भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 422
अ० ३ ]चतुर्थ स्कन्ध४१३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य यादोनाथस्य पद्मभूः।<br>समाहूय मुनिं तत्र तमुवाच प्रजापतिः॥ ८<br><br>कस्मात्त्वया महाभाग लोकपालस्य धेनवः।<br>हृताः पुनर्न दत्ताश्च किमन्यायं करोषि च॥ ९व्यासजी बोले— जल-जन्तुओंके स्वामी वरुणका यह वचन सुनकर प्रजापति ब्रह्माने मुनि कश्यपको वहाँ बुलाकर उनसे कहा—हे महाभाग! आपने लोकपाल वरुणकी गायोंका हरण क्यों किया; और फिर आपने उन्हें लौटाया भी नहीं। आप ऐसा अन्याय क्यों कर रहे हैं?॥ ८-९॥
जानन् न्यायं महाभाग परवित्तापहारणम्।<br>कृतवान्कथमन्यायं सर्वज्ञोऽसि महामते॥ १०हे महाभाग! न्यायको जानते हुए भी आपने दूसरेके धनका हरण किया। हे महामते! आप तो सर्वज्ञ हैं; तो फिर आपने यह अन्याय क्यों किया?॥ १०॥
अहो लोभस्य महिमा महतोऽपि न मुञ्चति।<br>लोभं नरकदं नूनं पापाकरमसम्मतम्॥ ११अहो! लोभकी ऐसी महिमा है कि वह महान्-से-महान् लोगोंको भी नहीं छोड़ता है। लोभ तो निश्चय ही पापोंकी खान, नरककी प्राप्ति करानेवाला और सर्वथा अनुचित है॥ ११॥
कश्यपोऽपि न तं त्यक्तुं समर्थः किं करोम्यहम्।<br>सर्वदैवाधिकस्तस्माल्लोभो वै कलितो मया॥ १२महर्षि कश्यप भी उस लोभका परित्याग कर सकनेमें समर्थ नहीं हुए तो मैं क्या कर सकता हूँ। अन्ततः मैंने यही निष्कर्ष निकाला कि लोभ सदासे सबसे प्रबल है॥ १२॥
धन्यास्ते मुनयः शान्ता जितो यैर्लोभ एव च।<br>वैखानसैः शमपरैः प्रतिग्रहपराङ्मुखैः॥ १३शान्त स्वभाववाले, जितेन्द्रिय, प्रतिग्रहसे पराङ्मुख तथा वानप्रस्थ-आश्रम स्वीकार किये हुए वे मुनिलोग धन्य हैं, जिन्होंने लोभपर विजय प्राप्त कर ली है॥ १३॥
संसारे बलवाञ्छत्रुर्लोभोऽमेध्योऽवरः सदा।<br>कश्यपोऽपि दुराचारः कृतस्नेहो दुरात्मना॥ १४संसारमें लोभसे बढ़कर अपवित्र तथा निन्दित अन्य कोई चीज नहीं है; यह सबसे बलवान् शत्रु है। महर्षि कश्यप भी इस नीच लोभसे स्नेह करनेके कारण दुराचारमें लिप्त हो गये॥ १४॥
ब्रह्मापि तं शशापाथ कश्यपं मुनिसत्तमम्।<br>मर्यादारक्षणार्थं हि पौत्रं परमवल्लभम्॥ १५<br><br>अंशेन त्वं पृथिव्यां वै प्राप्य जन्म यदोः कुले।<br>भार्याभ्यां संयुतस्तत्र गोपालत्वं करिष्यसि॥ १६अतएव मर्यादाकी रक्षाके लिये ब्रह्माजीने भी अपने परमप्रिय पौत्र मुनिश्रेष्ठ कश्यपको शाप दे दिया कि तुम अपने अंशसे पृथ्वीपर यदुवंशमें जन्म लेकर वहाँ अपनी दोनों पत्नियोंके साथ गोपालनका कार्य करोगे॥ १५-१६॥
व्यास उवाच<br>एवं शप्तः कश्यपोऽसौ वरुणेन च ब्रह्मणा।<br>अंशावतरणार्थाय भूभारहरणाय च॥ १७व्यासजी बोले— इस प्रकार अंशावतार लेने तथा पृथ्वीका बोझ उतारनेके लिये वरुणदेव तथा ब्रह्माजीने उन महर्षि कश्यपको शाप दे दिया था॥ १७॥
तथा दित्यादितिः शप्ता शोकसन्तप्तया भृशम्।<br>जाता जाता विनश्येरंस्तव पुत्रास्तु सप्त वै॥ १८उधर कश्यपकी भार्या दितिने भी अत्यधिक शोकसन्तप्त होकर अदितिको शाप दे दिया कि क्रमसे तुम्हारे सातों पुत्र उत्पन्न होते ही मृत्युको प्राप्त हो जायँ॥ १८॥