देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 46, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 46
| अ० १ ] | माहात्म्य | ३७ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| उपसर्गभयं घोरं महामारीसमुद्भवम्।<br>उत्पातानखिलांश्चापि हन्ति श्रवणमात्रतः॥ ४१ | महामारीसे उत्पन्न उपद्रवोंके भीषण भय तथा समस्त प्रकारके उत्पात (उल्कापात, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि) इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणके श्रवण-मात्रसे विनष्ट हो जाते हैं॥ ४१॥ |
| बालग्रहकृतं यच्च भूतप्रेतकृतं भयम्।<br>देवीभागवतस्यास्य श्रवणाद् याति दूरतः॥ ४२ | बालग्रहों* (स्कन्दग्रह, स्कन्दापस्मार, शकुनी, रेवती, पूतना, अन्धपूतना, शीतपूतना, मुखमण्डिका और नैगमेष) तथा भूत-प्रेत आदिसे उत्पन्न भय इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणके श्रवणसे बहुत दूरसे ही भाग जाते हैं॥ ४२॥ |
| यस्तु भागवतं देव्याः पठेद् भक्त्या शृणोति वा।<br>धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं च लभते नरः॥ ४३ | जो व्यक्ति भक्ति-भावसे देवीके इस भागवत-पुराणका पाठ अथवा श्रवण करता है; वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥ ४३॥ |
| श्रवणाद्वसुदेवोऽस्य प्रसेनान्वेषणे गतम्।<br>चिरायितं प्रियं पुत्रं कृष्णं लब्ध्वा मुमोद ह॥ ४४ | इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणके श्रवणसे वसुदेवजी प्रसेनको खोजनेके लिये गये हुए और बहुत समयतक न लौटे हुए अपने प्रिय पुत्र श्रीकृष्णको प्राप्त करके प्रसन्न हुए॥ ४४॥ |
| य एतां शृणुयाद् भक्त्या श्रीमद्भागवतीं कथाम्।<br>भुक्तिं मुक्तिं स लभते भक्त्या यश्च पठेदिमाम्॥ ४५ | जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणकी कथाको पढ़ता है तथा इसका श्रवण करता है, वह भोग तथा मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है॥ ४५॥ |
| अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान् भवेत्।<br>रोगी रोगात् प्रमुच्येत श्रुत्वा भागवतामृतम्॥ ४६ | अमृतस्वरूप इस श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणसे पुत्रहीन मनुष्य पुत्रवान् हो जाता है, दरिद्र व्यक्ति धनसे सम्पन्न हो जाता है तथा रोगग्रस्त मनुष्य रोगसे मुक्त हो जाता है॥ ४६॥ |
| वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवत्सा च याङ्गना।<br>देवीभागवतं श्रुत्वा लभेत् पुत्रं चिरायुषम्॥ ४७ | वन्ध्या स्त्री, एक सन्तानवाली स्त्री अथवा वह स्त्री जिसकी सन्तान पैदा होकर मर जाती हो—वे भी श्रीमद्देवीभागवतपुराण सुनकर दीर्घ आयुवाला पुत्र प्राप्त करती हैं॥ ४७॥ |
| पूजितं यद्गृहे नित्यं श्रीभागवतपुस्तकम्।<br>तद्गृहं तीर्थभूतं हि वसतां पापनाशकम्॥ ४८ | जिस घरमें नित्य श्रीमद्देवीभागवतपुराणका पूजन किया जाता है, वह घर तीर्थस्वरूप हो जाता है तथा उसमें निवास करनेवाले लोगोंके पापोंका नाश हो जाता है॥ ४८॥ |
| अष्टम्यां वा चतुर्दश्यां नवम्यां भक्तिसंयुतः।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि स सिद्धिं लभते पराम्॥ ४९ | जो मनुष्य अष्टमी, नवमी अथवा चतुर्दशी तिथियोंको श्रद्धापूर्वक इसे पढ़ता या सुनता है, वह परम सिद्धिको प्राप्त करता है॥ ४९॥ |
* सुश्रुतसंहित उत्तरतन्त्र २७।४-५