भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 889 में से

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पृष्ठ 389
३८०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २७

| रोहयन्ती च बीजानि प्राग्जन्मसम्चितानि वै।<br>या देवी सर्वभूतानां रोहिणीं पूजयाम्यहम्॥ ५६ | जो देवी सम्पूर्ण जीवोंके पूर्वजन्मके संचित कर्मरूपी बीजोंका रोपण करती हैं, उन भगवती रोहिणीकी मैं उपासना करता हूँ॥ ५६॥ | | काली कालयते सर्वं ब्रह्माण्डं सचराचरम्।<br>कल्पान्तसमये या तां कालिकां पूजयाम्यहम्॥ ५७ | जो देवी काली कल्पान्तमें चराचरसहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपनेमें विलीन कर लेती हैं, उन भगवती 'कालिका' की मैं पूजा करता हूँ॥ ५७॥ | | चण्डिकां चण्डरूपाञ्च चण्डमुण्डविनाशिनीम्।<br>तां चण्डपापहरिणीं चण्डिकां पूजयाम्यहम्। ५८ | अत्यन्त उग्र स्वभाववाली, उग्ररूप धारण करनेवाली, चण्ड-मुण्डका संहार करनेवाली तथा घोर पापोंका नाश करनेवाली उन भगवती 'चण्डिका' की मैं पूजा करता हूँ॥ ५८॥ | | अकारणात्समुत्पत्तिर्यन्मयैः परिकीर्तिता।<br>यस्यास्तां सुखदां देवीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम्॥ ५९ | वेद जिनके स्वरूप हैं, उन्हीं वेदोंके द्वारा जिनकी उत्पत्ति अकारण बतायी गयी है, उन सुखदायिनी भगवती 'शाम्भवी' का मैं पूजन करता हूँ॥ ५९॥ | | दुर्गात्त्रायति भक्तं या सदा दुर्गार्तिनाशिनी।<br>दुर्ज्ञेया सर्वदेवानां तां दुर्गां पूजयाम्यहम्॥ ६० | जो अपने भक्तको सर्वदा संकटसे बचाती हैं, बड़े-बड़े विघ्नों तथा दुःखोंका नाश करती हैं और सभी देवताओंके लिये दुर्ज्ञेय हैं, उन भगवती 'दुर्गा' की मैं पूजा करता हूँ॥ ६०॥ | | सुभद्राणि च भक्तानां कुरुते पूजिता सदा।<br>अभद्रनाशिनीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम्॥ ६१ | जो पूजित होनेपर भक्तोंका सदा कल्याण करती हैं, उन अमंगलनाशिनी भगवती 'सुभद्रा' की मैं पूजा करता हूँ॥ ६१॥ | | एभिर्मन्त्रैः पूजनीयाः कन्यकाः सर्वदा बुधैः।<br>वस्त्रालङ्करणैर्माल्यैर्गन्धैरुच्चावचैरपि ॥ ६२ | विद्वानोंको चाहिये कि वस्त्र, भूषण, माला, गन्ध आदि श्रेष्ठ उपचारोंसे इन मन्त्रोंके द्वारा सर्वदा कन्याओंका पूजन करें॥ ६२॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कुमारीपूजावर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥


अथ सप्तविंशोऽध्यायः

कुमारीपूजामें निषिद्ध कन्याओंका वर्णन, नवरात्रव्रतके माहात्म्यके प्रसंगमें सुशील नामक वणिक्‌की कथा

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
हीनाङ्गीं वर्जयेत्कन्यां कुष्ठयुक्तां व्रणाङ्किताम्।<br>गन्धस्फुरितहीनाङ्गीं विशालकुलसम्भवाम्॥ १[हे राजन्!] जो कन्या किसी अंगसे हीन हो, कोढ़ तथा घावयुक्त हो, जिसके शरीरके किसी अंगसे दुर्गन्ध आती हो और जो विशाल कुलमें उत्पन्न हुई हो—ऐसी कन्याका पूजामें परित्याग कर देना चाहिये॥ १॥
जात्यन्धां केकरां काणीं कुरूपां बहुरोमशाम्।<br>सन्त्यजेद्रोगिणीं कन्यां रक्तपुष्पादिनाङ्किताम्॥ २जन्मसे अन्धी, तिरछी नजरसे देखनेवाली, कानी, कुरूप, बहुत रोमवाली, रोगी तथा रजस्वला कन्याका पूजामें परित्याग कर देना चाहिये॥ २॥
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