भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 889 में से

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पृष्ठ 438

| अ० ६ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४२९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कुर्युः कथं स्तुतिमहो तपसो महत्त्वं<br> धैर्यं तथैव भवतामभिवीक्ष्य बालाः।<br>अस्मत्कटाक्षविषदिग्धशरेण दग्धः<br> को वा न तत्र भवतां मनसो व्यथा न॥ ४०अहो! हम मूर्ख अप्सराएँ आपकी स्तुति कैसे करें? हम तो आपके धैर्य तथा तपके प्रभावको देखकर परम विस्मयमें पड़ गयी हैं। ऐसा कौन है जो हमलोगोंके कटाक्षरूपी विषसे बुझे बाणोंसे दग्ध न हो गया हो, फिर भी आपके मनको थोड़ी भी व्यथा नहीं हुई॥ ४०॥
ज्ञातौ युवां नरहरेः परमांशभूतौ<br> देवौ मुनी शमदमादिनिधी सदैव।<br>सेवानिमित्तमिह नो गमनं न कामं<br> कार्यं हरेः शतमखस्य विधातुमेव॥ ४१अब हमलोगोंको ज्ञात हो गया कि आप दोनों देवस्वरूप मुनि साक्षात् भगवान् विष्णुके परम अंश हैं और सदा ही शम, दम आदि गुणोंके निधान हैं। आप दोनोंकी सेवाके लिये यहाँ हमारा आगमन नहीं हुआ है, अपितु देवराज इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये ही हम सब यहाँ आयी हुई हैं॥ ४१॥
भाग्येन केन युवयोः किल दर्शनं नः<br> सम्पादितं न विदितं खलु सञ्चितं तत्।<br>चित्तं क्षमं निजजने विहितं युवाभ्या-<br> मस्मद्विधे किल कृतागसि तापमुक्तम्॥ ४२<br><br>कुर्वन्ति नैव विबुधास्तपसो व्ययं वै<br> शापेन तुच्छफलदेन महानुभावाः।न जाने हमारे किस भाग्यसे आप दोनों मुनिवरोंके दर्शन हुए। हम यह नहीं जान पा रही हैं कि हमारे द्वारा सम्पादित किस संचित पुण्यकर्मका यह फल है। [शाप देनेमें समर्थ होते हुए भी] आप दोनों मुनियोंने हम-जैसे अपराधीजनोंको स्वजन समझकर अपने चित्तको क्षमाशील बनाया और हमें सन्तापरहित कर दिया। विवेकशील महानुभाव तुच्छ फल देनेवाले शापको उपयोगमें लाकर अपने तपका अपव्यय नहीं करते॥ ४२ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>इत्थं निशम्य वचनं सुरकामिनीनां<br> तावूचतुर्मुनिवरौ विनयानतानाम्॥ ४३<br><br>प्रीतौ प्रसन्नवदनौ जितकामलोभौ<br> धर्मात्मजौ निजतपोरुचिशोभिताङ्गौ।व्यासजी बोले—उन अति विनम्र देवसुन्दरियोंका वचन सुनकर प्रसन्न मुखमण्डलवाले, काम तथा लोभको जीत लेनेवाले तथा अपनी तपस्याके प्रभावसे देदीप्यमान अंगोंवाले वे धर्मपुत्र मुनिवर नर-नारायण प्रेमपूर्वक कहने लगे॥ ४३ १/२॥
नरनारायणावूचतुः<br>ब्रुवन्तु वाञ्छितान् कामान्दावावस्तुष्टमानसौ॥ ४४<br><br>यान्तु स्वर्गं गृहीत्वेमामुर्वशीं चारुलोचनाम्।<br>उपायनमियं बाला गच्छत्वद्य मनोहरा॥ ४५नर-नारायण बोले—हम दोनों तुम सभीपर अत्यन्त प्रसन्न हैं। तुमलोग अपने वांछित मनोरथ बताओ, हम उसे देंगे। इस सुन्दर नयनोंवाली उर्वशीको भी अपने साथ लेकर तुम सब स्वर्गके लिये प्रस्थान करो। उपहारस्वरूप यह मनोहर युवती अब यहाँसे तुमलोगोंके साथ जाय॥ ४४-४५॥
दत्तावाभ्यां मघवतः प्रीणनायोरुसम्भवा।<br>स्वस्त्यस्तु सर्वदेवेभ्यो यथेष्टं प्रव्रजन्तु च॥ ४६<br>( न कस्यापि तपोविघ्नं प्रकर्तव्यमतः परम्।)ऊरुसे प्रादुर्भूत इस उर्वशीको इन्द्रके प्रसन्नार्थ हमने उनको दे दिया है। सभी देवताओंका कल्याण हो और अब सभी लोग इच्छानुसार यहाँसे प्रस्थान करें॥ ४६॥ (अब इसके बाद तुमलोग किसीकी तपस्यामें विघ्न मत उत्पन्न करना।)