देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 424, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 424
| अ० ३ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४१५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वीक्ष्य तामसितापाङ्गीं सपत्नीभावमास्थिताम्।<br>दुनोति हृदये चिन्ता सुखमर्मविनाशिनी ॥ ३१ | मुझसे सपत्नीभाव रखनेवाली उस सुन्दरी दितिको देखकर सुखका नाश कर देनेवाली चिन्ता मेरे मनको सताने लगती है॥ ३१॥ |
| राजयक्ष्मेव संवृद्धो नष्टो नैव भवेद्रिपुः।<br>तस्मादङ्कुरितं हन्याद् बुद्धिमानहितं किल॥ ३२ | जब शत्रु बढ़ जाता है तब राजयक्ष्मा रोगकी भाँति वह नष्ट नहीं हो पाता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्यका कर्तव्य है कि वह ऐसे शत्रुको अंकुरित होते ही नष्ट कर डाले॥ ३२॥ |
| लोहशङ्कुरिव क्षिप्तो गर्भो वै हृदये मम।<br>येन केनाप्युपायेन पातयाद्य शतक्रतो ॥ ३३<br><br>सामदानबलेनापि हिंसनीयस्त्वया सुतः।<br>दित्या गर्भो महाभाग मम चेदिच्छसि प्रियम्॥ ३४ | हे देवेन्द्र! दितिका वह गर्भ मेरे हृदयमें लोहेकी कीलके समान चुभ रहा है, अतः जिस किसी भी उपायसे तुम उसे नष्ट कर दो। हे महाभाग! यदि तुम मेरा हित करना चाहते हो तो साम, दान आदिके बलसे दितिके गर्भस्थ शिशुका संहार कर डालो॥ ३३-३४॥ |
| व्यास उवाच<br>श्रुत्वा मातृवचः शक्रो विचिन्त्य मनसा ततः।<br>जगामापरमातुः स समीपममराधिपः॥ ३५<br><br>ववन्दे विनयात्पादौ दित्याः पापमतिर्नृप।<br>प्रोवाच विनयेनासौ मधुरं विषगर्भितम्॥ ३६ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! तब अपनी माताकी वाणी सुनकर देवराज इन्द्र मन-ही-मन उपाय सोचकर अपनी विमाता दितिके पास गये। उस पापबुद्धि इन्द्रने विनयपूर्वक दितिके चरणोंमें प्रणाम किया और ऊपरसे मधुर किंतु भीतरसे विषभरी वाणीमें विनम्रतापूर्वक उससे कहा—॥ ३५-३६॥ |
| इन्द्र उवाच<br>मातस्त्वं व्रतयुक्तासि क्षीणदेहातिदुर्बला।<br>सेवार्थमिह सम्प्राप्तः किं कर्तव्यं वदस्व मे॥ ३७<br><br>पादसंवाहनं तेऽहं करिष्यामि पतिव्रते।<br>गुरुशुश्रूषणात्पुण्यं लभते गतिमक्षयाम् ॥ ३८ | **इन्द्र बोले—**हे माता! आप व्रतपरायण हैं, और अत्यन्त दुर्बल तथा कृशकाय हो गयी हैं। अतः मैं आपकी सेवा करनेके लिये आया हूँ। मुझे बताइये, मैं क्या करूँ ? हे पतिव्रते! मैं आपके चरण दबाऊँगा; क्योंकि बड़ोंकी सेवासे मनुष्य पुण्य तथा अक्षय गति प्राप्त कर लेता है॥ ३७-३८॥ |
| न मे किमपि भेदोऽस्ति तथादित्या शपे किल।<br>इत्युक्त्वा चरणौ स्पृष्ट्वा संवाहनपरोऽभवत् ॥ ३९ | मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि मेरे लिये माता अदिति तथा आपमें कुछ भी भेद नहीं है। ऐसा कहकर इन्द्र उनके दोनों चरण पकड़कर दबाने लगे॥ ३९॥ |
| संवाहनसुखं प्राप्य निद्रामाप सुलोचना।<br>श्रान्ता व्रतकृशा सुप्ता विश्वस्ता परमा सती ॥ ४० | पादसंवाहनका सुख पाकर सुन्दर नेत्रोंवाली उस दितिको नींद आने लगी। वह परम सती दिति थकी हुई थी, व्रतके कारण दुर्बल हो गयी थी और उसे इन्द्रपर विश्वास था, अतः वह सो गयी॥ ४०॥ |
| तां निद्रावशमापन्नां विलोक्य प्राविशत्तनुम्।<br>रूपं कृत्वातिसूक्ष्मञ्च शस्त्रपाणिः समाहितः॥ ४१ | दितिको नींदके वशीभूत देखकर इन्द्र अपना अत्यन्त सूक्ष्म रूप बनाकर हाथमें शस्त्र लेकर बड़ी सावधानीके साथ दितिके शरीरमें प्रवेश कर गये॥ ४१॥ |