भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 398
अ० २८]तृतीय स्कन्ध३८९
मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
स हतोऽतिबलात्तेन चुक्रोश भृशदुःखितः।<br>हा लक्ष्मण हतोऽस्मीति मायावी नश्वरः खलः॥ ३३रामके प्रबल प्रहारसे आहत होकर वह मरणोन्मुख मायावी तथा नीच मृग चीख-चीखकर चिल्लाने लगा—हा लक्ष्मण! अब मैं मारा गया॥ ३३॥
स शब्दस्तुमुलस्तावज्जानक्या संश्रुतस्तदा।<br>राघवस्येति सा मत्वा दीना देवरमब्रवीत्॥ ३४<br><br>गच्छ लक्ष्मण तूर्णं त्वं हतोऽसौ रघुनन्दनः।<br>त्वामाह्वयति सौमित्रे साहाय्यं कुरु सत्वरम्॥ ३५उसके गगन-भेदी चीत्कारकी ध्वनिको सीताने सुन लिया। 'यह तो रामकी पुकार है'—ऐसा मानकर उन्होंने दुःखी होकर देवर लक्ष्मणसे कहा—हे लक्ष्मण! ऐसा प्रतीत होता है कि वे रघुनन्दन राम आहत हो गये हैं। अतः तुम शीघ्र जाओ। हे सुमित्रानन्दन! वे तुम्हें पुकार रहे हैं; वहाँ शीघ्र ही पहुँचकर उनकी सहायता करो॥ ३४-३५॥
तत्राह लक्ष्मणः सीतामम्ब रामवधादपि।<br>नाहं गच्छेऽद्य मुक्त्वा त्वामसहायामिहाश्रमे॥ ३६<br><br>आज्ञा मे राघवस्यात्र तिष्ठेति जनकात्मजे।<br>तदतिक्रमभीतोऽहं न त्यजामि तवान्तिकम्॥ ३७<br><br>दूरं वै राघवं दृष्ट्वा वने मायाविना किल।<br>त्यक्त्वा त्वां नाधिगच्छामि पदमेकं शुचिस्मिते॥ ३८<br><br>कुरु धैर्यं न मन्येऽद्य रामं हन्तुं क्षमं क्षितौ।<br>नाहं त्यक्त्वा गमिष्यामि विलंघ्य रामभाषितम्॥ ३९तब लक्ष्मणजीने सीतासे कहा—हे माता! रामका वध ही क्यों न हो; मैं आपको इस आश्रममें इस समय असहाय छोड़कर वहाँ नहीं जा सकता। हे जनकनन्दिनि! मुझे रामकी आज्ञा है कि तुम इसी आश्रममें रहना। उनकी आज्ञाका उल्लंघन करनेमें मैं डरता हूँ। अतः आपका सामीप्य नहीं छोड़ सकता। हे शुचिस्मिते! वह मायावी भगवान् श्रीरामको बहुत दूर दौड़ा ले गया है—यह जान करके मैं आपको छोड़कर यहाँसे एक पग भी नहीं जा सकता। आप धैर्य धारण कीजिये। मैं तो ऐसा मानता हूँ कि इस समय सम्पूर्ण पृथ्वीलोकमें श्रीरामको मारनेमें कोई समर्थ नहीं है। रामके आदेशका उल्लंघन करके तथा आपको यहाँ छोड़कर मैं नहीं जाऊँगा॥ ३६—३९॥
व्यास उवाच<br><br>रुदती सुदती प्राह तं तदा विधिनोदिता।<br>अक्रूरा वचनं क्रूरं लक्ष्मणं शुभलक्षणम्॥ ४०**व्यासजी बोले—**तत्पश्चात् सुन्दर दाँतोंवाली तथा सौम्य स्वभाववाली सीताने दैवसे प्रेरित होकर शुभ लक्षणसम्पन्न लक्ष्मणसे रोते हुए यह कठोर वचन कहा—॥ ४०॥
अहं जानामि सौमित्रे सानुरागं च मां प्रति।<br>प्रेरितं भरतेनैव मदर्थमिह सङ्गतम्॥ ४१हे सुमित्रातनय! अब मैं जान गयी कि तुम मेरे प्रति अनुरागयुक्त हो और भरतकी प्रेरणासे मेरे प्रयोजनसे यहाँ आये हो॥ ४१॥
नाहं तथाविधा नारी स्वैरिणी कुहकाधम।<br>मृते रामे पतिं त्वां न कर्तुमिच्छामि कामतः॥ ४२हे कुहकाधम! मैं उस तरहकी स्वच्छन्द स्त्री नहीं हूँ। मैं रामके मृत हो जानेपर भी सुखके लिये तुम्हें अपना पति कभी नहीं बना सकती॥ ४२॥
नागमिष्यति चेद्रामो जीवितं सन्त्यजाम्यहम्।<br>विना तेन न जीवामि विधुरा दुःखिता भृशम्॥ ४३यदि राम नहीं लौटेंगे तो मैं अपना प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि उनके बिना मैं विधवा होकर अत्यधिक दुःखी जीवन नहीं जी सकती॥ ४३॥