देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ४१० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| श्लोक | अर्थ |
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| तथा निःसरणे दुःखं योनियन्त्रेऽतिदारुणे।<br>बालभावे तदा दुःखं मूकाङ्गभावसंयुक्तम्॥ २९<br>क्षुत्तृष्णावेदनायुक्तः परतन्त्रोऽतिकातरः।<br>क्षुधिते रुदिते बाले माता चिन्तातुरा तदा॥ ३०<br>भेषजं पातुमिच्छन्ती ज्ञात्वा व्याधिव्यथां दृढाम्।<br>नानाविधानि दुःखानि बालभावे भवन्ति वै॥ ३१ | चिन्ताग्रस्त हो उठती है और पुनः किसी बड़े रोगजनित कष्टका अनुमान करके उसे दवा पिलानेकी इच्छा करने लगती है। इस प्रकार बाल्यावस्थामें अनेक प्रकारके कष्ट होते हैं, तब विवेकी पुरुष किस सुखको देखकर स्वयं जन्म लेनेकी इच्छा करते हैं!॥ २६–३१ ½॥ |
| किं सुखं विबुधा दृष्ट्वा जन्म वाञ्छन्ति चेच्छया।<br>संग्रामममरैः सार्धं सुखं त्यक्त्वा निरन्तरम्॥ ३२<br>कर्तुमिच्छेच्च को मूढः श्रमदं सुखनाशनम्।<br>सर्वथैव नृपश्रेष्ठ सर्वे ब्रह्मादयः सुराः॥ ३३<br>कृतकर्मविपाकेन प्राप्नुवन्ति सुखासुखे।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।<br>देहवद्भिर्नृभिर्देवैस्तिर्यग्भिश्च नृपोत्तम॥ ३४ | कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो देवताओंके साथ रहते हुए निरन्तर सुख-भोगका त्याग करके श्रमपूर्ण तथा सुखनाशक युद्ध करनेकी इच्छा रखेगा; हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मादि सभी देवता भी अपने किये कर्मोंके फलस्वरूप सुख-दुःख प्राप्त करते हैं। हे नृपोत्तम! सभी देहधारी जीव चाहे मनुष्य, देवता या पशु-पक्षी हों, अपने-अपने किये कर्मका शुभाशुभ फल पाते हैं॥ ३२–३४॥ |
| तपसा दानयज्ञैश्च मानवश्चेन्द्रतां व्रजेत्।<br>क्षीणे पुण्येऽथ शक्रोऽपि पतत्येव न संशयः॥ ३५ | मनुष्य तप, यज्ञ तथा दानके द्वारा इन्द्रत्वको प्राप्त हो जाता है और पुण्य क्षीण होनेपर इन्द्र भी च्युत हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं॥ ३५॥ |
| रामावतारयोगेन देवा वानरतां गताः।<br>तथा कृष्णसहायार्थं देवा यादवतां गताः॥ ३६ | रामावतारके समय देवता कर्मबन्धनके कारण वानर बने थे और कृष्णावतारमें भी कृष्णकी सहायताके लिये देवता यादव बने थे॥ ३६॥ |
| एवं युगे युगे विष्णुरवताराननेकणः।<br>करोति धर्मरक्षार्थं ब्रह्मणा प्रेरितो भृशम्॥ ३७ | इस प्रकार प्रत्येक युगमें धर्मकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णु ब्रह्माजीसे अत्यन्त प्रेरित होकर अनेक अवतार धारण करते हैं॥ ३७॥ |
| पुनः पुनर्हरेरेवं नानायोनिषु पार्थिव।<br>अवतारा भवन्त्यन्ये रथचक्रवदद्भुताः॥ ३८ | हे राजन्! इस प्रकार रथचक्रकी भाँति विविध प्रकारकी योनियोंमें भगवान् विष्णुके अद्भुत अवतार बार-बार होते रहते हैं॥ ३८॥ |
| दैत्यानां हननं कर्म कर्तव्यं हरिणा स्वयम्।<br>अंशांशेन पृथिव्यां वै कृत्वा जन्म महात्मना॥ ३९<br>तदहं संप्रवक्ष्यामि कृष्णजन्मकथां शुभाम्।<br>स एव भगवान्विष्णुरवतीर्णो यदोः कुले॥ ४० | महात्मा भगवान् विष्णु अपने अंशांशसे पृथ्वीपर अवतार लेकर दैत्योंका वधरूपी कार्य सम्पन्न करते हैं। इसलिये अब मैं यहाँ श्रीकृष्णके जन्मकी पवित्र कथा कह रहा हूँ। वे साक्षात् भगवान् विष्णु ही यदुवंशमें अवतरित हुए थे॥ ३९-४०॥ |
| कश्यपस्य मुनेरंशो वसुदेवः प्रतापवान्।<br>गोवृत्तिरभवद्राजन् पूर्वशापानुभावतः॥ ४१ | हे राजन्! कश्यपमुनिके अंशसे प्रतापी वसुदेवजी उत्पन्न हुए थे, जो पूर्वजन्मके शापवश इस जन्ममें गोपालनका काम करते थे॥ ४१॥ |
| कश्यपस्य च द्वे पत्न्यौ शापादत्र महीपते।<br>अदितिः सुरसा चैवमासतुः पृथिवीपते॥ ४२ | हे महाराज! हे पृथ्वीपते! उन्हीं कश्यपमुनिकी दो पत्नियाँ—अदिति और सुरसाने भी शापवश पृथ्वीपर अवतार ग्रहण किया था। हे भरतश्रेष्ठ! उन |