भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 889 में से

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पृष्ठ 420
अ० २ ]चतुर्थ स्कन्ध४११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवकी रोहिणी चोभे भगिन्यौ भरतर्षभ।<br>वरुणेन महाच्छापो दत्तः कोपादिति श्रुतम्॥ ४३<br><br>राजोवाच<br>किं कृतं कश्यपेनागो येन शप्तो महर्षिः।<br>सभार्यः स कथं जातस्तद्वदस्व महामते॥ ४४दोनोंने देवकी और रोहिणी नामक बहनोंके रूपमें जन्म लिया था। मैंने यह सुना है कि क्रुद्ध होकर वरुणने उन्हें महान् शाप दिया था॥ ४२-४३॥<br><br>राजा बोले—हे महामते! महर्षि कश्यपने कौन-सा ऐसा अपराध किया था, जिसके कारण उन्हें स्त्रियोंसहित शाप मिला; इसे मुझे बताइये॥ ४४॥
कथञ्च भगवान्विष्णुस्तत्र जातोऽस्ति गोकुले।<br>वासी वैकुण्ठनिलये रमापतिरखण्डितः॥ ४५वैकुण्ठवासी, अविनाशी, रमापति भगवान् विष्णुको गोकुलमें जन्म क्यों लेना पड़ा?॥ ४५॥
निदेशात्कस्य भगवान्वर्तते प्रभुरव्ययः।<br>नारायणः सुरश्रेष्ठो युगादिः सर्वधारकः॥ ४६<br>स कथं सदनं त्यक्त्वा कर्मवानिव मानुषे।<br>करोति जननं कस्मादत्र मे संशयो महान्॥ ४७सबके स्वामी, अविनाशी, देवश्रेष्ठ, युगके आदि तथा सबको धारण करनेवाले साक्षात् भगवान् नारायण किसके आदेशसे व्यवहार करते हैं और वे अपने स्थानको छोड़कर मानव-योनिमें जन्म लेकर मनुष्योंकी भाँति सब काम क्यों करते हैं; इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है॥ ४६-४७॥
प्राप्य मानुषदेहं तु करोति च विडम्बनम्।<br>भावान्नानाविधांस्तत्र मानुषे दुष्टजन्मनि॥ ४८भगवान् विष्णु स्वयं मानव-शरीर धारण करके हीन मनुष्य-जन्ममें अनेकविध लीलाएँ दिखाते हुए प्रपंच क्यों करते हैं?॥ ४८॥
कामः क्रोधोऽमर्षशोकौ वैरं प्रीतिश्च कर्हिचित्।<br>सुखं दुःखं भयं नृणां दैन्यमार्जवमेव च॥ ४९<br>दुष्कृतं सुकृतं चैव वचनं हननं तथा।<br>पोषणं चलनं तापो विमर्शश्च विकत्थनम्॥ ५०<br>लोभो दम्भस्तथा मोहः कपटः शोचनं तथा।<br>एते चान्ये तथा भावा मानुष्ये सम्भवन्ति हि॥ ५१काम, क्रोध, अमर्ष, शोक, वैर, प्रेम, सुख, दुःख, भय, दीनता, सरलता, पाप, पुण्य, वचन, मारण, पोषण, चलन, ताप, विमर्श, आत्मश्लाघा, लोभ, दम्भ, मोह, कपट और चिन्ता—ये तथा अन्य भी नाना प्रकारके भाव मनुष्य-जन्ममें विद्यमान रहते हैं॥ ४९—५१॥
स कथं भगवान्विष्णुस्त्यक्त्वा सुखमनश्वरम्।<br>करोति मानुषं जन्म भावैस्तैस्तैरभिद्रुतम्॥ ५२<br>किं सुखं मानुषं प्राप्य भुवि जन्म मुनीश्वर।<br>किं निमित्तं हरिः साक्षाद् गर्भवासं करोति वै॥ ५३वे भगवान् विष्णु शाश्वत सुखका त्याग करके इन भावोंसे ग्रस्त मनुष्य-जन्म किसलिये धारण करते हैं? हे मुनीश्वर! इस पृथ्वीपर मानव-जन्म पाकर कौन-सा सुख मिल जाता है? वे साक्षात् भगवान् विष्णु किस कारणसे गर्भवास करते हैं?॥ ५२-५३॥
गर्भदुःखं जन्मदुःखं बालभावे तथा पुनः।<br>यौवने कामजं दुःखं गार्हस्थ्येऽतिमहत्तरम्॥ ५४गर्भवासमें दुःख, जन्मग्रहणमें दुःख, बाल्यावस्थामें दुःख, यौवनावस्थामें कामजनित दुःख एवं गार्हस्थ्य जीवनमें तो बहुत बड़ा दुःख होता है॥ ५४॥
दुःखान्येतान्यवाप्नोति मानुषे द्विजसत्तम।<br>कथं स भगवान्विष्णुरवतारान्युनः पुनः॥ ५५हे विप्रवर! ये अनेक कष्ट मानव-जीवनमें प्राप्त होते हैं, तो फिर वे भगवान् विष्णु अवतार क्यों लेते हैं?॥ ५५॥
प्राप्य रामावतारं हि हरिणा ब्रह्मयोनिना।<br>दुःखं महत्तरं प्राप्तं वनवासेऽतिदारुणे॥ ५६ब्रह्मयोनि भगवान् विष्णुको रामावतार ग्रहण करके अत्यन्त दारुण वनवासकालमें घोर कष्ट प्राप्त हुआ था। उन्हें सीता-वियोगसे उत्पन्न महान् दुःख प्राप्त हुआ
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