देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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३८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २८
| भरतः पितरं दृष्ट्वा मृतं मातृकृतेन वै।<br>राज्यमृद्धं न जग्राह भ्रातुः प्रियचिकीर्षया ॥ २१ | माता कैकेयीके कृत्यके कारण पिताजीकी मृत्यु देखकर भरतजीने भाई श्रीरामका हित करनेकी इच्छासे अयोध्याका समृद्ध राज्य स्वीकार नहीं किया॥ २१॥ |
| पञ्चवट्यां वसन् रामो रावणावरजां वने।<br>शूर्पणखां विरूपां वै चकारातिस्मरातुराम्॥ २२ | उधर पंचवटीमें निवास करते हुए श्रीरामने रावणकी छोटी बहन अतिशय कामातुर शूर्पणखाको कुरूप बना दिया॥ २२॥ |
| खरादयस्तु तां दृष्ट्वा छिन्ननासां निशाचराः।<br>चक्रुः संग्राममतुलं रामेणामिततेजसा॥ २३ | तब खर-दूषण आदि राक्षसोंने उसे कटी हुई नासिकावाली देखकर अमित तेजस्वी रामके साथ घोर संग्राम किया॥ २३॥ |
| स जघान खरादींश्च दैत्यानतिबलान्वितान्।<br>मुनीनां हितमन्विच्छन् रामः सत्यपराक्रमः॥ २४ | उस संग्राममें सत्यपराक्रमी श्रीरामने मुनियोंका कल्याण करनेकी इच्छासे अत्यन्त बलशाली खर आदि राक्षसोंका संहार कर दिया॥ २४॥ |
| गत्वा शूर्पणखा लङ्कां खरदूषणघातनम्।<br>दूषिता कथयामास रावणाय च राघवात्॥ २५ | तत्पश्चात् लंका जाकर उस दुष्ट शूर्पणखाने रामके द्वारा खर-दूषणके संहारका समाचार रावणसे बताया॥ २५॥ |
| सोऽपि श्रुत्वा विनाशं तं जातः क्रोधवशः खलः।<br>जगाम रथमारुह्य मारीचस्याश्रमं तदा॥ २६ | वह दुष्ट रावण भी संहारके विषयमें सुनकर अत्यन्त क्रोधित हो उठा और तब रथपर सवार होकर वह मारीचके आश्रममें पहुँच गया॥ २६॥ |
| कृत्वा हेममृगं नेतुं प्रेषयामास रावणः।<br>सीताप्रलोभनार्थाय मायाविनमसम्भवम्॥ २७ | सीता-हरणके उद्देश्यसे रावणने मायावी मारीचको असम्भव स्वर्ण-मृग बनाकर सीताको प्रलोभित करनेके लिये भेजा॥ २७॥ |
| सोऽथ हेममृगो भूत्वा सीतादृष्टिपथं गतः।<br>मायावी चातिचित्राङ्गश्चरन्प्रबलमन्तिके॥ २८ | तत्पश्चात् वह मायावी मारीच अत्यन्त अद्भुत अंगोंवाला स्वर्ण-मृग बनकर चरते-चरते सीताजीके सन्निकट पहुँच गया और उन्होंने उसे देख लिया॥ २८॥ |
| तं दृष्ट्वा जानकी प्राह राघवं दैवनोदिता।<br>चर्मानयस्व कान्तेति स्वाधीनपतिका यथा॥ २९ | उसे देखकर दैवी प्रेरणासे स्वाधीनपतिका स्त्रीकी भाँति सीताने श्रीरामसे कहा—हे कान्त! आप इस मृगका चर्म ले आइये॥ २९॥ |
| अविचार्यथ रामोऽपि तत्र संस्थाप्य लक्ष्मणम्।<br>सशरं धनुरादाय ययौ मृगपदानुगः॥ ३० | राम भी बिना कुछ सोचे-समझे लक्ष्मणको सीताके रक्षार्थ वहीं छोड़कर धनुष तथा बाण लेकर उस मृगके पीछे-पीछे दौड़ पड़े॥ ३०॥ |
| सारङ्गोऽपि हरिं दृष्ट्वा मायाकोटिविशारदः।<br>दृश्यादृश्यो बभूवाथ जगाम च वनान्तरम्॥ ३१ | करोड़ों प्रकारकी माया रचनेका ज्ञान रखनेवाला मृगरूपधारी वह मारीच भी रामको अपने पीछे दौड़ता देखकर कभी दिखायी पड़ते हुए तथा कभी आँखोंसे ओझल होते हुए एक वनसे दूसरे वनमें बहुत दूर चला गया॥ ३१॥ |
| मत्वा हस्तगतं रामः क्रोधाकृष्टधनुः पुनः।<br>जघान चातितीक्ष्णेन शरेण कृत्रिमं मृगम्॥ ३२ | रामने अब उसे हस्तगत समझकर क्रोधपूर्वक धनुष खींचकर अत्यन्त तीक्ष्ण बाणसे उस कृत्रिम मृगको मार डाला॥ ३२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 D