देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 395, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 395
| ३८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ |
|---|
| नवमे वत्सरान्ते तु महाष्टम्यां महेश्वरी ॥ ५६<br><br>अर्धरात्रे तु सञ्जाते प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ।<br>नानावरप्रदानैश्च कृतकृत्यं चकार तम् ॥ ५७ | वर्षोंतक यह अनुष्ठान किया। नौवें वर्षके अन्तमें महाष्टमी तिथिको अर्धरात्रि आनेपर महेश्वरीने उसे अपना प्रत्यक्ष दर्शन दिया और अनेक प्रकारके वरदानोंसे कृतकृत्य कर दिया॥ ५५-५७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे देवीपूजामहत्त्ववर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
अथाष्टाविंशोऽध्यायः
श्रीरामचरित्रवर्णन
| जनमेजय उवाच<br>कथं रामेण तच्चीर्णं व्रतं देव्याः सुखप्रदम्।<br>राज्यभ्रष्टः कथं सोऽथ कथं सीता हृता पुनः॥ १ | जनमेजय बोले— श्रीरामाने भगवती जगदम्बाके इस सुखप्रदायक व्रतका अनुष्ठान किस प्रकार किया, वे राज्यच्युत कैसे हुए और फिर सीता-हरण किस प्रकार हुआ ? ॥ १ ॥ |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>राजा दशरथः श्रीमानयोध्याधिपतिः पुरा।<br>सूर्यवंशधरश्चासीद्देवब्राह्मणपूजकः ॥ २ | व्यासजी बोले— पूर्वकालमें श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्यापुरीमें राज्य करते थे। वे सूर्यवंशमें श्रेष्ठ राजाके रूपमें प्रतिष्ठित थे और वे देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया करते थे॥ २॥ |
| चत्वारो जज्ञिरे तस्य पुत्रा लोकेषु विश्रुताः।<br>रामलक्ष्मणशत्रुघ्ना भरतश्चेति नामतः॥ ३<br><br>राज्ञः प्रियकराः सर्वे सदृशा गुणरूपतः।<br>कौसल्यायाः सुतो रामः कैकेय्या भरतः स्मृतः॥ ४<br><br>सुमित्रातनयौ जातौ यमलौ द्वौ मनोहरौ।<br>ते जाता वै किशोराश्च धनुर्बाणधराः किल॥ ५ | उनके चार पुत्र उत्पन्न हुए; जो लोकमें राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न नामसे विख्यात हुए। गुण तथा रूपमें पूर्ण समानता रखनेवाले वे सभी महाराज दशरथको अत्यन्त प्रिय थे। उनमें राम महारानी कौसल्याके तथा भरत महारानी कैकेयीके पुत्र कहे गये। रानी सुमित्राके लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न नामवाले जुड़वाँ पुत्र उत्पन्न हुए। वे चारों किशोरावस्थामें ही धनुष-बाणधारी हो गये॥ ३–५॥ |
| सूनवः कृतसंस्कारा भूपतेः सुखवर्धकाः।<br>कौशिकेन तदागत्य प्रार्थितो रघुनन्दनः॥ ६ | महाराज दशरथने सुख बढ़ानेवाले अपने चारों पुत्रोंके संस्कार भी सम्पन्न कर दिये। तब एक समय महर्षि विश्वामित्र ने दशरथके यहाँ आकर उनसे रघुनन्दन रामको माँगा॥ ६॥ |
| राघवं मखरक्षार्थं सूनुं षोडशवार्षिकम्।<br>तस्मै सोऽयं ददौ रामं कौशिकाय सलक्ष्मणम्॥ ७ | महाराज दशरथने यज्ञकी रक्षाके लिये लक्ष्मण-सहित सोलहवर्षीय पुत्र रामको विश्वामित्रको समर्पित कर दिया॥ ७॥ |
| तौ समेत्य मुनिं मार्गे जग्मतुश्चारुदर्शनौ।<br>ताटका निहता मार्गे राक्षसी घोरदर्शना॥ ८ | प्रियदर्शन वे दोनों भाई मुनिके साथ मार्गमें चल दिये। रामचन्द्रजीने मुनियोंको सदा पीड़ित करनेवाली तथा अत्यन्त भयानक रूपवाली ताटकाको |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 B