देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मासानां नियमो नात्र दिनानां नियमोऽपि न।<br>सदा सेव्यं सदा सेव्यं देवीभागवतं नरैः॥ ३० | श्रीमद्देवीभागवतके कथा-श्रवणमें महीनों तथा दिनोंका कोई भी नियम नहीं है। अतएव मानवोंद्वारा इसका सदा ही सेवन (पठन-श्रवण) किया जाना चाहिये॥ ३०॥ |
| आश्विने मधुमासे वा तपोमासे शुचौ तथा।<br>चतुर्षु नवरात्रेषु विशेषात् फलदायकम्॥ ३१ | आश्विन, चैत्र, माघ तथा आषाढ़—इन महीनोंके चारों नवरात्रोंमें इस पुराणका श्रवण विशेष फल प्रदान करता है॥ ३१॥ |
| अतो नवाहयज्ञोऽयं सर्वस्मात् पुण्यकर्मणः।<br>फलाधिकप्रदानेन प्रोक्तः पुण्यप्रदो नृणाम्॥ ३२ | अतएव श्रीमद्देवीभागवतका यह नवाहयज्ञ समस्त पुण्यकर्मोंसे अधिक फलदायक होनेके कारण मनुष्योंके लिये विशेष पुण्यप्रद कहा गया है॥ ३२॥ |
| ये दुर्हृदः पापरता विमूढा<br>मित्रद्रुहो वेदविनिन्दकाश्च।<br>हिंसारता नास्तिकमार्गसक्ता<br>नवाहयज्ञेन पुनन्ति ते कलौ॥ ३३ | जो कलुषित हृदयवाले, पापी, मूर्ख, मित्रद्रोही, वेदोंकी निन्दा करनेवाले, हिंसामें रत और नास्तिक मार्गका अनुसरण करनेवाले मनुष्य हैं, वे भी कलियुगमें इस नवाहयज्ञके अनुष्ठानसे पवित्र हो जाते हैं॥ ३३॥ |
| परस्वदाराहरणेऽतिलुब्धा<br>ये वै नराः कल्मषभारभाजः।<br>गोदेवताब्राह्मणभक्तिहीना<br>नवाहयज्ञेन भवन्ति शुद्धाः॥ ३४ | जो मनुष्य दूसरोंके धन तथा परायी स्त्रियोंके लिये लालायित रहते हैं, पापके बोझसे दबे हुए हैं और गो-ब्राह्मण-देवताओंकी भक्तिसे रहित हैं, वे भी इस नवाहयज्ञसे शुद्ध हो जाते हैं॥ ३४॥ |
| तपोभिरुग्रैर्व्रततीर्थसेवनै-<br>र्दानैरनेकैर्नियमैर्मखैश्च ।<br>हुतैर्जपैर्यच्च फलं न लभ्यते<br>नवाहयज्ञेन तदाप्यते नृणाम्॥ ३५ | जो फल कठिन तपस्याओं, व्रतों, तीर्थसेवन, अनेकविध दान, नियमों, यज्ञों, हवन एवं जप आदिके करनेसे प्राप्त नहीं होता है, वह फल मनुष्योंको श्रीमद्देवी-भागवतके नवाहयज्ञसे प्राप्त हो जाता है॥ ३५॥ |
| तथा न गङ्गा न गया न काशी<br>न नैमिषं नो मथुरा न पुष्करम्।<br>पुनाति सद्यो बदरीवनं नो<br>यथा हि देवीमख एष विप्राः॥ ३६ | हे विप्रो! गंगा, गया, काशी, नैमिषारण्य, मथुरा, पुष्कर तथा बदरिकारण्य भी मनुष्योंको उतना शीघ्र पवित्र नहीं कर पाते हैं, जितना कि श्रीमद्देवीभागवतका यह नवाहयज्ञ लोगोंको पवित्र कर देता है॥ ३६॥ |
| अतो भागवतं देव्याः पुराणं परतः परम्।<br>धर्मार्थकाममोक्षाणामुत्तमं साधनं मतम्॥ ३७ | अतएव श्रीमद्देवीभागवतपुराण सभी पुराणोंमें श्रेष्ठतम है। इसे धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षकी प्राप्तिका उत्तम साधन माना गया है॥ ३७॥ |
| आश्विनस्य सिते पक्षे कन्याराशिगते रवौ।<br>महाष्टम्यां समभ्यर्च्य हैमसिंहासनस्थितम्॥ ३८<br><br>देवीप्रीतिप्रदं भक्त्या श्रीभागवतपुस्तकम्।<br>दद्याद् विप्राय योग्याय स देव्याः पदवीं लभेत्॥ ३९ | जो आश्विन महीनेके शुक्लपक्षमें सूर्यके कन्या-राशिमें पहुँचनेपर महाष्टमी तिथिको स्वर्ण-सिंहासनपर स्थित देवीके प्रीतिप्रद श्रीमद्देवीभागवत-ग्रन्थका पूजन करके उसे किसी योग्य ब्राह्मणको श्रद्धापूर्वक देता है, वह देवीके परमपदको प्राप्त करता है॥ ३८-३९॥ |
| देवीभागवतस्यापि श्लोकं श्लोकार्धमेव वा।<br>भक्त्या यश्च पठेन्नित्यं स देव्याः प्रीतिभाग्भवेत्॥ ४० | जो मनुष्य प्रतिदिन श्रीमद्देवीभागवतपुराणके एक अथवा आधे श्लोकका भी भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह जगदम्बाका कृपापात्र हो जाता है॥ ४०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—2 D