देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० २९] तृतीय स्कन्ध ३१३
| इत्युक्त्वा पर्णशालायां गता सा वह्निसन्निधौ।<br>गच्छ गच्छेति वदती रावणं लोकरावणम्॥ ४ | ऐसा कह करके वे सीताजी जगत्को रुलानेवाले रावणके प्रति ‘चले जाओ, चले जाओ’ इस प्रकार बोलती हुई पर्णशालामें अग्निकुण्डके पास चली गयीं॥ ४॥ |
| सोऽथ कृत्वा निजं रूपं जगामोटजमन्तिकम्।<br>बलाज्जग्राह तां बालां रुदतीं भयविह्वलाम्॥ ५ | इतनेमें वह रावण अपना वास्तविक रूप धारण करके तुरन्त पर्णशालामें उनके पास जा पहुँचा और उसने भयसे व्याकुल होकर रोती हुई उस बाला सीताको बलपूर्वक पकड़ लिया॥ ५॥ |
| रामरामेति क्रन्दन्तीं लक्ष्मणेति मुहुर्मुहुः।<br>गृहीत्वा निर्गतः पापो रथमारोप्य सत्वरः॥ ६<br><br>गच्छन्नरुणपुत्रेण मार्गे रुद्धो जटायुषा।<br>संग्रामोऽभून्महोरौद्रस्तयोस्तत्र वनान्तरे॥ ७ | हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण!—ऐसा बार-बार कहकर विलाप करती हुई सीताको पकड़कर और उन्हें अपने रथपर बैठाकर रावण शीघ्रतापूर्वक निकल गया। तब अरुणपुत्र जटायुने जाते हुए उस रावणको मार्गमें रोक दिया। उस वनमें दोनोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा॥ ६-७॥ |
| हत्वा तं तां गृहीत्वा च गतोऽसौ राक्षसाधिपः।<br>लङ्कायां क्रन्दती तात कुररीव दुरात्मना॥ ८<br><br>अशोकवनिकायां सा स्थापिता राक्षसीयुता।<br>स्ववृत्तान्नैव चलिता सामदानादिभिः किल॥ ९ | हे तात! अन्तमें वह राक्षसराज रावण जटायुको मारकर और सीताको साथ लेकर चला गया। तदनन्तर उस दुष्टात्माने कुररी पक्षीकी भाँति क्रन्दन करती हुई सीताको लंकामें अशोकवाटिका में रख दिया और उसकी रखवालीके लिये राक्षसियोंको नियुक्त कर दिया। उस राक्षसके साम-दान आदि उपायोंसे भी सीताजी अपने सतीत्वसे विचलित नहीं हुईं॥ ८-९॥ |
| रामोऽपि तं मृगं हत्वा जगामादाय निर्वृतः।<br>आयान्तं लक्ष्मणं वीक्ष्य किं कृतं तेऽनुजासमम्॥ १०<br><br>एकाकिनीं प्रियां हित्वा किमर्थं त्वमिहागतः।<br>श्रुत्वा स्वनं तु पापस्य राघवस्त्वब्रवीदिदम्॥ ११ | उधर श्रीराम भी स्वर्ण-मृगको शीघ्र मारकर उसे लिये हुए प्रसन्नतापूर्वक [आश्रमकी ओर] चल पड़े। मार्गमें आते हुए लक्ष्मणको देखकर वे बोले—भाई! यह तुमने कैसा विषम कार्य कर दिया? वहाँ प्रिया सीताको अकेली छोड़कर तथा इस पापीकी पुकार सुनकर तुम इधर क्यों चले आये?॥ १०-११॥ |
| सौमित्रिस्त्वब्रवीद्वाक्यं सीतावाग्बाणपीडितः।<br>प्रभोऽत्राहं समायातः कालयोगान्न संशयः॥ १२ | तब सीताके वचनरूपी बाणसे आहत लक्ष्मणने कहा—प्रभो! मैं कालकी प्रेरणासे यहाँ चला आया हूँ; इसमें सन्देह नहीं है॥ १२॥ |
| तदा तौ पर्णशालायां गत्वा वीक्ष्यातिदुःखितौ।<br>जानक्यन्वेषणे यत्नमुभौ कर्तुं समुद्यतौ॥ १३ | तदनन्तर वे दोनों पर्णशालामें जाकर वहाँकी स्थिति देखकर अत्यन्त दुःखित हुए और जानकीको खोजनेका प्रयत्न करने लगे॥ १३॥ |
| मार्गमाणौ तु सम्प्राप्तौ यत्रासौ पतितः खगः।<br>जटायुः प्राणशेषस्तु पतितः पृथिवीतले॥ १४<br><br>तेनोक्तं रावणेनाद्य हृतासौ जनकात्मजा।<br>मया निरुद्धः पापात्मा पातितोऽहं मृधे पुनः॥ १५ | खोजते हुए वे उस स्थानपर पहुँचे जहाँ पक्षिराज ‘जटायु’ गिरा पड़ा था। वह पृथिवीपर मृतप्राय पड़ा हुआ था। उसने बताया कि रावण जानकीको अभी हर ले गया है। मैंने उस पापीको रोका, किंतु उसने युद्धमें मुझे मारकर गिरा दिया॥ १४-१५॥ |