भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 421
४१२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३
सीताविरहजं दुःखं संग्रामश्च पुनः पुनः।<br>कान्त्यागोऽप्यनेनैवमनुभूतो महात्मना ॥ ५७तथा अनेक बार राक्षसोंसे युद्ध करना पड़ा। अन्तमें महान् आत्मावाले इन श्रीरामको पत्नी-परित्यागकी असीम वेदना भी सहनी पड़ी ॥ ५६-५७ ॥
तथा कृष्णावतारेऽपि जन्म रक्षागृहे पुनः।<br>गोकुले गमनं चैव गवां चारणमित्युत ॥ ५८उसी प्रकार कृष्णावतारमें भी बन्दीगृहमें जन्म, गोकुल-गमन, गोचारण, कंसका वध और पुनः कष्टपूर्वक द्वारकाके लिये प्रस्थान—इन अनेकविध सांसारिक दुःखोंको भगवान् कृष्णने क्यों भोगा? ॥ ५८-५९ ॥
कंसस्य हननं कष्टाद् द्वारकागमनं पुनः।<br>नानासंसारदुःखानि भुक्तवान्भगवान् कथम् ॥ ५९
स्वेच्छया कः प्रतीक्षेत मुक्तो दुःखानि ज्ञानवान्।<br>संशयं छिन्धि सर्वज्ञ मम चित्तप्रशान्तये ॥ ६०ऐसा कौन ज्ञानी व्यक्ति होगा जो मुक्त होता हुआ भी स्वेच्छासे इन दुःखोंकी प्रतीक्षा करेगा? हे सर्वज्ञ! मेरे मनकी शान्तिके लिये सन्देहका निवारण कीजिये ॥ ६० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कर्मणो जन्मादिकारणत्वनिरूपणं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


अथ तृतीयोऽध्यायः

वसुदेव और देवकीके पूर्वजन्मकी कथा

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
कारणानि बहून्यत्राप्यवतारे हरेः किल।<br>सर्वेषां चैव देवानांमशावतरणेष्वपि ॥ १[हे राजन्!] भगवान् विष्णुके विभिन्न अवतार ग्रहण करने तथा इसी प्रकार सभी देवताओंके भी अंशावतार ग्रहण करनेके बहुतसे कारण हैं ॥ १ ॥
वसुदेवावतारस्य कारणं शृणु तत्त्वतः।<br>देवक्याश्चैव रोहिण्या अवतारस्य कारणम् ॥ २अब वसुदेव, देवकी तथा रोहिणीके अवतारोंका कारण यथार्थ रूपसे सुनिये ॥ २ ॥
एकदा कश्यपः श्रीमान्यज्ञार्थं धेनुमाहरत्।<br>याचितोऽयं बहुविधं न ददौ धेनुमुत्तमाम् ॥ ३एक बार महर्षि कश्यप यज्ञकार्यके लिये वरुणदेवकी गौ ले आये। [यज्ञ-कार्यकी समाप्तिके पश्चात्] वरुणदेवके बहुत याचना करनेपर भी उन्होंने वह उत्तम धेनु वापस नहीं दी ॥ ३ ॥
वरुणस्तु ततो गत्वा ब्रह्माणं जगतः प्रभुम्।<br>प्रणम्योवाच दीनात्मा स्वदुःखं विनयान्वितः ॥ ४तत्पश्चात् उदास मनवाले वरुणदेवने जगत्के स्वामी ब्रह्माके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक उनसे अपना दुःख कहा ॥ ४ ॥
किं करोमि महाभाग मत्तोऽसौ न ददाति गाम्।<br>शापो मया विसृष्टोऽस्मै गोपालो भव मानुषे ॥ ५हे महाभाग! मैं क्या करूँ? वह अभिमानी कश्यप मेरी गाय नहीं लौटा रहा है। अतएव मैंने उसे शाप दे दिया कि मानवयोनिमें जन्म लेकर तुम गोपालक हो जाओ और तुम्हारी दोनों भार्याएँ भी मानवयोनिमें उत्पन्न होकर अत्यधिक दुःखी रहें। मेरी गायके बछड़े मातासे वियुक्त होकर अति दुःखित हैं और रो रहे हैं, अतएव पृथ्वीलोकमें जन्म लेनेपर यह अदिति भी मृतवत्सा होगी। इसे कारागारमें रहना पड़ेगा, उससे भी उसे महान् कष्ट भोगना होगा ॥ ५–७ ॥
भार्ये द्वे अपि तत्रैव भवेतां चातिदुःखिते।<br>यतो वत्सा रुदन्त्यत्र मातृहीनाः सुदुःखिताः ॥ ६
मृतवत्सादितिस्तस्माद्भविष्यति धरातले।<br>कारागारनिवासा च तेनापि बहुदुःखिता ॥ ७
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