भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| ४०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० | | :--- | :--- |

| कृत्वान्तं क्षत्रियाणां तु दानं भूमेरदाद् द्विजे।<br>तथेदानीं तु काकुत्स्थ जातो दशरथात्मजः ॥ ५४<br><br>प्रार्थितस्तु सुरैः सर्वै रावणेनातिपीडितैः।<br>कपयस्ते सहाया वै देवांशा बलवत्तराः ॥ ५५ | पुत्र परशुरामके रूपमें अवतरित होकर क्षत्रियोंका अन्त करके आपने सारी पृथ्वी ब्राह्मणोंको दे दी थी। उसी प्रकार हे काकुत्स्थ! रावणके द्वारा अत्यधिक सताये गये सभी देवताओंके प्रार्थना करनेपर इस समय आप ही दशरथपुत्र श्रीरामके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥ ४६—५४ १/२ ॥ | | भविष्यन्ति नरव्याघ्र मच्छक्तिसंयुता ह्यमी।<br>शेषांशोऽप्यनुजस्तेऽयं रावणात्मजनाशकः ॥ ५६<br><br>भविष्यति न सन्देहः कर्तव्योऽत्र त्वयानघ।<br>वसन्ते सेवनं कार्यं त्वया तत्रातिश्रद्धया ॥ ५७ | हे नरोत्तम! देवताओंके अंशसे उत्पन्न ये परम बलशाली वानर मेरी शक्तिसे सम्पन्न होकर आपके सहायक होंगे। शेषनागके अंशस्वरूप आपके ये अनुज लक्ष्मण रावणके पुत्र मेघनादका वध करनेवाले होंगे। हे अनघ! इस विषयमें आपको सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ५५-५६ १/२ ॥ | | हत्वाथ रावणं पापं कुरु राज्यं यथासुखम्।<br>एकादशसहस्त्राणि वर्षाणि पृथिवीतले ॥ ५८<br><br>कृत्वा राज्यं रघुश्रेष्ठ गन्तासि त्रिदिवं पुनः। | वसन्त ऋतुके नवरात्रमें आप परम श्रद्धाके साथ [पुनः] मेरी पूजा कीजिये। तत्पश्चात् पापी रावणका वध करके आप सुखपूर्वक राज्य कीजिये। हे रघुश्रेष्ठ! इस प्रकार ग्यारह हजार वर्षोंतक भूतलपर राज्य करके पुनः आप देवलोकके लिये प्रस्थान करेंगे ॥ ५७-५८ १/२ ॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी रामस्तु प्रीतमानसः ॥ ५९<br><br>समाप्य तद् व्रतं चक्रे प्रयाणं दशमीदिने।<br>विजयापूजनं कृत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥ ६० | **व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर भगवती दुर्गा वहीं अन्तर्धान हो गयीं और श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्न मनसे उस व्रतका समापन करके दशमी तिथिको विजयापूजन करके तथा अनेकविध दान देकर वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ ५९-६० ॥ | | कपिपतिबलयुक्तः सानुजः श्रीपतिश्च<br>प्रकटपरमशक्त्या प्रेरितः पूर्णकामः।<br>उदधितटगतोऽसौ सेतुबन्धं विधाया-<br>प्यहनदमरशत्रुं रावणं गीतकीर्तिः ॥ ६१ | वानरराज सुग्रीवकी सेनाके साथ अपने अनुजसहित विख्यात यशवाले तथा पूर्णकाम लक्ष्मीपति श्रीराम साक्षात् परमा शक्तिकी प्रेरणासे समुद्रतटपर पहुँचे। वहाँ सेतु-बन्धन करके उन्होंने देवशत्रु रावणका संहार किया ॥ ६१ ॥ | | यः शृणोति नरो भक्त्या देव्याश्चरितमुत्तमम्।<br>स भुक्त्वा विपुलाम्भोगाम्प्राप्नोति परमं पदम् ॥ ६२ | जो मनुष्य भक्तिपूर्वक देवीके उत्तम चरित्रका श्रवण करता है, वह अनेक सुखोंका उपभोग करके परमपद प्राप्त कर लेता है ॥ ६२ ॥ | | सन्त्यन्यानि पुराणानि विस्तराणि बहूनि च।<br>श्रीमद्द्भागवतस्यास्य न तुल्यानीति मे मतिः ॥ ६३ | यद्यपि अन्य बहुतसे विस्तृत पुराण हैं, किंतु वे इस श्रीमद्देवीभागवतमहापुराणके तुल्य नहीं हैं, ऐसी मेरी धारणा है ॥ ६३ ॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे रामाय देवीवरदानं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥


॥ तृतीयः स्कन्धः समाप्तः ॥