भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 423

| ४१४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ | | :--- | :--- |

| जनमेजय उवाच<br>कस्मादित्या च भगिनी शप्तेन्द्रजननी मुने।<br>कारणं वद शापे च शोकस्तु मुनिसत्तम॥ १९ | जनमेजय बोले— हे मुने! दितिके द्वारा उसकी अपनी बहन तथा इन्द्रकी माता अदिति क्यों शापित की गयी? हे मुनिवर! आप दितिके शोक तथा उसके द्वारा प्रदत्त शापका कारण मुझे बताइये॥ १९॥ | | सूत उवाच<br>पारीक्षितेन पृष्टस्तु व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>राजानं प्रत्युवाचेदं कारणं सुसमाहितः॥ २० | सूतजी बोले— परीक्षित्-पुत्र राजा जनमेजयके पूछनेपर सत्यवती-पुत्र व्यासजी पूर्ण सावधान होकर राजाको शापका कारण बतलाने लगे॥ २०॥ | | व्यास उवाच<br>राजन् दक्षसुते द्वे तु दितिश्चादितिरुत्तमे।<br>कश्यपस्य प्रिये भार्ये बभूवतुरुरुक्रमे॥ २१ | व्यासजी बोले— हे राजन्! दक्षप्रजापतिकी दिति और अदिति नामक दो सुन्दर कन्याएँ थीं। दोनों ही कश्यपमुनिकी प्रिय तथा गौरवशालिनी पत्नियाँ बनीं॥ २१॥ | | अदित्यां मधवा पुत्रो यदाभूदतिवीर्यवान्।<br>तदा तु तादृशं पुत्रं चकमे दितिरोजसा॥ २२ | जब अदितिके अत्यन्त तेजस्वी पुत्र इन्द्र हुए, तब वैसे ही ओजस्वी पुत्रके लिये दितिके भी मनमें इच्छा जाग्रत् हुई॥ २२॥ | | पतिमाहासितापाङ्गी पुत्रं मे देहि मानद।<br>इन्द्रतुल्यबलं वीरं धर्मिष्ठं वीर्यवत्तमम्॥ २३ | उस समय सुन्दरी दितिने कश्यपजीसे प्रार्थना की—हे मानद! इन्द्रके ही समान बलशाली, वीर, धर्मात्मा तथा परम शक्तिसम्पन्न पुत्र मुझे भी देनेकी कृपा करें॥ २३॥ | | तामुवाच मुनिः कान्ते स्वस्था भव मयोदिते।<br>व्रतान्ते भविता तुभ्यं शतक्रतुसमः सुतः॥ २४ | तब मुनि कश्यपने उनसे कहा—प्रिये! धैर्य धारण करो, मेरे द्वारा बताये गये व्रतको पूर्ण करनेके अनन्तर इन्द्रके समान पुत्र तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा॥ २४॥ | | सा तथेति प्रतिश्रुत्य चकार व्रतमुत्तमम्।<br>निषिक्तं मुनिना गर्भं बिभ्राणा सुमनोहरम्॥ २५ | कश्यपमुनिकी बात स्वीकार करके दिति उस उत्तम व्रतके पालनमें तत्पर हो गयी। उनके ओजसे सुन्दर गर्भ धारण करती हुई वह सुन्दरी दिति | | भूमौ चकार शयनं पयोव्रतपरायणा।<br>पवित्रा धारणाद्युक्ता बभूव वरवर्णिनी॥ २६ | पयोव्रतमें स्थित रहकर भूमिपर सोती थी और पवित्रताका सदा ध्यान रखती थी। इस प्रकार क्रमशः | | एवं जातः सुसम्पूर्णो यदा गर्भोऽतिवीर्यवान्।<br>शुभ्रांशुमतिदीप्ताङ्गीं दितिं दृष्ट्वा तु दुःखिता॥ २७ | जब वह महान् तेजस्वी गर्भ पूर्ण हो गया, तब शुभ्र ज्योतियुक्त तथा दीप्तिमान् अंगोंवाली दितिको देखकर अदिति दुःखित हुई॥ २५–२७॥ | | मधवत्सदृशः पुत्रो भविष्यति महाबलः।<br>दित्यास्तदा मम सुतस्तेजोहीनो भवेत्किल॥ २८ | [उसने अपने मनमें सोचा—] यदि दितिके गर्भसे इन्द्रतुल्य महाबली पुत्र उत्पन्न होगा तो निश्चय ही मेरा पुत्र निस्तेज हो जायगा॥ २८॥ | | इति चिन्तापरा पुत्रमिन्द्रं चोवाच मानिनी।<br>शत्रुस्तेऽद्य समुत्पन्नो दितिगर्भेऽतिवीर्यवान्॥ २९ | इस प्रकार चिन्ता करती हुई मानिनी अदितिने अपने पुत्र इन्द्रसे कहा—प्रिय पुत्र! इस समय दितिके गर्भमें तुम्हारा अत्यन्त पराक्रमशाली शत्रु विद्यमान है। | | उपायं कुरु नाशाय शत्रोरद्य विचिन्त्य च।<br>उत्पत्तिरेव हन्तव्या दित्या गर्भस्य शोभन॥ ३० | हे शोभन! तुम सम्यक् विचार करके उस शत्रुके नाशका प्रयत्न करो, जिससे दितिकी गर्भोत्पत्ति ही विनष्ट हो जाय॥ २९–३०॥ |