देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ४१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उदरं प्रविवेशाशु तस्या योगबलेन वै।<br>गर्भं चकर्त वज्रेण सप्तधा पविनायकः॥ ४२ | इस प्रकार योगबलद्वारा दितिके उदरमें शीघ्र ही प्रविष्ट होकर इन्द्रने वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर डाले॥ ४२॥ |
| रुरोद च तदा बालो वज्रेणाभिहतस्तथा।<br>मा रुदेति शनैर्वाक्यमुवाच मघवानमुम्॥ ४३ | उस समय वज्राघातसे दुःखित हो गर्भस्थ शिशु रुदन करने लगा। तब धीरेसे इन्द्रने उससे 'मा रुद' 'मत रोओ'—ऐसा कहा॥ ४३॥ |
| शकलानि पुनः सप्त सप्तधा कर्तितानि च।<br>तदा चैकोनपञ्चाशन्मरुतश्चाभवन्नृप॥ ४४ | तत्पश्चात् इन्द्रने पुनः उन सातों टुकड़ोंके सात-सात खण्ड कर डाले। हे राजन्! वे ही टुकड़े उनचास मरुद्गणके रूपमें प्रकट हो गये॥ ४४॥ |
| तदा प्रबुद्धा सुदती ज्ञात्वा गर्भं तथाकृतम्।<br>इन्द्रेण छलरूपेण चुकोप भृशदुःखिता॥ ४५ | उस छली इन्द्रद्वारा अपने गर्भको वैसा (विकृत) किया गया जानकर सुन्दर दाँतोंवाली वह दिति जाग गयी और अत्यन्त दुःखी होकर क्रोध करने लगी॥ ४५॥ |
| भगिनीकृतं तु सा बुद्ध्वा शशाप कुपिता तदा।<br>अदितिं मघवन्तञ्च सत्यव्रतपरायणा॥ ४६<br>यथा मे कर्तितो गर्भस्तव पुत्रेण छद्मना।<br>तथा तन्नाशमायातु राज्यं त्रिभुवनस्य तु॥ ४७<br>यथा गुप्तेन पापेन मम गर्भो निपातितः।<br>अदित्या पापचारिण्या यथा मे घातितः सुतः॥ ४८<br>तस्याः पुत्रास्तु नश्यन्तु जाता जाताः पुनः पुनः।<br>कारागारे वसत्वेषा पुत्रशोकातुरा भृशम्॥ ४९<br>अन्यजन्मनि चाप्येव मृतापत्या भविष्यति। | यह सब बहन अदितिद्वारा किया गया है—ऐसा जानकर सत्यव्रतपरायण दितिने कुपित होकर अदिति और इन्द्र दोनोंको शाप दे दिया कि जिस प्रकार तुम्हारे पुत्र इन्द्रने छलपूर्वक मेरा गर्भ छिन्न-भिन्न कर डाला है, उसी प्रकार उसका त्रिभुवनका राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाय। जिस प्रकार पापिनी अदितिने गुप्त पापके द्वारा मेरा गर्भ गिराया है और मेरे गर्भको नष्ट करवा डाला है, उसी प्रकार उसके पुत्र भी क्रमशः उत्पन्न होते ही नष्ट हो जायेंगे और वह पुत्र-शोकसे अत्यन्त चिन्तित होकर कारागारमें रहेगी। अन्य जन्ममें भी इसकी सन्तानें मर जाया करेंगी॥ ४६—४९ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युत्सृष्टं तदा श्रुत्वा शापं मरीचिनन्दनः॥ ५०<br>उवाच प्रणयोपेतो वचनं शमयन्निव।<br>मा कोपं कुरु कल्याणि पुत्रास्ते बलवत्तराः॥ ५१<br>भविष्यन्ति सुराः सर्वे मरुतो मघवत्सखाः।<br>शापोऽयं तव वामोरु त्वष्टाविंशेऽथ द्वापरे॥ ५२<br>अंशेन मानुषं जन्म प्राप्य भोक्ष्यति भामिनी।<br>वरुणेनापि दत्तोऽस्ति शापः सन्तापितेन च॥ ५३<br>उभयोः शापयोगेन मानुषीयं भविष्यति। | व्यासजी बोले—इस प्रकार मरीचिपुत्र कश्यपने दितिप्रदत्त शापको सुनकर उसे सान्त्वना देते हुए प्रेमपूर्वक यह वचन कहा—हे कल्याणि! तुम क्रोध मत करो, तुम्हारे पुत्र बड़े बलवान् होंगे। वे सब उनचास मरुद् देवता होंगे, जो इन्द्रके मित्र बनेंगे। हे सुन्दरि! अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें तुम्हारा शाप सफल होगा। उस समय अदिति मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर अपने किये कर्मका फल भोगेगी। इसी प्रकार दुःखित वरुणने भी उसे शाप दिया है। इन दोनों शापोंके संयोगसे यह अदिति मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होगी॥ ५०—५३ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>पतिनाश्वासिता देवी सन्तुष्टा साभवत्तदा॥ ५४ | व्यासजी बोले—इस प्रकार पति कश्यपके आश्वासन देनेपर दिति सन्तुष्ट हो गयी और वह |