भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 44

अ० १ ] माहात्म्य ३५


पूर्वमस्य पिता राजा परीक्षित् तक्षकाहिना ।<br>सन्दष्टस्तस्य संशुद्ध्यै राज्ञा भागवतं श्रुतम् ॥ १९<br><br>नवभिर्दिवसैः श्रीमद्वेदव्यासमुखाम्बुजात् ।<br>त्रैलोक्यमातरं देवीं पूजयित्वा विधानतः ॥ २०पूर्वकालमें इन जनमेजयके पिता राजा परीक्षित् तक्षक-नागद्वारा काट लिये गये। अतः पिताकी संशुद्धि (शुभगति)-के लिये राजाने तीनों लोकोंकी जननी देवी भगवतीका विधिवत् पूजन-अर्चन करके नौ दिनोंतक व्यासजीके मुखारविन्दसे इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणका श्रवण किया ॥ १९-२० ॥
नवाहयज्ञे सम्पूर्णे परीक्षिदपि भूपतिः ।<br>दिव्यरूपधरो देव्याः सालोक्यं तत्क्षणादगात् ॥ २१इस नवाहयज्ञके सम्पूर्ण हो जानेपर राजा परीक्षित्ने उसी समय दिव्यरूप धारण करके देवीका सालोक्य प्राप्त किया ॥ २१ ॥
पितुर्दिव्यां गतिं राजा विलोक्य जनमेजयः ।<br>व्यासं मुनिं समभ्यर्च्य परां मुदमवाप ह ॥ २२राजा जनमेजय अपने पिताकी दिव्य गति देखकर और महर्षि वेदव्यासकी विधिवत् पूजा करके परम प्रसन्न हुए ॥ २२ ॥
अष्टादशपुराणानां मध्ये सर्वोत्तमं परम् ।<br>देवीभागवतं नाम धर्मकामार्थमोक्षदम् ॥ २३सभी अठारह पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवतपुराण सर्वश्रेष्ठ है और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षको प्रदान करनेवाला है ॥ २३ ॥
ये शृण्वन्ति सदा भक्त्या देव्या भागवतीं कथाम् ।<br>तेषां सिद्धिर्न दूरस्था तस्मात् सेव्या सदा नृभिः ॥ २४जो लोग सदा भक्ति-श्रद्धापूर्वक श्रीमद्देवीभागवतकी कथा सुनते हैं, उन्हें सिद्धि प्राप्त होनेमें रंचमात्र भी विलम्ब नहीं होता। इसलिये मनुष्योंको इस पुराणका सदा पठन-श्रवण करना चाहिये ॥ २४ ॥
दिनमर्धं तदर्धं वा मुहूर्तं क्षणमेव वा ।<br>ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या न तेषां दुर्गतिः क्वचित् ॥ २५पूरे दिन, दिनके आधे समयतक, चौथाई समयतक, मुहूर्तभर अथवा एक क्षण भी जो लोग भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करते हैं, उनकी कभी भी दुर्गति नहीं होती ॥ २५ ॥
सर्वयज्ञेषु तीर्थेषु सर्वदानेषु यत् फलम् ।<br>सकृत् पुराणश्रवणात् तत् फलं लभते नरः ॥ २६मनुष्य सभी यज्ञों, तीर्थों तथा दान आदि शुभ कर्मोंका जो फल प्राप्त करता है, वही फल उसे केवल एक बार श्रीमद्देवीभागवतपुराणके श्रवणसे प्राप्त हो जाता है ॥ २६ ॥
कृतादौ बहवो धर्माः कलौ धर्मस्तु केवलम् ।<br>पुराणश्रवणादन्यो विद्यते नापरो नृणाम् ॥ २७सत्ययुग आदि युगोंमें तो अनेक प्रकारके धर्मोंका विधान था, किंतु कलियुगमें पुराण-श्रवणके अतिरिक्त मनुष्योंके लिये अन्य कोई सरल धर्म विहित नहीं है ॥ २७ ॥
धर्माचारविहीनानां कलावल्पायुषां नृणाम् ।<br>व्यासो हिताय विदधे पुराणाख्यं सुधारसम् ॥ २८कलियुगमें धर्म एवं सदाचारसे रहित तथा अल्प आयुवाले मनुष्योंके कल्याणार्थ महर्षि वेदव्यासने अमृतरसमय श्रीमद्देवीभागवतनामक पुराणकी रचना की ॥ २८ ॥
सुधां पिबन्नेक एव नरः स्यादजरामरः ।<br>देव्याः कथामृतं कुर्यात् कुलमेवाजरामरम् ॥ २९अमृतके पानसे तो केवल एक ही मनुष्य अजर-अमर होता है, किंतु भगवतीका कथारूप अमृत सम्पूर्ण कुलको ही अजर-अमर बना देता है ॥ २९ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 2 C