवीके यज्ञमें धनकी कृपणता न करे॥ ३९॥
नित्यं भूमौ च शयनं कुमारीणां च पूजनम्।<br>वस्त्रालङ्करणैर्दिव्यैर्भोजनैश्च सुधामयैः॥ ३७हे राजन्! पूजाविधिमें एक वर्षकी अवस्थावाली कन्या नहीं लेनी चाहिये; क्योंकि वह कन्या गन्ध और भोग आदि पदार्थोंके स्वादसे बिलकुल अनभिज्ञ रहती है। कुमारी कन्या वह कही गयी है, जो दो वर्षकी हो चुकी हो। तीन वर्षकी कन्या त्रिमूर्ति, चार वर्षकी कन्या कल्याणी, पाँच वर्षकी रोहिणी, छः वर्षकी कालिका, सात वर्षकी चण्डिका, आठ वर्षकी शाम्भवी, नौ वर्षकी दुर्गा और दस वर्षकी कन्या सुभद्रा कहलाती है। इससे ऊपरकी अवस्थावाली कन्याका पूजन नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह सभी कार्योंमें निन्द्य मानी जाती है। इन नामोंसे कुमारीका विधिवत् पूजन सदा करना चाहिये। अब मैं इन नौ कन्याओंके पूजनसे प्राप्त होनेवाले फलोंको कहूँगा॥ ४०-४४॥
एकैकां पूजयेन्नित्यमेकवृद्ध्या तथा पुनः।<br>द्विगुणं त्रिगुणं वापि प्रत्येकं नवकं च वा॥ ३८
विभवस्यानुसारेण कर्तव्यं पूजनं किल।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं राजञ्छक्तिमखे सदा॥ ३९
एकवर्षा न कर्तव्या कन्या पूजाविधौ नृप।<br>परमज्ञा तु भोगानां गन्धादीनां च बालिका॥ ४०
कुमारिका तु सा प्रोक्ता द्विवर्षा या भवेदिह।<br>त्रिमूर्तिश्च त्रिवर्षा च कल्याणी चतुरब्दिका॥ ४१
रोहिणी पञ्चवर्षा च षड्वर्षा कालिका स्मृता।<br>चण्डिका सप्तवर्षा स्यादष्टवर्षा च शाम्भवी॥ ४२
नववर्षा भवेद् दुर्गा सुभद्रा दशवार्षिकी।<br>अत ऊर्ध्वं न कर्तव्या सर्वकार्यविगर्हिता॥ ४३
एभिश्च नामभिः पूजा कर्तव्या विधिसंयुता।<br>तासां फलानि वक्ष्यामि नवानां पूजने सदा॥ ४४