भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 439

४३० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ६

मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देव्य ऊचुः<br>क्व गच्छामो महाभाग प्राप्तास्ते पादपङ्कजम्।<br>नारायण सुरश्रेष्ठ भक्त्या परमया मुदा॥ ४७देवियाँ बोलीं— हे महाभाग! हे नारायण! हे सुरश्रेष्ठ! परमभक्तिके साथ प्रसन्नतापूर्वक हम सभी अप्सराएँ आपके चरणकमलोंका सान्निध्य प्राप्त कर चुकी हैं; अब हम सब कहाँ जायें? ॥ ४७॥
वाञ्छितं चेद्वरं नाथ ददासि मधुसूदन।<br>तुष्टः कमलपत्राक्ष ब्रवीमो मनसेप्सितम्॥ ४८हे नाथ! हे मधुसूदन! हे कमलपत्राक्ष! यदि आप हमारे ऊपर प्रसन्न होकर वांछित वरदान देना चाहते हैं, तो हम अपने मनकी इच्छा प्रकट कर रही हैं॥ ४८॥
पतिस्त्वं भव देवेश वरमेनं परन्तप।<br>भवामः प्रीतियुक्तास्त्वां सेवितुं जगदीश्वर॥ ४९हे देवेश! आप हमारे पति बन जायँ। हे परन्तप! हमलोगोंके इसी वरदानको पूर्ण कीजिये। हे जगदीश्वर! आपकी सेवा करनेमें हम सभीको प्रसन्नता होगी॥ ४९॥
त्वया चोत्पादिता नार्यः सन्त्वन्याश्चारुलोचनाः।<br>उर्वश्याद्यास्तथा यान्तु स्वर्गं वै भवदाज्ञया॥ ५०<br><br>स्त्रीणां षोडशसाहस्त्रं तिष्ठत्वत्र शतार्धकम्।<br>सेवां तेऽत्र करिष्यामो युवयोस्तापसोत्तमौ॥ ५१आपने जिन उर्वशी आदि सुन्दर नयनोंवाली अन्य रमणियोंको उत्पन्न किया है, वे अब आपकी आज्ञासे स्वर्ग चली जायँ। हे श्रेष्ठ तपस्वियो! हम सोलह हजार पचास अप्सराएँ यहीं रहेंगी और यहाँ हम सब आप दोनोंकी सेवा करेंगी॥ ५०-५१॥
वाञ्छितं देहि देवेश सत्यवाग्भव माधव।<br>आशाभङ्गो हि नारीणां हिंसनं परिकीर्तितम्॥ ५२<br><br>कामार्तानाञ्च मुनिभिर्धर्मज्ञैस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>भाग्ययोगादिह प्राप्ताः स्वर्गात्प्रेमपरिप्लुताः॥ ५३<br><br>त्यक्तुं नार्हसि देवेश समर्थोऽसि जगत्पते।हे देवेश! आप हमारा मनोवांछित वर दीजिये और अपने सत्यव्रतका पालन कीजिये। हे माधव! धर्मज्ञ तथा तत्त्वदर्शी मुनियोंने प्रेमासक्त स्त्रियोंकी आशाको भंग करना हिंसा बताया है। दैवयोगसे हम अप्सराएँ भी स्वर्गसे यहाँ आकर आप दोनोंके प्रेमरससे संसिक्त हो गयी हैं। हे देवेश! आप हमारा त्याग न कीजिये। हे जगत्पते! आप तो सर्वसमर्थ हैं॥ ५२-५३ १/२॥
नारायण उवाच<br>पूर्णं वर्षसहस्त्रं तु तपस्तप्तं मयात्र वै॥ ५४<br><br>जितेन्द्रियेण चार्वङ्ग्यः कथं भङ्गं करोम्यतः।<br>नेच्छा कामे सुखे काचित्सुखधर्मविनाशके॥ ५५<br><br>पशूनामपि साधर्म्ये रमेत मतिमान्कथम्।नारायण बोले— इन्द्रियोंको जीतकर मैंने पूरे एक हजार वर्षोंतक यहाँ तपस्या की है, अतएव हे सुन्दरियो! उसे कैसे नष्ट कर दूँ? सुख तथा धर्मका नाश करनेवाले वासनात्मक सुखमें मेरी कोई रुचि नहीं है। पाशविक धर्मके समान सुखमें विवेकशील पुरुष कैसे प्रवृत्त हो सकता है? ॥ ५४-५५ १/२॥
अप्सरस ऊचुः<br>शब्दादीनां च पञ्चानां मध्ये स्पर्शसुखं वरम्॥ ५६<br><br>आनन्दरसमूलं वै नान्यदस्ति सुखं किल।<br>अतोऽस्माकं महाराज वचनं कुरु सर्वथा॥ ५७अप्सराएँ बोलीं— शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—इन पाँच सुखोंमें स्पर्श-सुख सर्वश्रेष्ठ है। यह आनन्दरसका मूल है और इससे बढ़कर अन्य कोई भी सुख नहीं है। अतः हे महाराज! आप हमारी बात मान लीजिये॥ ५६-५७॥