देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ३९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गच्छ वा तिष्ठ सौमित्रे न जानेऽहं तवेप्सितम्।<br>क्व गतं तेऽत्र सौहार्दं ज्येष्ठे धर्मरते किल॥ ४४ | हे लक्ष्मण! तुम जाओ या रहो। मुझे तुम्हारी वास्तविक इच्छाका पता नहीं है। धर्मपरायण ज्येष्ठ भाईके प्रति आपका प्रेम अब कहाँ चला गया ?॥ ४४॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या लक्ष्मणो दीनमानसः।<br>प्रोवाच रुद्धकण्ठस्तु तां तदा जनकात्मजाम्॥ ४५ | सीताका वह वचन सुनकर लक्ष्मणके मनमें अत्यधिक कष्ट हुआ। रुदनके कारण रुँधे कण्ठसे उन्होंने जनकनन्दिनी सीतासे कहा— ॥ ४५॥ |
| किमात्थ क्षितिजे वाक्यं मयि क्रूरतरं किल।<br>किं वदस्यत्यनिष्टं ते भावि जाने धिया ह्यहम्॥ ४६ | हे भूमिकन्ये! आप इस प्रकारके अति कठोर वचन मेरे लिये क्यों कह रही हैं? मेरा मन तो यह कह रहा है कि आपके समक्ष कोई अनिष्टकर परिस्थिति उत्पन्न होनेवाली है॥ ४६॥ |
| इत्युक्त्वा निर्ययौ वीरस्तां त्यक्त्वा प्ररुदन्भृशम्।<br>अग्रजस्य ययौ पश्यञ्छोकार्तः पृथिवीपते॥ ४७ | [व्यासजीने कहा—] हे महाराज जनमेजय! ऐसा कहकर अत्यधिक विलाप करते हुए वीर लक्ष्मण सीताको वहीं छोड़कर चल दिये और अत्यधिक शोकाकुल होकर बड़े भाई रामको चारों ओर देखते हुए आगेकी ओर बढ़ते गये॥ ४७॥ |
| गतेऽथ लक्ष्मणे तत्र रावणः कपटाकृतिः।<br>भिक्षुवेषं ततः कृत्वा प्रविवेश तदाश्रमे॥ ४८ | इस प्रकार लक्ष्मणके वहाँसे चले जानेपर कपट स्वभाववाले रावणने साधु-वेष धारणकर उस आश्रममें प्रवेश किया॥ ४८॥ |
| जानकी तं यतिं मत्वा दत्त्वार्घ्यं वन्यमादरात्।<br>भैक्ष्यं समर्पयामास रावणाय दुरात्मने॥ ४९ | जानकी उस दुष्टात्मा रावणको संन्यासी समझकर आदरपूर्वक वन्य सामग्रियोंका अर्घ्य प्रदान करके भिक्षा देने लगीं॥ ४९॥ |
| तां पप्रच्छ स दुष्टात्मा नम्रपूर्वं मृदुस्वरम्।<br>कासि पद्मपलाशाक्षि वने चैकाकिनी प्रिये॥ ५० | तब उस दुरात्माने अत्यन्त विनम्र भावसे मधुर वाणीमें सीताजीसे पूछा—हे पद्मपत्रके समान नेत्रोंवाली प्रिये! तुम कौन हो और इस वनमें अकेली क्यों रह रही हो?॥ ५०॥ |
| पिता कस्तेऽथ वामोरु भ्राता कः कः पतिस्तव।<br>मूढेवैकाकिनी चात्र स्थितासि वरवर्णिनि॥ ५१ | हे वामोरु! तुम्हारे पिता कौन हैं और तुम्हारे भाई तथा पति कौन हैं? हे सुन्दरि! तुम एक मूढ़ स्त्रीकी भाँति यहाँ अकेली क्यों रह रही हो?॥ ५१॥ |
| निर्जने विपिने किं त्वं सौधार्हा त्वमसि प्रिये।<br>उटजे मुनिपत्नीवद्देवकन्यासप्रभा॥ ५२ | हे प्रिये! इस निर्जन वनमें क्यों रह रही हो? तुम तो महलोंमें निवास करनेयोग्य हो। देवकन्याके समान कान्तिवाली तुम एक मुनिपत्नीकी भाँति इस कुटियामें क्यों रह रही हो?॥ ५२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच विदेहजा।<br>दिव्यं दिष्ट्या यतिं ज्ञात्वा मन्दोदर्याः पतिं तदा॥ ५३ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उसका यह वचन सुनकर विदेहतनया सीताजीने मन्दोदरीके पति रावणको दैववश एक दिव्य संन्यासी समझकर उत्तर दिया॥ ५३॥ |