भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० २८ ]तृतीय स्कन्ध३९१

| राजा दशरथः श्रीमांश्चत्वारस्तस्य वै सुताः।<br>तेषु ज्येष्ठः पतिर्मेऽस्ति रामनामेति विश्रुतः॥ ५४ | दशरथ नामक लक्ष्मीसम्पन्न एक राजा हैं, उनके चार पुत्र हैं। उनमें सबसे बड़े पुत्र जो ‘राम’ नामसे विख्यात हैं, वे ही मेरे पति हैं॥ ५४॥ | | विवासितोऽथ कैकेय्या कृते भूपतिना वरे।<br>चतुर्दश समा रामो वसतेऽत्र सलक्ष्मणः॥ ५५ | कैकेयीने महाराज दशरथसे वरदान माँगकर रामको चौदह वर्षके लिये वनवास दिला दिया। वे अपने भाई लक्ष्मणके साथ अब यहींपर रह रहे हैं॥ ५५॥ | | जनकस्य सुता चाहं सीतानाम्नीति विश्रुता।<br>भङ्क्त्वा शैवं धनुः कामं रामेणाहं विवाहिता॥ ५६ | मैं राजा जनककी पुत्री हूँ तथा ‘सीता’ नामसे विख्यात हूँ। शिवजीका धनुष तोड़कर श्रीरामने मेरा पाणिग्रहण किया है॥ ५६॥ | | रामबाहुबलेनात्र वसामो निर्भया वने।<br>काञ्चनं मृगमालोक्य हन्तुं मे निर्गतः पतिः॥ ५७ | उन्हीं रामके बाहुबलका आश्रय लेकर मैं निर्भीक होकर इस वनमें रहती हूँ। एक स्वर्ण-मृग देखकर उसे मारनेके लिये मेरे पति गये हुए हैं॥ ५७॥ | | लक्ष्मणोऽपि पुनः श्रुत्वा रवं भ्रातुर्गतोऽधुना।<br>तयोर्बाहुबलादत्र निर्भयाहं वसामि वै॥ ५८ | अपने भाईका शब्द सुनकर लक्ष्मण भी इस समय उधर ही गये हुए हैं। उन्हीं दोनोंके बाहुबलसे मैं यहाँ निडर होकर रहती हूँ॥ ५८॥ | | मयेदं कथितं सर्वं वृत्तान्तं वनवासके।<br>तेऽत्रागत्यार्हणां ते वै करिष्यन्ति यथाविधि॥ ५९ | मैंने आपको वनवास-सम्बन्धी अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त बता दिया। अब वे लोग यहाँ आकर आपका विधिपूर्वक सत्कार करेंगे॥ ५९॥ | | यतिर्विष्णुस्वरूपोऽसि तस्मात्त्वं पूजितो मया।<br>आश्रमो विपिने घोरे कृतोऽस्ति रक्षसां कुले॥ ६०<br><br>तस्मात्त्वां परिपृच्छामि सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः।<br>कोऽसि त्रिदण्डिरूपेण विपिने त्वं समागतः॥ ६१ | संन्यासी विष्णुस्वरूप होता है, इसीलिये मैंने आपकी पूजा की है। राक्षसोंके समुदायद्वारा सेवित इस भयंकर जंगलमें यह आश्रम बना हुआ है। इसलिये मैं आपसे यह पूछती हूँ कि त्रिदण्डीके रूपमें इस वनमें पधारे हुए आप कौन हैं? आप मेरे समक्ष सत्य कहिये॥ ६०-६१॥ | | रावण उवाच<br>लङ्केशोऽहं मरालाक्षि श्रीमान्मन्दोदरीपतिः।<br>त्वत्कृते तु कृतं रूपं मयेत्थं शोभनाकृते॥ ६२ | रावण बोला—हे हंसनयने! मैं मन्दोदरीका पति तथा लंकाका नरेश श्रीमान् रावण हूँ। हे सुन्दर आकृतिवाली! तुम्हारे लिये ही मैंने इस प्रकारका वेष बनाया है॥ ६२॥ | | आगतोऽहं वरारोहे भगिन्या प्रेरितोऽत्र वै।<br>जनस्थाने हतौ श्रुत्वा भ्रातरौ खरदूषणौ॥ ६३ | हे सुन्दरि! जनस्थानमें अपने भाई खर-दूषणके मारे जानेका समाचार सुनकर तथा अपनी बहन शूर्पणखाद्वारा प्रेरित किये जानेपर मैं यहाँ आया हूँ॥ ६३॥ | | अङ्गीकुरु नृपं मां त्वं त्यक्त्वा तं मानुषं पतिम्।<br>हृतराज्यं गतश्रीकं निर्बलं वनवासिनम्॥ ६४ | अब तुम उस राज्यच्युत, लक्ष्मीहीन, निर्बल, वनवासी तथा मानवयोनिवाले पतिको छोड़कर मुझ राजाको स्वीकार कर लो॥ ६४॥ |