भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 396
अ० २८ ]तृतीय स्कन्ध३८७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रामेणैकेन बाणेन मुनीनां दुःखदा सदा।<br>यज्ञरक्षा कृता तत्र सुबाहुर्निहतः शठः॥ ९<br><br>मारीचोऽथ मृतप्रायो निक्षिप्तो बाणवेगतः।<br>एवं कृत्वा महत्कर्म यज्ञस्य परिरक्षणम्॥ १०<br><br>गतास्ते मिथिलां सर्वे रामलक्ष्मणकौशिकाः।<br>अहल्या मोचिता शापान्निष्पापा सा कृताबला॥ ११रास्तेमें ही मात्र एक बाणसे मार डाला। उन्होंने दुष्ट सुबाहुका वध किया तथा मारीचको अपने बाणसे दूर फेंककर उसे मृतप्राय कर दिया और यज्ञ-रक्षा की। इस प्रकार यज्ञ-रक्षाका महान् कृत्य सम्पन्न करके राम, लक्ष्मण तथा विश्वामित्रने मिथिलापुरीके लिये प्रस्थान किया। जाते समय मार्गमें रामने अबला अहल्याको शापसे मुक्ति प्रदान करके उसे पापरहित कर दिया॥ ८—११॥
विदेहनगरे तौ तु जग्मतुर्मुनिना सह।<br>बभञ्ज शिवचापञ्च जनकेन पणीकृतम्॥ १२<br><br>उपयेमे ततः सीतां जानकीञ्च रंमांशजाम्।<br>लक्ष्मणाय ददौ राजा पुत्रीमेकां तथोर्मिलाम्॥ १३इसके बाद वे दोनों भाई मुनि विश्वामित्रके साथ जनकपुर पहुँच गये और वहाँ श्रीरामने जनकजीद्वारा प्रतिज्ञाके रूपमें रखे शिव-धनुषको तोड़ दिया और लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न जनकनन्दिनी सीताके साथ विवाह किया। राजा जनकने दूसरी पुत्री उर्मिलाका विवाह लक्ष्मणके साथ कर दिया॥ १२-१३॥
कुशध्वजसुते कन्ये प्राप्तुर्भ्रातरावुभौ।<br>तथा भरतशत्रुघ्नौ सुशीलौ शुभलक्षणौ॥ १४शीलसम्पन्न तथा शुभलक्षणोंसे युक्त दोनों भाई भरत तथा शत्रुघ्नने कुशध्वजकी दो पुत्रियों [माण्डवी तथा श्रुतकीर्ति]-को पत्नीरूपमें प्राप्त किया॥ १४॥
एवं दारक्रियास्तेषां भ्रातॄणां चाभवन्नृप।<br>चतुर्णां मिथिलायां तु यथाविधि विधानतः॥ १५हे राजन्! इस प्रकार उन चारों भाइयोंका विवाह मिथिलापुरीमें ही विधि-विधानसे सम्पन्न हुआ॥ १५॥
राज्ययोग्यं सुतं दृष्ट्वा राजा दशरथस्तदा।<br>राघवाय धुरं दातुं मनश्चक्रे निजाय वै॥ १६तत्पश्चात् महाराज दशरथने अपने बड़े पुत्र रामको राज्य करनेयोग्य देखकर उन्हें राज्य-भार सौंपनेका मनमें निश्चय किया॥ १६॥
सम्भारं विहितं दृष्ट्वा कैकेयी पूर्वकल्पितौ।<br>वरौ संप्रार्थयामास भर्तारं वशवर्तिनम्॥ १७राजतिलक-सम्बन्धी सामग्रियोंका प्रबन्ध हुआ देखकर रानी कैकेयीने अपने वशीभूत महाराज दशरथसे पूर्वकल्पित दो वरदान माँगे॥ १७॥
राज्यं सुताय चैकेन भरताय महात्मने।<br>रामाय वनवासञ्च चतुर्दशसमास्तथा॥ १८उसने पहले वरदानके रूपमें अपने पुत्र भरतके लिये राज्य तथा दूसरे वरदानके रूपमें महात्मा रामको चौदह वर्षोंका वनवास माँगा॥ १८॥
रामस्तु वचनात्तस्याः सीतालक्ष्मणसंयुतः।<br>जगाम दण्डकारण्यं राक्षसै रुपसेवितम्॥ १९कैकेयीका वचन मानकर श्रीरामचन्द्रजी सीता तथा लक्ष्मणके साथ दण्डकवन चले गये, जहाँ राक्षस रहते थे॥ १९॥
राजा दशरथः पुत्रविरहेण प्रपीडितः।<br>जहौ प्राणानमेयात्मा पूर्वशापमनुस्मरन्॥ २०तदनन्तर पुत्रके वियोगजनित शोकसे सन्तप्त पुण्यात्मा दशरथने पूर्वकालमें एक ऋषिद्वारा प्रदत्त शापका स्मरण करते हुए अपने प्राण त्याग दिये॥ २०॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 C