देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० ७ ] चतुर्थ स्कन्ध ४३१
| निर्भरं सुखमासाद्य चरस्व गन्धमादने।<br>यदि वाञ्छसि नाकत्वं नाधिको गन्धमादनात्॥ ५८<br><br>रमस्वात्र शुभे स्थाने प्राप्य सर्वाः सुराङ्गनाः॥ ५९ | पूर्ण आनन्द प्राप्त करते हुए आप गन्धमादन-पर्वतपर विचरण कीजिये। यदि आप स्वर्ग-प्राप्तिकी आकांक्षा रखते हैं तो यह निश्चय जान लीजिये कि वह स्वर्ग इस गन्धमादनसे अच्छा नहीं है। अतः हम सभी अप्सराओंको अंगीकार करके आप इस दिव्य स्थानमें विहार कीजिये॥ ५८-५९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे अप्सरसां नारायणसमीपे प्रार्थनाकरणं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
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अथ सप्तमोऽध्यायः
अप्सराओंके प्रस्तावसे नारायणके मनमें ऊहापोह और नरका उन्हें समझाना तथा अहंकारके कारण प्रह्लादके साथ हुए युद्धका स्मरण कराना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| इत्याकर्ण्य वचस्तासां धर्मपुत्रः प्रतापवान्।<br>विमर्शमकरोञ्चित्ते किं कर्तव्यं मयाधुना॥ १<br><br>हास्योऽहं मुनिवृन्देषु भविष्याम्यद्य सङ्गमात्।<br>अहंकारादिदं प्राप्तं दुःखं नात्र विचारणा।<br>मूलं धर्मविनाशस्य प्रथमं यदहङ्कृतिः॥ २<br><br>मूलं संसारवृक्षस्य यतः प्रोक्तो महात्मभिः।<br>दृष्ट्वा मौनं समाधाय न स्थितोऽहं समागतम्॥ ३<br><br>वाराङ्गनागणं जुष्टं तेनासं दुःखभाजनम्।<br>उत्पादितास्तथा नार्यो मया धर्मव्ययेन वै॥ ४<br><br>तास्तु मां बाधितुं वृत्ताः कामार्ताः प्रमदोत्तमाः।<br>ऊर्णनाभिरिवाद्याहं जालेन स्वकृतेन वै॥ ५<br><br>बद्धोऽस्मि सुदृढेनात्र किं कर्तव्यमतः परम्।<br>यदि चिन्तां समुत्सृज्य सन्त्यजाम्यबला इमाः॥ ६<br><br>शप्त्वा भ्रष्टा व्रजिष्यन्ति सर्वा भग्नमनोरथाः।<br>मुक्तोऽहं सञ्चरिष्यामि विजने परमं तपः॥ ७<br>तस्मात्क्रोधं समुत्पाद्य त्यक्ष्यामि सुन्दरीगणम्। | उन देवांगनाओंका वचन सुनकर धर्मपुत्र प्रतापी नारायण अपने मनमें विचार करने लगे कि इस समय मुझे क्या करना चाहिये? यदि मैं इस समय विषयभोगमें लिप्त होता हूँ तो मुनिसमुदायमें उपहासका पात्र बनूँगा। अहंकारसे ही मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ है; इसमें कोई संशय नहीं। धर्मके विनाशका मूल तथा प्रधान कारण अहंकार है। अतः महात्माओंने उसे संसाररूपी वृक्षका मूल कहा है॥ १-२\frac{१}{२}॥<br><br>इन वारांगनाओंके समूहको आया हुआ देखकर मैं मौन धारणकर स्थित नहीं रह सका और प्रसन्नतापूर्वक मैंने इनसे वार्तालाप किया, इसीलिये मैं दुःखका भाजन हुआ। अपने धर्मका व्यय करके मैंने उन उर्वशी आदि स्त्रियोंकी व्यर्थ रचना की। ये कामार्त अप्सराएँ मेरी तपस्यामें विघ्न डालनेमें प्रवृत्त हैं। मकड़ियोंके द्वारा बनाये गये जालकी भाँति अब अपने ही द्वारा उत्पादित सुदृढ़ जालमें मैं बुरी तरह फँस गया हूँ, अब मुझे क्या करना चाहिये? यदि चिन्ता छोड़कर इन स्त्रियोंको अस्वीकार कर देता हूँ तो अपना मनोरथ निष्फल हुआ पाकर ये भ्रष्ट स्त्रियाँ मुझे शाप देकर चली जायेंगी। तब इनसे छुटकारा पाकर मैं निर्जन स्थानमें कठोर तप करूँगा। अतएव क्रोध उत्पन्न करके मैं इनका परित्याग कर दूँगा॥ ३—७\frac{१}{२}॥ |